राजस्थान के स्थानीय निकायों के बाद अब पूरे राज्य में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव होने जा रहे हैं। पंचायत राज विभाग की तरफ से इन संस्थाओं के लिए आरक्षण की लॉटरी निकाले जाने के बाद राज्य निर्वाचन आयोग किसी भी वक्त चुनाव तारीखों का ऐलान कर सकता है। निर्वाचन आयोग के सामने यह चुनौती है कि उसे 15 नवंबर से पहले हर हाल में पूरी चुनाव प्रक्रिया को सफलतापूर्वक संपन्न कराना है। इस प्रशासनिक डेडलाइन के चलते प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हलचल काफी तेज हो गई है।
जोर-शोर से चल रही प्रशासनिक और राजनीतिक तैयारियां
विभागीय स्तर पर चुनाव कराने के लिए तैयारियां बहुत जोर-शोर से चल रही हैं। सूबे की दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियां भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के अलावा कई अन्य छोटे दल भी चुनावी मैदान में उतरने के लिए पूरी तरह से कमर कस चुके हैं। टिकट चाहने वाले नए और पुराने दोनों तरह के नेता अपनी राजनीतिक छवि को एक नए रूप में पेश करने के लिए खादी के सफेद कुर्ता-पायजामा सिलवाने में जुट गए हैं। जैसे ही आरक्षण की प्रक्रिया पूरी हुई, गांवों की राजनीति में सरगर्मी अचानक काफी बढ़ गई।
बाजारों में दिखा चुनाव का सीधा असर और टेलर की व्यस्तता
वार्ड पंच, सरपंच, पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्य जैसे महत्वपूर्ण पदों के लिए आरक्षण की स्थिति स्पष्ट होने के बाद संभावित दावेदारों ने जमीनी स्तर पर तैयारियां शुरू कर दी हैं। गांवों में संभावित प्रत्याशी अभी से मतदाताओं के घर-घर जाकर संपर्क साधने में लग गए हैं। इस चुनावी गहमागहमी का सीधा असर अब कस्बों और गांवों के बाजारों में भी साफ तौर पर नजर आने लगा है। खासकर दर्जी की दुकानों पर सफेद रंग का कुर्ता और पायजामा सिलवाने के लिए ग्राहकों की लंबी कतारें लग रही हैं और भारी भीड़ उमड़ रही है।
पारंपरिक राजनीतिक पोशाक के रूप में सफेद लिबास की मांग
भारतीय राजनीति में सफेद कुर्ता-पायजामा को हमेशा से ही नेताओं की पारंपरिक पोशाक और पहचान माना जाता रहा है। स्थिति यह बन गई है कि कई कपड़ा सिलने वाली दुकानों पर सफेद कुर्ता-पायजामा के नए ऑर्डर के लिए लंबी वेटिंग चल रही है। राजनीति में उतरने के इच्छुक नए चेहरों को अपने कपड़े सिलवाने के लिए अपनी बारी का लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे ये भावी उम्मीदवार अपने पहनावे से लेकर जनसंपर्क के हर तौर-तरीके को दुरुस्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।
दिन-रात काम कर रहे दर्जी और बढ़ रहा काम का दबाव
जालोर जिले के भीनमाल कस्बे में स्थित राजू टेलर के अनुभव के मुताबिक, जब से पंचायत चुनाव की आरक्षण लॉटरी निकली है, तब से उनके पास सफेद कुर्ता-पायजामा सिलवाने के अनगिनत ऑर्डर आ चुके हैं। ऑर्डर देने वाले लगभग सभी लोग पंच और सरपंच पद के चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे संभावित प्रत्याशी हैं। दुकानदारों का कहना है कि वे अपने बाकी सारे काम रोककर सिर्फ सफेद कुर्ता-पायजामा सिलने में ही जुटे हुए हैं, फिर भी काम का भारी ओवरलोड बना हुआ है और ग्राहकों को इंतजार करना पड़ रहा है। एक अन्य दर्जी राजेंद्र नामा का कहना है कि यह पोशाक नेताओं की पहली पसंद होती है और अब स्थानीय स्तर के चुनाव में भी इसका जबर्दस्त क्रेज देखा जा रहा है, जिसके कारण वे रात को देर तक काम कर रहे हैं।
चौपालों और सोशल मीडिया पर शुरू हुआ राजनीतिक समीकरणों का दौर
सरपंच के साथ-साथ पंचायत समिति और जिला परिषद सदस्य के पदों के लिए भी तस्वीर साफ होने के बाद सियासी समीकरणों पर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। अब कौन-कौन उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतरेगा और किसके पक्ष में समीकरण मजबूत बैठेंगे, इसे लेकर गांवों की चौपालों और चाय की दुकानों पर बहस छिड़ गई है। आरक्षण लॉटरी जारी होने के बाद से संभावित दावेदारों ने केवल जमीनी स्तर पर ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से भी अपना प्रचार-प्रसार शुरू कर दिया है। कई जगहों पर उम्मीदवारों के नाम खुलकर सामने आने लगे हैं और कुछ उत्साही दावेदारों ने तो अभी से अपनी चुनाव प्रचार सामग्री भी छपवानी शुरू कर दी है।




















