आमतौर पर समाज में यह धारणा आम है कि जो लोग बेहद धार्मिक होते हैं, जिनका दिन सुबह भगवान के वंदन, स्नान, पूजा-पाठ, सात्विक खान-पान, शाकाहार और शांत स्वभाव के साथ गुजरता है, उनकी रुचि अंतरंगता में कम होती होगी। लोग अक्सर सोचते हैं कि ऐसे शांत और पूजा-पाठ में रमे रहने वाले जोड़े शारीरिक संबंधों को लेकर बहुत ज्यादा उत्साहित नहीं होते होंगे। लेकिन इस पारंपरिक सोच के विपरीत, अमेरिका में सामने आए एक नए अध्ययन ने बेहद हैरान करने वाली तस्वीर पेश की है। शोध के आंकड़े बताते हैं कि आस्थावान और धार्मिक प्रवृत्ति वाले लोग सेक्युलर यानी गैर-धार्मिक जीवनशैली अपनाने वालों की तुलना में काफी ज्यादा बार शारीरिक संबंध बनाते हैं।
वैश्विक स्तर पर अंतरंगता में गिरावट का दौर
यह अध्ययन अमेरिका में इंस्टीट्यूट फॉर फैमिली स्टडीज की ओर से किया गया है। शोध के विश्लेषण से यह तथ्य सामने आया है कि जो जोड़े नियमित रूप से प्रार्थना स्थलों या चर्च में उपस्थित होते हैं, वे आम सेक्युलर जोड़ों की तुलना में बहुत अधिक सक्रिय यौन जीवन जीते हैं। हालांकि इस अध्ययन में प्रमुख रूप से ईसाई समुदाय के लोग शामिल थे, लेकिन शोधकर्ताओं ने पाया कि अन्य धर्मों के मानने वाले जोड़ों में भी लगभग ऐसा ही रुख देखने को मिलता है। इस अध्ययन का सबसे अहम पहलू यह रहा कि धार्मिक जीवन जीने वाले लोग सिर्फ संख्या के मामले में ही आगे नहीं हैं, बल्कि वे शारीरिक संबंधों में मानसिक और भावनात्मक रूप से भी कहीं अधिक संतुष्ट महसूस करते हैं। इसके विपरीत सेक्युलर जोड़ों में असंतोष और अतृप्ति का स्तर तुलनात्मक रूप से ज्यादा पाया गया।
यह शोध ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिका सहित दुनिया के कई विकसित देशों में अंतरंग संबंधों में भारी गिरावट देखी जा रही है। आधुनिक दौर में युवाओं के भीतर शारीरिक संबंधों को लेकर पहले जैसा उत्साह कम हो रहा है। अगर जापान और कई यूरोपीय देशों की बात करें, तो वहां ऐसे युगलों की संख्या काफी बड़ी है जो कई-कई महीनों तक किसी तरह का शारीरिक संबंध नहीं बनाते। अंतरंगता के इस गिरते वैश्विक दौर में धार्मिक और सेक्युलर जोड़ों के बीच बढ़ता यह अंतर समाजशास्त्रियों के लिए काफी चौंकाने वाला विषय बन गया है।
आंकड़ों में धार्मिक बनाम सेक्युलर जोड़ों का जीवन
अगर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर नजर डालें, तो 1990 के दशक में 20 से 54 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 64 प्रतिशत जोड़े सप्ताह में कम से कम एक बार जरूर शारीरिक संबंध बनाते थे। उस दौर में अधिकांश लोग इससे भी अधिक बार अंतरंग होते थे और धार्मिक या सेक्युलर जीवनशैली के आधार पर कोई खास अंतर दिखाई नहीं देता था। समाज के हर वर्ग और हर सोच के लोग एक जैसे ढर्रे पर थे। लेकिन बीते कुछ दशकों में सेक्युलर लोगों के जीवन में भारी बदलाव आया है और उनके बीच यह प्रवृत्ति बहुत घट गई है।
शोध के नए आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि वर्तमान समय में केवल 48 प्रतिशत सेक्युलर लोग ही नियमित रूप से शारीरिक संबंध बना पाते हैं, जबकि शेष लोग महीनों तक अंतरंगता से दूर रहते हैं। वहीं दूसरी तरफ, धार्मिक प्रवृत्ति के 62 प्रतिशत जोड़े आज भी नियमित रूप से शारीरिक संबंध बनाते हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि वर्तमान अमेरिकी समाज में आस्था रखने वाले और धार्मिक मूल्यों को मानने वाले लोग ही अपनी अंतरंग जिंदगी को अधिक सक्रिय बनाए हुए हैं। अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि जब विवाह और शारीरिक संबंधों को केवल एक जैविक जरूरत न मानकर पवित्रता के भाव से जोड़ा जाता है, तो परिवार और रिश्ते में सहज स्वीकार्यता का माहौल तैयार होता है। इस माहौल में शारीरिक संबंधों को हीन भावना से देखने के बजाय सम्मान और उत्साह मिलता है, जिससे दोनों साझेदारों को गहरा संतोष प्राप्त होता है।
धार्मिक जोड़ों में अधिक संतुष्टि की मुख्य वजहें
अध्ययन में इस बात का भी गहरा विश्लेषण किया गया है कि आखिर धार्मिक पृष्ठभूमि वाले जोड़ों में यौन संतुष्टि इतनी ज्यादा क्यों पाई जाती है। रिपोर्ट बताती है कि धार्मिक मान्यताओं का पालन करने वाले लोगों में क्षमाशीलता, आपसी वफादारी और एक-दूसरे के प्रति समर्पण जैसे गुण अपेक्षाकृत अधिक मजबूत होते हैं। चूंकि वे अपने धर्म के नैतिक सिद्धांतों के तहत इन मूल्यों का आचरण करते हैं, इसलिए वैवाहिक जीवन में आने वाली रोजमर्रा की दिक्कतों, मनमुटाव और तनाव का समाधान वे शांतिपूर्वक निकाल लेते हैं।
धार्मिक आस्था रखने वाले दंपत्ति रिश्ते की शुरुआत से ही इस बात को प्राथमिकता देते हैं कि आपसी समझ में किसी भी छोटी-मोटी गलतफहमी या अड़चन को दीवार न बनने दिया जाए। इसके अलावा, साथ मिलकर की जाने वाली प्रार्थना और धार्मिक अनुष्ठान दोनों के बीच केवल भावनात्मक जुड़ाव ही नहीं बढ़ाते, बल्कि उन्हें शारीरिक रूप से भी एक-दूसरे के करीब लाते हैं। ऐसे जोड़े पारिवारिक और सामाजिक जीवन से उपजे तनावों को संतुलित तरीके से संभाल लेते हैं। यही प्रमुख कारण है कि रोजाना प्रार्थना करने वाले श्रद्धालुओं में यौन संतुष्टि का स्तर, नियमित प्रार्थना न करने वाले लोगों की तुलना में 1.29 गुना अधिक दर्ज किया गया है।



















