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मंडप में दिखाई क्यों नहीं देतीं दूल्हा-दुल्हन की मांएं, जानिए बंगाली शादियों की पुरानी रस्म का राज़रिश्ते
6 सित॰ 2026, 9:35 pm (52 दिन पहले)· 12

मंडप में दिखाई क्यों नहीं देतीं दूल्हा-दुल्हन की मांएं, जानिए बंगाली शादियों की पुरानी रस्म का राज़

बंगाली हिंदू शादियों में एक पुरानी मान्यता के तहत दूल्हा-दुल्हन की मां को मुख्य विवाह रस्म के दौरान मंडप में मौजूद नहीं रखा जाता, हालांकि आज कई परिवारों में यह परंपरा नहीं निभाई जाती।

पश्चिम बंगाल के हिंदू परिवारों में शादी की रस्में बाकी भारतीय समुदायों से कई मायनों में अलग नजर आती हैं। इन्हीं रस्मों में एक ऐसी पुरानी परंपरा भी शामिल है, जिसमें दूल्हा और दुल्हन की मां को मुख्य फेरों या विवाह की केंद्रीय रस्म के वक्त मंडप में मौजूद न रहने की बात कही जाती रही है। हालांकि यह बात हर घर पर एक जैसी लागू नहीं होती, और समय के साथ इस रिवाज में भी काफी बदलाव देखने को मिला है।

नजर लगने की धारणा से जुड़ी है जड़

इस परंपरा के पीछे की सबसे पुरानी वजह मानी जाती है 'नजर लगने' की धारणा। पुराने जमाने में यह माना जाता था कि मां अपनी संतान से इतना गहरा भावनात्मक लगाव रखती है कि उसकी नजर, चाहे अनजाने में ही सही, बच्चे के आने वाले वैवाहिक जीवन पर बुरा असर डाल सकती है। इसी वजह से मुख्य विवाह रस्म के दौरान मां को मंडप से दूर रखने की परिपाटी बनी। यह किसी वैज्ञानिक तथ्य पर आधारित नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से एक पुरानी लोक-मान्यता और सांस्कृतिक विश्वास है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता आया है।

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दूल्हे को दर्पण देकर मां देती है आशीर्वाद

दिलचस्प बात यह है कि इस परंपरा का मतलब यह कतई नहीं कि मां को पूरी शादी की प्रक्रिया से बाहर रखा जाता है। बंगाली शादियों में दूल्हा जब विवाह स्थल के लिए रवाना होता है, उससे पहले मां उसे आशीर्वाद देती है। कुछ पारिवारिक रिवाजों के मुताबिक इस मौके पर मां अपने बेटे को एक दर्पण भेंट करती है, जिसे बुरी नजर से बचाव का प्रतीक माना जाता है। आशीर्वाद देने के बाद मां दूल्हे के साथ बारात में नहीं जाती, बल्कि वह घर पर ही रहती है, जबकि दूल्हा परिवार और रिश्तेदारों के साथ विवाह स्थल के लिए निकल पड़ता है।

दुल्हन की मां निभाती है 'बोरन' की रस्म

दुल्हन पक्ष में भी मां की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। जब दूल्हा बारात लेकर विवाह स्थल पहुंचता है, तो कई पारंपरिक बंगाली शादियों में दुल्हन की मां ही उसका स्वागत करती है। इस स्वागत रस्म को 'बोरन' कहा जाता है, जिसमें मां आरती उतारती है, दूल्हे को मिठाई खिलाती है और कुछ अन्य पारंपरिक चीजों के जरिए उसका स्वागत करती है। यानी मां को शुभ मौके से पूरी तरह अलग नहीं रखा जाता, बल्कि सिर्फ मुख्य विवाह रस्म के उस हिस्से से दूरी की परंपरा रही है, जब फेरे या केंद्रीय अनुष्ठान होते हैं।

मां की भूमिका सिर्फ इन्हीं दो मौकों तक सीमित नहीं है। 'आइबुरो भात' नाम की रस्म में शादी से पहले मां अपने हाथ से बच्चे को खास भोजन खिलाती है। इसी तरह शादी के बाद जब नई बहू ससुराल पहुंचती है, तो उसका स्वागत करने वाली रस्मों में भी दूल्हे की मां की भूमिका काफी अहम होती है।

क्या आज भी हर घर में निभाई जाती है यह रस्म?

आधुनिक दौर में बंगाली शादियों का स्वरूप भी काफी बदल चुका है। खासकर शहरों में होने वाली शादियों में परिवार अपनी सहूलियत, आधुनिक सोच और निजी पसंद के हिसाब से कई पुरानी रस्मों में फेरबदल करते हैं या उन्हें पूरी तरह छोड़ देते हैं। इसलिए यह मान लेना ठीक नहीं होगा कि आज भी हर बंगाली शादी में मां मंडप से दूर ही रहती है। कुछ परिवार अब भी इस पुरानी परंपरा का पालन करते हैं, जबकि कई घरों में मां विवाह की मुख्य रस्म में भी पूरी तरह मौजूद रहती है और सक्रिय भूमिका निभाती है। कुल मिलाकर यह परंपरा वक्त, परिवार की सोच और पारिवारिक मान्यताओं के हिसाब से बदलती रहती है, न कि यह कोई सख्त धार्मिक बंधन है।

सवाल-जवाब

बंगाली शादियों में मां को मंडप से दूर क्यों रखा जाता था?
पुरानी मान्यता के अनुसार मां की नजर बच्चे के वैवाहिक जीवन पर बुरा असर डाल सकती है, इसी सोच से यह परंपरा बनी।
क्या मां पूरी शादी से गायब रहती है?
नहीं, मां दूल्हे को रवाना होने से पहले आशीर्वाद देती है और दुल्हन की मां 'बोरन' रस्म में दूल्हे का स्वागत करती है।
दर्पण देने की रस्म का क्या मतलब है?
मां दूल्हे को दर्पण भेंट करती है, जिसे बुरी नजर से बचाव का प्रतीक माना जाता है।
'बोरन' रस्म क्या है?
यह दुल्हन की मां द्वारा दूल्हे के विवाह स्थल पर पहुंचने पर आरती, मिठाई और अन्य पारंपरिक चीजों से किए जाने वाले स्वागत की रस्म है।
क्या आज भी सभी बंगाली शादियों में यह रिवाज निभाया जाता है?
नहीं, आधुनिक शहरी परिवार अपनी सुविधा और पसंद के अनुसार इस परंपरा को बदल या छोड़ देते हैं।
'आइबुरो भात' रस्म का शादी से क्या संबंध है?
इसमें शादी से पहले मां अपने हाथ से बच्चे को खास भोजन खिलाती है, जो मां-बच्चे के रिश्ते से जुड़ी एक और परंपरा है।
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