वैवाहिक जीवन में तकरार और शिकायतों का होना स्वाभाविक माना जाता रहा है, जहां असहमतियों पर आवाजें ऊंची होती थीं और मनमुटाव खुलकर सामने आते थे। समय के साथ दांपत्य जीवन के स्वरूप में एक मौन परिवर्तन देखा जा रहा है, जहां झगड़ों की जगह एक असहज सन्नाटा पसरने लगा है। बाहरी तौर पर घर की दिनचर्या सामान्य दिखती है, किंतु पति-पत्नी के बीच एक ऐसी अदृश्य दीवार खिंच जाती है जो उन्हें भावनात्मक रूप से पूरी तरह अलग-थलग कर देती है। आधुनिक समाज में इसी स्थिति को संबंधों में साइलेंट क्विटिंग की संज्ञा दी जा रही है।
कॉर्पोरेट संस्कृति से निकलकर निजी रिश्तों में पैठ बनाता नया चलन
साइलेंट क्विटिंग की अवधारणा मूल रूप से कार्यस्थलों और नौकरीपेशा परिवेश से उपजी थी। वहां कर्मचारी औपचारिक रूप से इस्तीफा दिए बिना केवल तयशुदा न्यूनतम जिम्मेदारियों तक सीमित हो जाते हैं और संस्थान के प्रति अपनी मानसिक निष्ठा समाप्त कर लेते हैं। अब यह प्रवृत्ति पारिवारिक और वैवाहिक धरातल पर भी स्पष्ट रूप से नजर आने लगी है। दांपत्य जीवन में इसका अर्थ कानूनी विच्छेद या घर छोड़ना नहीं है, बल्कि एक ही छत के नीचे रहते हुए अपने जीवनसाथी से मानसिक, स्नेहपूर्ण और आत्मीय संपर्क पूरी तरह खत्म कर लेना है। व्यक्ति विवाह के सामाजिक ढांचे में बना रहता है, किंतु मन के स्तर पर रिश्ते से त्यागपत्र दे चुका होता है।
भावनात्मक दूरी पनपने के मुख्य कारक
पति-पत्नी के बीच अचानक ऐसा सन्नाटा नहीं आता, बल्कि यह धीरे-धीरे कई अनदेखी परिस्थितियों के चलते गहराता है। आधुनिक जीवनशैली और प्राथमिकताओं में बदलाव ने इस स्थिति को खाद-पानी देने का काम किया है।
बीते दौर में जीवनसाथी दिन के अंत में एक-दूसरे के साथ बैठकर अपने अनुभव, सुख-दुख और विचार साझा किया करते थे। आधुनिक युग में डिजिटल उपकरणों और मोबाइल स्क्रीनों के अत्यधिक दखल ने इस आमने-सामने के संवाद को छीन लिया है। जब दोनों साथी अपने-अपने गैजेट्स में खोए रहते हैं, तो मन के संशय और शिकायतें भीतर ही घुटने लगती हैं। निरंतर दबाई गई यही शिकायतें धीरे-धीरे बड़ी संवादहीनता का रूप ले लेती हैं।
घर-परिवार के संचालन में वित्तीय और घरेलू जिम्मेदारियों का भारी दबाव होता है। गृहस्थी संभालना, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और परवरिश का ध्यान रखना, मकान या गाड़ी की ईएमआई का भुगतान समय पर करना और रसोई की व्यवस्था बनाए रखना अत्यंत श्रमसाध्य कार्य हैं। यदि इन दायित्वों में परस्पर सहयोग का अभाव हो जाए और संपूर्ण भार किसी एक साथी के कंधों पर आ गिरे, तो मन में भारी निराशा और कुंठा घर कर जाती है। अकेला पड़ चुका साथी यह महसूस करने लगता है कि जब जीवन की गाड़ी में साझेदारी ही नहीं है, तो फिर अपेक्षाएं रखने का कोई औचित्य नहीं बचता।
संबंधों की सबसे नाजुक डोर परस्पर सम्मान और प्राथमिकता पर टिकी होती है। जब कोई व्यक्ति अपने जीवनसाथी को अपनी प्राथमिकताओं की सूची में अंतिम स्थान पर रख देता है और उसकी भावनाओं, इच्छाओं तथा छोटी-छोटी व्यक्तिगत आवश्यकताओं की निरंतर उपेक्षा करता है, तो सामने वाला व्यक्ति भीतर से टूट जाता है। उसे लगने लगता है कि परिवार में उसकी उपस्थिति या अनुपस्थिति किसी के लिए कोई महत्व नहीं रखती, जिससे वह खुद को समेटने लगता है।
आज की आपाधापी भरी जीवनशैली, दफ्तर के ऊंचे लक्ष्य, कार्यस्थल का लगातार बढ़ता बोझ और पारिवारिक जिम्मेदारियों की चिंता लोगों की शारीरिक और मानसिक ऊर्जा को निचोड़ देती है। दिनभर के कड़े तनाव और भागदौड़ के बाद जब लोग घर लौटते हैं, तो उनके भीतर जीवनसाथी से जुड़ने, बातें करने या आत्मीय पल बिताने की न तो ऊर्जा शेष रहती है और न ही मानसिक तत्परता। ऊर्जा का यह दैनिक अभाव धीरे-धीरे संबंधों में एक भारी खाई का निर्माण कर देता है।
दांपत्य के ताने-बाने को कैसे भीतर से दीमक की तरह चाटती है यह खामोशी
साइलेंट क्विटिंग किसी अचानक आए तूफान या खुले विवाद की तरह प्रकट नहीं होती जो एक झटके में सबकुछ नष्ट कर दे। यह एक बेहद धीमी, अदृश्य और गंभीर प्रक्रिया है जो मौन रहकर रिश्ते की जड़ों को भीतर से कमजोर करती चली जाती है।
इस स्थिति का सबसे भ्रामक और खतरनाक पहलू यह है कि घर में वाद-विवाद और झगड़े पूरी तरह समाप्त हो जाते हैं। लोग बाहर से इसे शांति समझ सकते हैं, किंतु वास्तविकता में यह उम्मीद का अंत होता है। साथी यह मानकर चुप बैठ जाता है कि बात करने या बहस करने से कोई सुधार नहीं होने वाला। इसके साथ ही प्रेम, परवाह, चिंता और अपनेपन की स्वाभाविक अभिव्यक्तियां गायब हो जाती हैं। जीवनसाथी के आंसू, उसकी हंसी, उसकी परेशानियां या खुशियां दूसरे को बिल्कुल भी प्रभावित नहीं करतीं। स्थिति ऐसी हो जाती है कि दो लोग एक ही मकान में केवल अजनबी सह-किराएदारों की भांति अपनी जिंदगी काटने लगते हैं।
जब वैवाहिक जीवन में भावनात्मक संबल मिलना बंद हो जाता है, तो असुरक्षा और अविश्वास का वातावरण बनने लगता है। अपने सबसे करीबी इंसान से जब सहारा नहीं मिलता, तो मन गहरे अकेलेपन से घिर जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति अपनी पीड़ा साझा करने के लिए दांपत्य के दायरे से बाहर रास्ते तलाशने लगता है, जिससे वैवाहिक निष्ठा और परस्पर भरोसे की बुनियादी नींव डगमगा जाती है।
साथ रहते हुए भी निरंतर उपजा अकेलापन इंसान को मानसिक रूप से अस्वस्थ, व्यथित और कुंठित बना देता है। स्वभाव में चिड़चिड़ापन घर करने लगता है और दैनिक जीवन की बहुत सामान्य या छोटी-मोटी बातें भी पहाड़ जैसी विकराल नजर आने लगती हैं। यह स्थिति दोनों पक्षों के मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचाती है।
दूरी मिटाने और वैवाहिक जीवन को फिर से संवारने के व्यावहारिक उपाय
यदि किसी रिश्ते में ऐसी खामोशी या अलगाव के संकेत दिखने लगें, तो घबराने या तुरंत हार मानने के बजाय समय रहते गंभीर व ठोस प्रयास किए जाने चाहिए। थोड़ी सी सजगता और संवेदना से रिश्ते को दोबारा पटरी पर लाया जा सकता है।
अपने मन में दबी बातों और आहत भावनाओं को बिना किसी कटुता या तंज के अपने साथी के सामने खुलकर रखें। उन्हें आत्मीयता से समझाएं कि आप किस बात से दुखी हैं और क्या महसूस कर रहे हैं। दोषारोपण की जगह समाधान पर केंद्रित संवाद ही हर मनमुटाव का वास्तविक हल प्रस्तुत करता है।
दिनचर्या चाहे जितनी भी व्यस्त हो, सप्ताह में कुछ घंटे केवल एक-दूसरे के लिए सुरक्षित रखें। इस दौरान मोबाइल, लैपटॉप, टीवी या बच्चों की व्यस्तताओं को परे रखकर सिर्फ आपस में जुड़ें। साथ में टहलने जाना, एक कप चाय पीना या रात के भोजन के लिए बाहर जाना परस्पर निकटता को फिर से जीवित कर सकता है।
जीवनसाथी के छोटे-छोटे प्रयासों की सराहना करना सीखें। यदि उन्होंने घरेलू कार्यों में हाथ बंटाया है या अत्यधिक व्यस्तता के बावजूद आपका ध्यान रखा है, तो एक सच्चा धन्यवाद या स्नेह भरा स्पर्श अत्यंत प्रभावी सिद्ध होता है। उन्हें यह निरंतर महसूस कराएं कि वे आपके जीवन में बेहद खास स्थान रखते हैं।
यदि संवाद के सभी रास्ते बंद जान पड़ते हों और आपसी बातचीत से बात न बन पा रही हो, तो किसी प्रशिक्षित मैरिज काउंसलर या थेरेपिस्ट से मिलने में कतई संकोच नहीं करना चाहिए। एक निष्पक्ष तीसरा पेशेवर अक्सर उन अंधेरे कोनों को उजागर कर देता है जिन्हें उलझे हुए साथी खुद देख पाने में असमर्थ होते हैं। विवाह कोई औपचारिक बंधन नहीं, बल्कि एक कोमल पौधे के समान है जिसकी हर रोज समय, स्नेह, आपसी बातचीत और समुचित देखभाल से सिंचाई करनी होती है।



















