मऊ में उदासीन संगत आश्रम के महंत सत्यनाम दास के अनुसार, उदासीन आचार्य जगतगुरु श्री श्री चंद्र भगवान की जीवन गाथा बेहद अनोखी है। वह ऐसे तपस्वी थे जिन्होंने 149 वर्षों तक उदासीन संप्रदाय का नेतृत्व किया और आंखों से ओझल होकर अदृश्य हो गए। उदासीन संप्रदाय के अनुयायी आज भी उन्हें जीवित मानकर अपना आचार्य मानते हैं और उनके बताए गए निर्देशों पर चलते हैं। उनकी गुरु परंपरा सीधे ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों सनक, सनन्दन, सनातन और सनत कुमार सिंह से जुड़ी है, और इसी परंपरा में गुरु नानक देव जी के बड़े बेटे श्री चंद भगवान शामिल हुए थे।
देश के विभिन्न हिस्सों के अलावा विदेशों में भी उनके कई मंदिर स्थापित हैं। भगवान उदासीन आचार्य श्री चंद ने केवल उदासीन संप्रदाय को सही दिशा ही नहीं दी, बल्कि संपूर्ण मानव समाज के कल्याण के लिए कई कार्य किए। उन्होंने पूरी तरह से त्यागी जीवन जीते हुए समाज का मार्गदर्शन किया। उनके चमत्कारों की सूची में अंतिम बड़ा चमत्कार हिमाचल प्रदेश के चंबा क्षेत्र में रवि नदी के पास देखने को मिला था, जब वह एक घने जंगल की तरफ जा रहे थे।
घटना के समय जब वह नदी के तट पर पहुंचे तो एक नाविक अपनी नाव आगे बढ़ा चुका था। नाविक ने तपस्वी श्री चंद भगवान से कहा कि आप तो महंत हैं, आपको नाव की क्या आवश्यकता है, आप तो अपनी शक्ति से कहीं भी नदी पार कर सकते हैं। इसके बाद उन्होंने अपना चिमटा उठाया और नदी पार कराने को कहा। चमत्कार यह हुआ कि एक पत्थर यानी शीला पानी पर तैरने लगी और उसी पर सवार होकर उन्होंने नदी पार कर ली। नदी के उस पार पहुंचते ही वह जंगल में अदृश्य हो गए।
चूंकि उनका कोई पार्थिव शरीर कभी नहीं मिला, इसलिए उदासीन संगत समाज आज भी उन्हें अपना सर्वोच्च आचार्य मानता है और उनके आदेशों के अनुसार ही सभी कार्य किए जाते हैं। जिस पत्थर पर बैठकर उन्होंने नदी पार की थी, उदासीन समाज के लोग आज भी उसकी पूजा-अर्चना करते हैं। परंपरा के अनुसार उनका आचार्य पद तभी समाप्त हो सकता है जब वह खुद इस्तीफा दें या उनका शरीर पूरा हो। चूंकि उन्होंने न तो कभी इस्तीफा दिया है और न ही उनका शरीर कभी मिला है, इसलिए समाज उन्हें आज भी अपना जीवित आचार्य स्वीकार करता है।
उनके चमत्कारों के किस्से केवल एक जगह तक सीमित नहीं हैं, बल्कि देश के अलग-अलग कोनों में फैले हुए हैं। चाहे जम्मू-कश्मीर हो, गुजरात की द्वारकापुरी हो, ओडिशा का जगन्नाथ पुरी हो या फिर पंजाब का इलाका, उन्होंने हर जगह अपने चमत्कारों की छाप छोड़ी है। श्री श्री जगतगुरु चंद्र भगवान 149 वर्षों तक बाल रूप में ही आम जनमानस की सेवा में समर्पित रहे। एक स्थान पर जब वह अपना धोना लगाकर बैठे थे, तो वहां के स्त्री-पुरुषों ने उन्हें प्रणाम कर मीठे पानी की कमी की बात कही। इस पर उन्होंने कृपा करते हुए अपने शंख से जमीन पर प्रहार किया और वहां से मीठा जल निकल आया, जो कुआं आज भी मौजूद है।
द्वारका में पानी की आपूर्ति का यह एक प्रमुख केंद्र बना हुआ है, जिसके दर्शन वहां के महंत ने स्वयं किए हैं और उस कुएं का मीठा जल भी ग्रहण किया है। इसके अलावा, जम्मू-कश्मीर में उन्होंने एक सूखे हुए पेड़ को अपनी कृपा से हरा-भरा कर दिया था। ऐसे ही अनगिनत चमत्कारों के कारण उदासीन संप्रदाय के लोग आज भी उन्हें अपना आचार्य मानते हैं और उनकी विधिवत पूजा-अर्चना करते हैं।



















