नवरात्रि शुरू होने में अब कुछ ही हफ्ते बचे हैं और इससे पहले महाराष्ट्र में गरबा-डांडिया आयोजनों को लेकर सियासी माहौल गरमा गया है. विश्व हिंदू परिषद ने राज्यभर में अगले महीने होने वाले गरबा और डांडिया कार्यक्रमों में मुस्लिम समुदाय के लोगों को शामिल होने से रोकने का फैसला किया है, और इसके लिए आयोजकों को कुछ खास निर्देश भी भेजे गए हैं.
प्रवेश से पहले आधार कार्ड और तिलक की शर्त
संगठन ने आयोजन समितियों से कहा है कि गरबा पंडाल में दाखिल होने वाले हर व्यक्ति की हिंदू पहचान पक्की करने के लिए दो तरीके अपनाए जाएं, पहला आधार कार्ड दिखवाना और दूसरा माथे पर तिलक लगवाना. संगठन का तर्क है कि इन दोनों कदमों से यह साफ हो सकेगा कि कार्यक्रम में शामिल होने वाला व्यक्ति किस समुदाय से है, और इसी आधार पर मुस्लिम समुदाय के लोगों की एंट्री रोकी जा सकेगी. यह पूरी कवायद संगठन की ओर से जारी दिशानिर्देशों का हिस्सा है, जिसे आयोजकों तक पहुंचाया गया है. VHP के प्रवक्ता और संयुक्त सचिव श्रीराज नायर ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि संगठन ने जानबूझकर यह रास्ता चुना है ताकि गरबा और डांडिया जैसे आयोजनों में मुस्लिम समुदाय के सदस्य शामिल न हो सकें.
विपक्ष का पलटवार, संविधान का हवाला
VHP के इस कदम पर विपक्षी खेमे से तीखी टिप्पणियां आनी शुरू हो गई हैं. शिवसेना (UBT) के सांसद संजय राउत ने संगठन को सीधे निशाने पर लेते हुए सुझाव दिया कि उसे RSS प्रमुख मोहन भागवत का न्यूयॉर्क में दिया गया हालिया भाषण एक बार फिर सुन लेना चाहिए. उनका इशारा इस ओर था कि क्या VHP खुद अपने ही संगठन प्रमुख की बातों से इत्तेफाक नहीं रखता. दूसरी ओर कांग्रेस विधायक अमीन पटेल ने इस मुद्दे को कानूनी नजरिए से देखा. उनका कहना है कि किसी समुदाय को धार्मिक उत्सवों में हिस्सा लेने से रोकना संविधान की मूल भावना के खिलाफ जाता है. पटेल ने यह सवाल भी उठाया कि आखिर किसी नागरिक की धार्मिक पहचान जांचकर उसे किसी सार्वजनिक आयोजन से बाहर रखना किस कानून के दायरे में आता है. इन बयानों के बाद नवरात्रि से पहले ही महाराष्ट्र में गरबा-डांडिया को लेकर राजनीतिक तापमान काफी बढ़ गया है.
अब कोलकाता की दुर्गा पूजा पर भी दिशानिर्देश
सिर्फ महाराष्ट्र ही नहीं, पश्चिम बंगाल में भी VHP की सक्रियता से जुड़ी बहस छिड़ी है, इस बार मामला दुर्गा पूजा से जुड़ा है. 26 अगस्त को कोलकाता में हुए एक कार्यक्रम में VHP से जुड़े लोगों ने पूजा आयोजकों को पूजा की परंपरा, प्रतिमा के रूप-रंग, आयोजन में भागीदारी और पंडालों में परोसे जाने वाले खाने को लेकर विशेष सुझाव दिए. इस कार्यक्रम में मौजूद सनातन संस्कृति संसद के सचिव स्वामी निर्गुणानंद ने कहा कि दुर्गा पूजा एक हिंदू पर्व है, इसलिए इसे संभालने और चलाने की जिम्मेदारी हिंदू समुदाय के पास ही होनी चाहिए. उन्होंने पंडालों में सनातनी रीति-रिवाजों को तरजीह देने और वहां मांसाहारी खाना परोसने से बचने की बात कही, ताकि पूजा स्थल की पवित्रता बनी रहे. हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि अन्य धर्मों के लोग पूजा देखने पंडालों में आ सकते हैं, सिर्फ आयोजन चलाने और धार्मिक रस्में निभाने का जिम्मा हिंदू समुदाय का ही रहना चाहिए.
यूनेस्को की मान्यता और सांस्कृतिक पहचान का सवाल
VHP के इन सुझावों को लेकर सोशल मीडिया पर भी लोग बंटे हुए नजर आए. एक वर्ग का मानना है कि बंगाल की दुर्गा पूजा पिछले कई दशकों में सिर्फ धार्मिक रस्म न रहकर एक बड़े सामाजिक-सांस्कृतिक उत्सव में बदल चुकी है, इसलिए उस पर इस तरह की सीमाएं थोपना ठीक नहीं. गौरतलब है कि दिसंबर 2021 में कोलकाता की दुर्गा पूजा को यूनेस्को ने अपनी अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में जगह दी थी. यूनेस्को ने उस वक्त इसे धर्म, कला, हस्तशिल्प और अलग-अलग समुदायों की सहभागिता का एक दुर्लभ संगम बताया था. कुम्हारटोली के कारीगरों की बनाई प्रतिमाएं, शहर भर में सजने वाले भव्य पंडाल, ढाक की थाप और हर वर्ग के लोगों की मौजूदगी, यही सब मिलकर दुर्गा पूजा को सिर्फ एक धार्मिक आयोजन से कहीं आगे ले जाते हैं. ऐसे में VHP के नए निर्देशों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है, क्या बंगाल की दुर्गा पूजा को अब सिर्फ धार्मिक दायरे में समेटा जाए, या फिर उसकी वह खुली, सामूहिक और सांस्कृतिक पहचान बनी रहने दी जाए जिसने उसे दुनियाभर में पहचान दिलाई है.


















