भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने की खुशी में मनाए जाने वाले दीपोत्सव का पर्व देश के ऐतिहासिक घरानों में अपनी अनूठी संस्कृति के साथ मनाया जाता है। उदयपुर के प्रतिष्ठित मेवाड़ राजपरिवार में दीवाली का यह पावन अवसर केवल रोशनी का त्योहार नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत और रीति-रिवाजों को सहेजने का जीवंत माध्यम भी है। इस शाही घराने की परंपराओं में आज भी पीढ़ियों का समन्वय साफ झलकता है, जहां बुजुर्गों से सीखकर युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहती है। दीवाली के विशेष दिनों में इस परिवार के सदस्यों का अंदाज और उनकी पूजन पद्धति हमेशा से आकर्षण का केंद्र रही है।
इतिहास के पन्नों में अमिट स्थान रखने वाले इस राजवंश के सदस्यों का महालक्ष्मी मंदिर से गहरा जुड़ाव रहा है। पूर्व में दिवंगत अरविंद सिंह मेवाड़ अपने पुरखों के समय से चली आ रही इस परंपरा का पालन करते हुए उदयपुर के श्री महालक्ष्मी मंदिर में मत्था टेकने जाते थे। उनके साथ उनके पुत्र लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ भी हमेशा मौजूद रहते थे। पारंपरिक लवाजमे के साथ यह शाही काफिला सिटी पैलेस के प्रांगण से रवाना होकर भट्टियानी चौहट्टा स्थित मंदिर पहुंचता था। वहां पहुंचकर पूरा परिवार पूरे विधि-विधान से माता की पूजा करता था और पूरे क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना करता था।
दीपावली की दोपहर को जब यह शाही जुलूस शहर के मार्गों से गुजरता है, तो आम नागरिकों में इसे देखने की भारी उत्सुकता रहती है। लोग अपने चहेते राजपरिवार के सदस्यों का स्वागत करने के लिए सड़कों के दोनों ओर कतारबद्ध खड़े होते हैं। पारंपरिक मेवाड़ी वेशभूषा और सिर पर सजी शानदार पगड़ी के साथ इन सदस्यों की एक झलक पाने के लिए शहरवासी बेताब रहते हैं। यह दृश्य राजसी वैभव के साथ जनता और राजवंश के बीच के आत्मीय संबंधों को भी दर्शाता है, जो आधुनिक दौर में भी अपनी पुरानी चमक के साथ कायम है।
समय के चक्र के साथ इस परंपरा को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी अब डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ के कंधों पर है। उन्होंने अपने पिता के निधन के बाद इस विरासत को न केवल जीवित रखा है, बल्कि इसमें अपनी तरफ से एक गहरी आस्था का नया अध्याय भी जोड़ा है। अब वे अपने बेटे हरितराज सिंह मेवाड़ को भी इस परंपरा में साथ लेकर चलते हैं। परंपरा के प्रति अपनी अटूट निष्ठा दिखाते हुए उन्होंने सिटी पैलेस से महालक्ष्मी मंदिर तक की यह दूरी नंगे पांव तय करने की नई शुरुआत की है। इस दौरान उनके साथ पूरा शाही लवाजमा होता है और पिता-पुत्र एक जैसी शाही पोशाक तथा स्वर्ण आभूषणों से सुसज्जित होकर माता के दरबार में हाजिरी लगाते हैं।
उदयपुर के इस ऐतिहासिक महालक्ष्मी मंदिर में स्थापित प्रतिमा अपने आप में बेहद खास और दुर्लभ है। सामान्य तौर पर देवी लक्ष्मी कमल पुष्प पर विराजमान नजर आती हैं, लेकिन यहां माता गराज यानी हाथी पर आसीन मुद्रा में भक्तों को दर्शन देती हैं। ऐश्वर्य, शक्ति, समृद्धि और शुभता का प्रतीक मानी जाने वाली इस अनूठी प्रतिमा के दर्शन के लिए दीवाली के इन पांच दिनों के दौरान लाखों श्रद्धालु मंदिर में उमड़ते हैं। मंदिर प्रशासन द्वारा इस दौरान कई विशेष और भव्य धार्मिक आयोजनों का संचालन किया जाता है, जो उत्सव के माहौल को और अधिक दिव्य बना देते हैं।
वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप के वंशज और मेवाड़ राजवंश के 77वें संरक्षक के रूप में ड़ॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ इस गौरवशाली परंपरा का नेतृत्व कर रहे हैं। इस राजवंश की ख्याति पूरी दुनिया में अपनी आन, बान और शान के लिए फैली हुई है। अपनी विरासतों के प्रति गहरी निष्ठा और कर्तव्यों के पालन के कारण ही इस घराने का नाम आज भी देश के प्रमुख और सम्मानित राजघरानों में सबसे ऊपर लिया जाता है। इनकी यह जीवनशैली आने वाली पीढ़ियों को अपने इतिहास और संस्कृति से जुड़े रहने की प्रेरणा देती है।



















