भाद्रपद माह में बछ बारस यानी गोवत्स द्वादशी का पर्व इस साल 7 सितंबर 2026 को, यानी आज मनाया जा रहा है। इस दिन का सबसे खास हिस्सा वह पुरानी सास-बहू की कथा है, जो बताती है कि सच्चे मन से मांगी गई प्रार्थना और गौ माता की सेवा किस तरह बड़ी से बड़ी मुसीबत को भी टाल देती है। इसी वजह से बछ बारस के दिन हर घर में यह कथा सुनने-सुनाने की परंपरा है।
आज का पूजा मुहूर्त और मंदिरों की रौनक
बछ बारस के दिन महिलाएं अपनी संतान की भलाई के लिए व्रत रखती हैं और विधि विधान से भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करती हैं। भगवान श्रीकृष्ण के मंदिरों में उनकी गोचारण लीलाओं की झांकियां सजाई जाती हैं, यानी बाल कृष्ण गायों को चराते हुए किस तरह वन में विचरण करते थे, उसे मूर्तियों और सजावट के जरिए दिखाया जाता है। इस पर्व पर गाय और उसके बछड़े की पूजा को खास दर्जा दिया गया है। शास्त्रों के मुताबिक गोवत्स द्वादशी की पूजा गोधूलि काल में करना शुभ माना जाता है, यानी जब शाम को गायें चरकर घर लौटती हैं, ठीक उसी वक्त। इस साल यह शुभ मुहूर्त शाम 06:36 बजे से रात 08:53 बजे तक रहेगा, यानी जो महिलाएं आज पूजा करना चाहती हैं, उन्हें इसी समय के भीतर विधि पूरी करनी होगी।
सास ने कहा गेहूंले-जौले उबाल दो, बहू ने कर दी बड़ी गलती
बछ बारस से जुड़ी लोककथा एक सास और बहू के इर्द-गिर्द घूमती है। कथा के मुताबिक एक दिन सास को गाय चराने जंगल जाना था और उसी दिन भाद्रपद मास की बछ बारस भी पड़ रही थी। जंगल जाते वक्त सास ने बहू से कहा कि वह गाय चराने जा रही है, तब तक बहू गेहूंले-जौले यानी गेहूं और जौ को उबाल ले। दिक्कत यह थी कि उसी घर में पाले गए गाय के दो बछड़ों के नाम भी गेहूंले और जौले ही थे। बहू यह सुनकर उलझन में पड़ गई कि सास ने आखिर बछड़े को उबालने के लिए क्यों कहा। असल में सास का इशारा अनाज गेहूं और जौ की ओर था, लेकिन बहू शब्दों का यह भेद समझ नहीं पाई। सास की आज्ञा मानते हुए उसने अनाज की जगह गलती से बछड़े को ही उबाल दिया।
हांडी टूटी और बछड़े जीवित बाहर निकल आए
शाम को गाय चराकर लौटी सास ने बहू से कहा कि आज बछ बारस है, इसलिए गेहूंले-जौले को बाद में देखेंगे, पहले गाय और बछड़े की पूजा करेंगे। यह सुनते ही बहू का चेहरा उतर गया और वह डर के मारे कांपने लगी। उसने मन ही मन बछ बारस माता से प्रार्थना करनी शुरू कर दी कि आज उसकी लाज माता के हाथ में है। कहा जाता है कि बहू की इस सच्ची और भोली प्रार्थना पर बछ बारस माता को दया आ गई। जिस हांडी में बछड़े को उबाला गया था, वह अचानक टूट गई और दोनों बछड़े जीवित होकर बाहर निकल आए। हैरानी की बात यह रही कि हांडी का एक टुकड़ा फिर भी बछड़ों के गले में लटका रह गया, मानो सबूत के तौर पर। यह देखकर सास ने हैरान होकर पूछा कि यह क्या है। तब बहू रोते हुए सारी सच्चाई बता बैठी और बोली कि बछ बारस माता ने ही उसकी लाज रख ली, भगवान ने उसका सत बनाए रखा और बछड़ों को नया जीवन दे दिया।
इसी कथा से जुड़े हैं आज के खान-पान के नियम
इसी घटना के चलते मान्यता है कि बछ बारस के दिन गेहूं, गाय का दूध और दूध से बनी हर चीज खाने से परहेज किया जाता है। साथ ही इस दिन चाकू या किसी भी धारदार चीज से काटे गए फल और सब्जियां खाना भी वर्जित माना गया है, क्योंकि कथा में हांडी टूटने और बछड़ों की जान पर बन आने की घटना जुड़ी है। इसी वजह से लोग आज के दिन बिना काटी सब्जियां और फल ही खाना पसंद करते हैं। कथा के अंत में यह प्रार्थना दोहराई जाती है कि जिस तरह बछ बारस माता ने सास और बहू दोनों की लाज रखी, उसी तरह अपनी कृपा हर घर पर बनाए रखे। इसके साथ ही बछ बारस माता और गौ माता की जय बोलकर कथा का समापन किया जाता है।



















