उत्तर प्रदेश राज्य के महराजगंज जिले में स्थित सिसवा क्षेत्र के बरहड़ा महंत गांव का ऐतिहासिक जगन्नाथ मंदिर लगभग 240 वर्षों से श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र बना हुआ है। ओडिशा के सुप्रसिद्ध पुरी जगन्नाथ मंदिर की एक शाखा माना जाने वाला यह पवित्र स्थल अपने अनोखे इतिहास, प्राचीन वास्तुकला और जीवंत धार्मिक आयोजनों के कारण पूरे क्षेत्र में एक विशेष पहचान रखता है।
स्वप्न में मिले आदेश और नेपाल नरेश के सहयोग की कहानी
इस पावन धाम की स्थापना का इतिहास सन् 1786 ईस्वी से जुड़ा हुआ है। उस समय वैष्णव रामानुज दास के नेतृत्व में साधु-संतों का एक समूह मुक्तिनारायण की धार्मिक पदयात्रा पर निकला था। रास्ते में रात्रि विश्राम के दौरान संतों को एक दिव्य स्वप्न आया, जिसमें इस भूमि को अत्यंत पवित्र तथा कठोर साधना के लिए उपयुक्त बताया गया। स्वप्न में ही निर्देश मिला कि इस पावन स्थान पर भगवान जगन्नाथ के विग्रह की स्थापना की जानी चाहिए।
जब इस अद्भुत स्वप्न वृत्तांत की जानकारी तत्कालीन नेपाल के राजा को मिली, तो उन्होंने मंदिर निर्माण और स्थापना के कार्य में संपूर्ण सहयोग देने का वचन दिया। नेपाल नरेश से मिले इस ठोस आश्वासन के उपरांत संत वैष्णव रामानुज दास स्वयं ओडिशा स्थित जगन्नाथ पुरी गए। वहां से वे नियमानुसार भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा और बलराम के पवित्र विग्रह लेकर बरहड़ा महंत गांव पहुंचे और पूरे विधि-विधान के साथ मंदिर की स्थापना संपन्न कराई।
पुरी धाम की परंपराएं और प्रमुख वार्षिक उत्सव
वर्तमान समय में इस धाम के मठाधीश महंत संकर्षण रामानुज दास के अनुसार, यह मंदिर जगन्नाथ पुरी की परंपराओं का पूर्ण निष्ठा से पालन करता है। मंदिर में दैनिक पूजा-अर्चना से लेकर सभी प्रमुख अनुष्ठान एवं धार्मिक नियम पुरी के जगन्नाथ मंदिर की पद्धतियों के अनुसार ही संचालित किए जाते हैं।
प्रत्येक वर्ष यहां विभिन्न पावन अवसरों पर भव्य कार्यक्रमों का आयोजन होता है। आषाढ़ मास में निकलने वाली प्रसिद्ध रथ यात्रा, श्रावण का झुलोत्सव, विजयादशमी तथा दीपावली के बाद मनाया जाने वाला अन्नकूट उत्सव यहां बेहद उल्लास के साथ आयोजित किए जाते हैं। इन पावन अवसरों पर मंदिर परिसर में दूर-दूर से आए हजारों श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगता है।
प्राचीन वास्तुकला और कभी न सूखने वाले कुएं का रहस्य
दो शताब्दियों से भी अधिक पुराने इस मंदिर की दीवारें अपनी प्राचीनता और स्थापत्य कला की गवाही देती हैं। दीवारों पर उकेरी गई सुंदर कलाकृतियां तथा नक्काशीदार संरचनाएं आज भी अत्यंत आकर्षक एवं नयनाभिराम दिखाई देती हैं।
मंदिर प्रांगण में एक बेहद प्राचीन कुआं भी स्थित है, जो श्रद्धालुओं के लिए विशेष आश्चर्य और श्रद्धा का विषय है। स्थानीय निवासियों के अनुसार, इस ऐतिहासिक कुएं का जल आज तक कभी नहीं सूखा है। प्राचीन काल से लेकर आज तक स्थानीय लोग और मंदिर आने वाले भक्त इस पवित्र कुएं के जल का नियमित उपयोग करते हैं।
यह ऐतिहासिक धार्मिक स्थल न केवल महराजगंज जनपद के लोगों के लिए आस्था का केंद्र है, बल्कि पड़ोसी राज्य बिहार और सीमावर्ती देश नेपाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन और पूजन के लिए आते हैं। यही कारण है कि यह स्थल महराजगंज जिले के सबसे प्राचीन और प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक के रूप में प्रतिष्ठित है।



















