राजस्थान के ग्रामीण अंचलों में पंचायती राज चुनावों का बिगुल बजते ही राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। चौपालों से लेकर ढाणियों तक अब संभावित प्रत्याशियों और स्थानीय समस्याओं पर मंथन शुरू हो चुका है। इस बार के चुनावी परिदृश्य में सबसे अधिक ध्यान राज्य के शेखावाटी क्षेत्र पर टिका हुआ है, जहां लंबे समय से चली आ रही जल संकट की समस्या सीधे तौर पर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गई है। हरियाणा के साथ संपन्न हुआ ऐतिहासिक यमुना जल समझौता इस इलाके के मतदाताओं के बीच मुख्य विमर्श का विषय बन चुका है, जिससे चुनावी समीकरणों में नए मोड़ आने के आसार दिखाई दे रहे हैं।
समझौते के तकनीकी पहलू और पाइपलाइन का खाका
शेखावाटी की भौगोलिक बनावट और वहां पानी की कमी को देखते हुए इस समझौते के तकनीकी विवरण बेहद महत्वपूर्ण हैं। राजस्थान और हरियाणा के बीच 29 जून 2026 को नई दिल्ली में एक महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। यह द्विपक्षीय समझौता केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की उपस्थिति में पूरा हुआ था। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य पश्चिमी यमुना नहर प्रणाली के माध्यम से राजस्थान के हक का पानी राज्य तक पहुंचाना है।
तय योजना के मुताबिक, इस परियोजना के तहत हरियाणा स्थित हथिनीकुंड बैराज से राजस्थान की सीमा तक लगभग 295 किलोमीटर लंबी भूमिगत पाइपलाइन बिछाई जानी है। परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) में 295.5 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन संरचना का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। मानसून और उसके बाद की अवधि, यानी जुलाई से अक्टूबर के महीनों के दौरान, राजस्थान को लगभग 580 मिलियन घन मीटर पानी उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है। इस पूरे ढांचे में तीन समानांतर भूमिगत पाइपलाइनों का निर्माण प्रस्तावित है, जिसका प्राथमिक उपयोग शेखावाटी के प्यासे गांवों में सुरक्षित पेयजल पहुंचाने और अन्य आवश्यक जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाएगा।
चूरू, सीकर और झुंझुनूं में जल संकट की जमीनी हकीकत
शेखावाटी के तीन प्रमुख जिलों चूरू, सीकर और झुंझुनूं में जल संकट कोई नई समस्या नहीं है, बल्कि दशकों से यह लोगों की दिनचर्या का सबसे कठिन हिस्सा रहा है। भूजल के अत्यधिक दोहन की वजह से इन इलाकों में जलस्तर तेजी से पाताल में चला गया है, जिसके चलते नलकूप और पारंपरिक कुएं सूखते जा रहे हैं। कई गांवों में ग्रामीणों को केवल दैनिक उपभोग और पीने का पानी जुटाने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ती है।
पेयजल के साथ-साथ इस क्षेत्र के किसानों के लिए सिंचाई के साधनों का अभाव भी हमेशा से एक गंभीर संकट रहा है। पर्याप्त बारिश न होने और नहरों की कमी के कारण कृषि उपज पर बुरा असर पड़ता रहा है। यही वजह है कि यमुना से पानी लाने की यह परियोजना यहां के निवासियों के लिए मात्र एक कागजी सरकारी योजना नहीं है, बल्कि उनकी खेती, अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा की बुनियादी जिंदगी से जुड़ा सीधा मामला है। जब बुनियादी जरूरतें राजनीति से जुड़ती हैं, तो उनका असर मतदान केंद्रों पर साफ दिखाई देता है।
चार चरणों में होने वाले पंचायती राज चुनाव का पूरा कार्यक्रम
राजस्थान निर्वाचन आयोग द्वारा घोषित कार्यक्रम के अनुसार राज्य में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव चार अलग-अलग चरणों में संपन्न कराए जाएंगे। ग्रामीण मतदाता दो अलग-अलग स्तरों पर अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे
- जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्य: इन पदों के लिए मतदान 23 अक्टूबर, 29 अक्टूबर, 4 नवंबर और 14 नवंबर को आयोजित किया जाएगा।
- पंच और सरपंच पद के चुनाव: ग्राम पंचायतों के प्रमुख पदों के लिए वोटिंग 25 अक्टूबर, 31 अक्टूबर, 6 नवंबर और 16 नवंबर को होगी।
अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से लेकर नवंबर के मध्य तक चलने वाली इस चुनावी प्रक्रिया के दौरान शेखावाटी के गांवों में यमुना जल समझौते की प्रगति, इसके कार्यान्वयन की समयसीमा और पानी की उपलब्धता पर लगातार तीखी बहस होने की पूरी उम्मीद है।
2024 के लोकसभा नतीजों का संदर्भ और वर्तमान सियासी गणित
शेखावाटी के राजनीतिक मिजाज को समझने के लिए वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों के परिणामों पर नजर डालना जरूरी है। उस चुनाव में शेखावाटी की तीनों संसदीय सीटों पर भारतीय जनता पार्टी को पराजय का सामना करना पड़ा था। चूरू लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस के प्रत्याशी राहुल कस्वां ने जीत दर्ज की थी, जबकि झुंझुनूं सीट से कांग्रेस के बृजेंद्र सिंह ओला विजयी रहे थे। वहीं सीकर संसदीय क्षेत्र से सीपीआई(एम) के उम्मीदवार अमराराम सांसद चुने गए थे।
इन नतीजों से यह स्पष्ट होता है कि शेखावाटी का राजनीतिक ताना-बाना किसी एक दल के पक्ष में एकतरफा नहीं रहा है। इस क्षेत्र में जाट समुदाय की खासी आबादी और मजबूत सामाजिक प्रभाव है। इसके अलावा किसान आंदोलन के मुद्दे, स्थानीय जातिगत समीकरण और पानी की पुरानी किल्लत हमेशा से यहां के चुनावी नतीजों को तय करने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। ऐसे में लोकसभा चुनाव के विपरीत परिणाम देखने के बाद सत्तारूढ़ दल के लिए यह समझौता अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने का एक बड़ा जरिया बन सकता है।
यमुना जल समझौते का चुनावी नफा-नुकसान
पंचायती राज चुनाव मूल रूप से स्थानीय स्तर के चुनाव होते हैं, जहां उम्मीदवारों की व्यक्तिगत छवि, पारिवारिक रिश्ते, गांव के सामाजिक समीकरण और छोटे-मोटे स्थानीय काम सबसे बड़ा प्रभाव डालते हैं। इसके बावजूद राज्य सरकार द्वारा इतने बड़े पैमाने पर दशकों से अटके पड़े यमुना जल विवाद का समाधान निकालना एक ऐसा कदम है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सत्तारूढ़ दल के नेता और कार्यकर्ता इस समझौते को अपनी एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं और मतदाताओं को यह विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्षेत्र की प्यास बुझाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा चुके हैं। दूसरी तरफ ग्रामीण मतदाताओं के मन में यह सवाल भी बना हुआ है कि पाइपलाइन का निर्माण कार्य धरातल पर कब शुरू होगा और वास्तव में उनके अपने गांव के नलों तक यमुना का पानी कब पहुंचेगा। चुनावी बहसों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पानी की उम्मीद किस हद तक मतदाताओं के फैसलों को प्रभावित करती है।


















