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बागेश्वर के बाबा बागनाथ मंदिर में शिव पूजा का सही नियम क्या है? सावन में इस तरह अभिषेक करने से मिलेगा विशेष फलधर्म
22 जुल॰ 2026, 4:19 pm (21 घंटे पहले)· 0

बागेश्वर के बाबा बागनाथ मंदिर में शिव पूजा का सही नियम क्या है? सावन में इस तरह अभिषेक करने से मिलेगा विशेष फल

उत्तराखंड के बागेश्वर स्थित बाबा बागनाथ मंदिर में सावन के महीने में पूजा का विशेष विधान है। पंडित कैलाश उपाध्याय के अनुसार, संगम स्नान से लेकर कच्चे दूध से अभिषेक करने और सात्विक नियमों का पालन करने तक, सही विधि से की गई शिव आराधना जीवन में अपार सुख-शांति लाती है।

भगवान शिव की आराधना के लिए सावन के महीने को अत्यंत पावन और फलदायी माना जाता है। इस पवित्र माह के दौरान उत्तराखंड का ऐतिहासिक शहर बागेश्वर शिवभक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र बन जाता है। सरयू और गोमती नदी के पवित्र संगम तट पर विराजमान बाबा बागनाथ मंदिर में इन दिनों श्रद्धालुओं का भारी हुजूम उमड़ रहा है। स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन के महीने में इस मंदिर में पूरी श्रद्धा और वैदिक विधि-विधान के साथ भगवान शिव का जलाभिषेक करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। ऐसा माना जाता है कि बाबा बागनाथ के दरबार में सच्चे मन से की गई प्रार्थना जीवन में अपार सुख, निरंतर समृद्धि और गहरी मानसिक शांति का आशीर्वाद लेकर आती है।

संगम स्नान और जलाभिषेक की सही विधि

बाबा बागनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना की एक विशिष्ट और प्राचीन परंपरा है, जिसका पालन करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है। पंडित कैलाश उपाध्याय इस पवित्र पूजा की सटीक और क्रमबद्ध विधि के बारे में विस्तार से बताते हैं। उनके अनुसार, मंदिर में प्रवेश करने से पूर्व भक्तों को सबसे पहले सरयू और गोमती नदी के पावन संगम में स्नान करना चाहिए। यदि किसी कारणवश पूरा स्नान संभव न हो, तो कम से कम संगम के जल से आचमन करके स्वयं को शुद्ध करना अनिवार्य है। शारीरिक और आत्मिक शुद्धि के पश्चात, श्रद्धालुओं को तांबे या पीतल के पवित्र लोटे में संगम का जल भरकर मंदिर के गर्भगृह की ओर प्रस्थान करना चाहिए।

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गर्भगृह में पहुंचने के बाद मुख्य जलाभिषेक की प्रक्रिया आरंभ होती है। सबसे पहले शिवलिंग पर संगम नदी का वही जल अत्यंत श्रद्धापूर्वक अर्पित किया जाता है। जल चढ़ाने के तुरंत बाद, भगवान शिव को गाय का कच्चा दूध अर्पित किया जाता है। इसके पश्चात, एक बार फिर से शुद्ध और स्वच्छ जल से शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है। जल, कच्चा दूध और फिर से जल चढ़ाने का यह विशेष अनुक्रम भगवान शिव को अत्यंत प्रिय माना गया है, और सावन में इसी विधि से अभिषेक करने की प्रमुख परंपरा है।

शृंगार और पूजन सामग्री का महत्व

जलाभिषेक की प्रक्रिया संपन्न होने के बाद, भगवान शिव के शृंगार और उन्हें विभिन्न पवित्र वस्तुएं अर्पित करने का विधान है। पंडित कैलाश उपाध्याय बताते हैं कि स्नान के बाद सबसे पहले शिवलिंग पर शुद्ध सफेद चंदन का लेप या तिलक लगाया जाता है। इसके पश्चात, भगवान को प्रसन्न करने के लिए विशेष पूजन सामग्री चढ़ाई जाती है। इसमें मुख्य रूप से तीन या पांच पत्तों वाला अखंडित बेलपत्र, धतूरा, भांग और अक्षत (साबुत चावल) शामिल होते हैं। इन सामग्रियों के साथ-साथ शिवलिंग पर सफेद रंग के ताजे फूल, ऋतु के अनुसार मिलने वाले मौसमी फल और शुद्ध सफेद मिठाई का भोग लगाया जाता है। यह सभी सामग्रियां अर्पित करने के बाद, सुगन्धित धूप और शुद्ध देसी घी का दीपक प्रज्वलित करके भगवान शिव की भव्य आरती संपन्न की जाती है।

मंत्र जाप का प्रभाव और दर्शन का सर्वोत्तम समय

सावन की पूजा में मंत्रों के उच्चारण का विशेष महत्व होता है। मंदिर में पूजा के दौरान श्रद्धालुओं को "ॐ नमः शिवाय" या परम शक्तिशाली महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने की सलाह दी जाती है। विधान के अनुसार, इन मंत्रों का कम से कम 108 बार जाप अवश्य करना चाहिए। धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के आधार पर, महामृत्युंजय मंत्र का निरंतर जाप करने से व्यक्ति को असीम मानसिक शांति प्राप्त होती है, उत्तम स्वास्थ्य का वरदान मिलता है और शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का अत्यधिक संचार होता है।

यूं तो पूरे सावन माह में मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन प्रत्येक सोमवार को श्रद्धालुओं की भीड़ सामान्य दिनों के मुकाबले कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे में जो श्रद्धालु बिना किसी व्यवधान के और शांत माहौल में दर्शन करना चाहते हैं, उनके लिए ब्रह्म मुहूर्त का समय सबसे उत्तम माना गया है। सुबह 4 बजे से लेकर 6 बजे के बीच बाबा बागनाथ मंदिर पहुंचना सबसे सुविधाजनक रहता है। इस समय मंदिर परिसर में भीड़ अपेक्षाकृत काफी कम होती है, जिससे श्रद्धालु बिना किसी धक्के-मुक्की के, अत्यंत शांत और आध्यात्मिक वातावरण में अपनी पूजा और ध्यान संपन्न कर सकते हैं।

पूजा के नियम, स्वच्छता और सात्विक आहार

भगवान शिव की पूजा में नियमों का पालन और पूर्ण शुद्धता का विशेष ध्यान रखना आवश्यक होता है। पंडित कैलाश उपाध्याय के अनुसार, शिवलिंग पर हमेशा बिल्कुल ताजी और स्वच्छ सामग्री ही चढ़ानी चाहिए, बासी या अपवित्र चीजों का प्रयोग वर्जित है। बेलपत्र चढ़ाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि पत्ते का चिकना हिस्सा शिवलिंग की तरफ (नीचे की ओर) हो। इसके अलावा, कहीं से भी कटे-फटे, खंडित या पूरी तरह सूख चुके बेलपत्र का उपयोग पूजा में बिल्कुल नहीं करना चाहिए।

व्यक्तिगत पूजा के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए। पूजा पूरी होने के बाद हर भक्त का यह कर्तव्य है कि वह मंदिर परिसर और सरयू-गोमती संगम क्षेत्र की साफ-सफाई और पवित्रता को बनाए रखे। वहां किसी भी प्रकार का प्लास्टिक या अन्य कचरा इधर-उधर फेंकने से बचना चाहिए। जो श्रद्धालु सावन के इस पवित्र महीने में व्रत रख रहे हैं, उन्हें अपने खान-पान पर कड़ा नियंत्रण रखना चाहिए। ऐसे भक्तों को केवल सात्विक भोजन ही ग्रहण करना चाहिए तथा किसी भी परिस्थिति में प्याज, लहसुन, मांसाहार और हर तरह के नशीले पदार्थों के सेवन से पूरी तरह दूर रहना चाहिए। यह दृढ़ मान्यता है कि पूरे संयम, अगाध श्रद्धा और कड़े नियमों के साथ की गई पूजा ही भगवान शिव को शीघ्र प्रसन्न करने का सबसे सशक्त माध्यम है।

सवाल-जवाब

बाबा बागनाथ मंदिर कहाँ स्थित है?
यह मंदिर उत्तराखंड के बागेश्वर शहर में सरयू और गोमती नदी के पवित्र संगम पर स्थित है।
जलाभिषेक की सही विधि क्या है?
भक्तों को सबसे पहले संगम का जल, फिर गाय का कच्चा दूध, और अंत में दोबारा शुद्ध जल शिवलिंग पर अर्पित करना चाहिए।
बेलपत्र चढ़ाते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
बेलपत्र का चिकना भाग हमेशा शिवलिंग की ओर होना चाहिए और कभी भी कटा-फटा या सूखा बेलपत्र नहीं चढ़ाना चाहिए।
मंदिर में दर्शन का सबसे अच्छा समय कौन सा है?
शांतिपूर्ण दर्शन के लिए सुबह 4 बजे से 6 बजे के बीच का समय सबसे अच्छा है, क्योंकि इस दौरान भीड़ काफी कम होती है।
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