संतान की मंगलकामना, बेहतर स्वास्थ्य और सुखी जीवन के लिए मनाया जाने वाला अहोई अष्टमी का पारंपरिक व्रत आज रखा जा रहा है। इस विशेष अवसर पर माताएं पूरे दिन निर्जला उपवास रखकर अहोई माता की उपासना करती हैं और सायंकाल में विधिपूर्वक धार्मिक अनुष्ठान पूरा करती हैं। ऐसी मान्यता है कि अहोई माता का सच्चे मन से पूजन करने से बच्चों के मार्ग की बाधाएं समाप्त होती हैं तथा घर-परिवार में सुख और शांति का विस्तार होता है। इस पूरे पर्व में शाम के वक्त गगन में तारों के दीदार और उनके पूजन की विशेष धार्मिक परंपरा जुड़ी हुई है।
पूजा का समय और तारों को अर्घ्य देने का विधान
अहोई अष्टमी के दिन संध्या पूजन के लिए शुभ मुहूर्त निर्धारित किया गया है। आज के दिन अहोई माता की मुख्य पूजा संपन्न करने का उत्तम समय शाम 5:36 बजे से लेकर शाम 6:54 बजे तक उपलब्ध रहेगा। इस शुभ अवधि में परिवार की महिलाएं अहोई माता का चित्र बनाकर अथवा स्थापित कर विधिवत आराधना करती हैं। इसके बाद जैसे ही गोधूलि वेला के उपरांत आसमान में तारे दृष्टिगोचर होते हैं, अर्घ्य की तैयारी शुरू की जाती है। तारों के दर्शन का समय शाम करीब 6:01 बजे तय माना गया है।
तारों को जल अर्पण के साथ व्रत का पारण
धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार माताएं शाम को गगन मंडल में तारों के प्रकट होने पर लोटे में जल भरकर उन्हें अर्घ्य अर्पित करती हैं। अर्घ्य देते समय वे अपनी संतान के निरोगी काया, लंबी उम्र और उज्ज्वल भविष्य का आशीष मांगती हैं। तारों को जल समर्पित करने के बाद ही इस कठिन उपवास का पारण किया जाता है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश समेत देश के अलग-अलग क्षेत्रों में यह समय स्थानीय भौगोलिक स्थिति पर निर्भर करता है। हालांकि वास्तविक दृश्यता स्थानीय मौसम, बादलों के जमावड़े तथा वातावरणीय दशाओं के आधार पर निर्धारित समय से कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकती है। श्रद्धा भाव से किए गए इस पूजन से मातृशक्ति को अहोई माता की असीम कृपा प्राप्त होती है।






















