शेखावाटी में लोहार्गल 24 कोसी परिक्रमा शुरू: श्रद्धालुओं के लिए 80 विशेष बसें तैनात, पढ़ें रूट और ट्रैफिक नियमबारिश के पानी से बहा करंट, पनवेल की दहीहांडी में पांच झुलसे, दो बच्चे आईसीयू मेंवर्षा ऋतु में बनाएं पोषण से भरपूर पोई का साग, स्वाद और सेहत दोनों में है बेजोड़गरबा आयोजनों में मुस्लिम युवाओं की एंट्री रोकने के लिए VHP ने बनाया आधार और तिलक का नियम, विपक्ष ने बताया असंवैधानिकबुजुर्गों के दिल में आज भी बसी है अपने बच्चों की मासूम यादें, NHRC की रिपोर्ट में सामने आई चौंकाने वाली बातअंबिकापुर के सैनिक स्कूल के 10वीं के छात्र ने बना डाला संस्कृत सिखाने वाला डिजिटल पोर्टलराजस्थान के धौलपुर में उफनती चंबल ने बढ़ाई प्रशासन की चिंता, पार्वती बांध के चार गेट से छोड़ा गया भारी पानीमेड़ता के राजा को गुरु जंभेश्वर ने दी थी लकड़ी, यूं बनी नागौर के रोटू और गुलर की पहचानमहाराजगंज में घर में रखे हेलमेट में छिपे सांप ने ली 11 साल के बच्चे की जान, मां भी घायललखीमपुर खीरी के मुनीर खान ने बनाई बिना सुई के शुगर जांचने वाली एआई डिवाइस, ब्रिटेन में मिला डिजाइन पेटेंट
बुजुर्गों के दिल में आज भी बसी है अपने बच्चों की मासूम यादें, NHRC की रिपोर्ट में सामने आई चौंकाने वाली बातरिश्ते
6 सित॰ 2026, 12:54 pm (23 मिनट पहले)· 2

बुजुर्गों के दिल में आज भी बसी है अपने बच्चों की मासूम यादें, NHRC की रिपोर्ट में सामने आई चौंकाने वाली बात

NHRC की एक रिपोर्ट में सामने आया कि पूर्वोत्तर और पश्चिम भारत के वृद्धाश्रमों में रह रहे बुजुर्ग अपने जीवनसाथी से कहीं ज्यादा अपने बच्चों को याद करते हैं।

बच्चा जब पहली बार मां की गोद में आता है, उसी पल से माता-पिता की पूरी दुनिया उस एक नन्ही जान के इर्द-गिर्द सिमट जाती है। यह रिश्ता सिर्फ खून के कारण नहीं, बल्कि बरसों के त्याग, उम्मीदों और अनगिनत यादों की वजह से इतना गहरा हो जाता है कि उम्र भर टूटता नहीं। मां-बाप अपनी नींद, अपना चैन और कई बार अपने खुद के सपने तक बच्चों की खुशी के लिए दांव पर लगा देते हैं, और बदले में सिर्फ एक ही उम्मीद रखते हैं कि आने वाला बुढ़ापा सुकून से कटे।

NHRC की रिपोर्ट में क्या सामने आया

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग यानी NHRC की एक हालिया रिपोर्ट में दिलचस्प लेकिन भावुक कर देने वाला तथ्य सामने आया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्वोत्तर और पश्चिम भारत के वृद्धाश्रमों में समय बिता रहे बुजुर्गों के मन में जीवनसाथी की यादों से कहीं ज्यादा जगह उनके बच्चों की यादों ने बना रखी है। जिन बच्चों को कभी उंगली थामकर चलना और गिरकर संभलना सिखाया गया था, बड़े होने के बाद वही औलाद अपने बूढ़े मां-बाप को वृद्धाश्रम की चारदीवारी में छोड़ आई। फिर भी उन बुजुर्ग आंखों में उन्हीं बच्चों का इंतजार बना रहता है, यही इंसानी रिश्तों की सबसे अजीब और मार्मिक सच्चाई है।

ये भी पढ़ें

बच्चों की परवरिश में क्यों झोंक देते हैं मां-बाप पूरी जिंदगी

हर इंसान की जिंदगी तीन बड़े पड़ावों से होकर गुजरती है, बचपन, जवानी और फिर बुढ़ापा। बचपन में बच्चे की देखभाल, पढ़ाई-लिखाई और उसे काबिल बनाने की पूरी जिम्मेदारी मां-बाप उठाते हैं। इसके पीछे कोई स्वार्थ नहीं, बल्कि सिर्फ एक भरोसा काम करता है कि आने वाला बुढ़ापा चैन से गुजरेगा। इसे एक तरह का भावनात्मक निवेश भी कहा जा सकता है, जिसमें रिटर्न मिलने की कोई पक्की गारंटी नहीं होती, सिर्फ एक भरोसा होता है। इसी भरोसे के सहारे मां-बाप अपना सब कुछ बच्चों को इंसान बनाने में लगा देते हैं। यही वजह है कि सदियों से कहा जाता रहा है कि इंसान की सबसे बड़ी दौलत उसकी औलाद ही होती है।

बुढ़ापे में सहारा बनती हैं सिर्फ पुरानी यादें

वृद्धाश्रम में गुजर-बसर कर रहे बुजुर्गों के पास बचत के नाम पर सिर्फ अपने बच्चों के बचपन की मासूम यादें ही बचती हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि मां-बाप ने बच्चों के साथ चंद साल नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा जिया होता है। पैरेंट्स सिर्फ बच्चों की जरूरतें पूरी नहीं करते, बल्कि उनके सपनों को अपना सपना मान लेते हैं। स्कूल की फीस भरने से लेकर करियर संवारने और शादी रचाने तक, हर मोड़ पर उनकी मौजूदगी दर्ज रहती है। इसलिए जब उम्र के आखिरी पड़ाव में वही बच्चे दूर चले जाते हैं, तो घर में सिर्फ कमरे खाली नहीं होते, दिल का एक हिस्सा भी सूना पड़ जाता है।

जब बच्चे आगे बढ़ जाते हैं और मां-बाप पीछे छूट जाते हैं

अपने बच्चे को पहली बार गोद में उठाने, उसकी पहली मुस्कान देखने और उसका पहला कदम अपनी तरफ बढ़ता देखने का अहसास मां-बाप कभी भुला नहीं पाते। बच्चे के मन में अपने लिए प्यार देखकर और उसके दूर चले जाने के डर के बीच झूलते हुए ही एक पैरेंट रोज नई ऊर्जा के साथ जीना सीखता है। मगर बुढ़ापा वो पड़ाव होता है जब कई बार बच्चे जिंदगी की दौड़ में इतना आगे निकल जाते हैं कि पीछे मुड़कर देखना भी भूल जाते हैं। ऐसे वक्त में जब शरीर साथ नहीं देता, तो दिमाग उन्हीं मीठी यादों में सुकून तलाशता है जो जवानी के दिनों में जी गई थीं, और ज्यादातर मामलों में ये यादें सीधे अपने बच्चों से ही जुड़ी होती हैं।

रिश्तों की यह सच्चाई क्यों मायने रखती है

यह रिपोर्ट सिर्फ आंकड़ों का जिक्र नहीं करती, बल्कि समाज को आईना भी दिखाती है। यह बताती है कि उम्र के आखिरी पड़ाव में इंसान को सबसे ज्यादा जरूरत अपनों के साथ की होती है, न कि सुविधाओं की। वृद्धाश्रम में बैठा कोई भी बुजुर्ग शायद ही यह चाहता हो कि उसकी औलाद दूर रहे, फिर भी हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि यह दूरी बन ही जाती है। इसके बावजूद मां-बाप के दिल में बच्चों के लिए प्यार कभी कम नहीं होता, बल्कि उम्र के साथ यह और गहरा होता चला जाता है।

सवाल-जवाब

यह रिपोर्ट किसने जारी की?
यह रिपोर्ट राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग यानी NHRC ने जारी की है।
रिपोर्ट में किन इलाकों के वृद्धाश्रमों की बात की गई है?
रिपोर्ट में पूर्वोत्तर और पश्चिम भारत के वृद्धाश्रमों में रह रहे बुजुर्गों का जिक्र किया गया है।
बुजुर्ग अपने जीवनसाथी या बच्चों में से किसे ज्यादा याद करते हैं?
रिपोर्ट के मुताबिक वे अपने जीवनसाथी की तुलना में अपने बच्चों को ज्यादा याद करते हैं।
बुजुर्गों के मन में सबसे ज्यादा किस तरह की यादें रहती हैं?
उनके मन में बच्चों के बचपन से जुड़ी मासूम और प्यारी यादें सबसे ज्यादा रहती हैं।
मां-बाप बच्चों की परवरिश में इतनी मेहनत क्यों करते हैं?
उनका मानना होता है कि यह मेहनत उनके अपने बुढ़ापे को सुरक्षित और सुकूनभरा बनाएगी।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR