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हाथ-पैर अधूरे फिर भी करोड़ों की आस्था पूरी, जानें भगवान जगन्नाथ की मूर्ति का पौराणिक राज़धर्म
14 जुल॰ 2026, 6:28 am (79 दिन पहले)· 2

हाथ-पैर अधूरे फिर भी करोड़ों की आस्था पूरी, जानें भगवान जगन्नाथ की मूर्ति का पौराणिक राज़

पुरी धाम में विराजमान भगवान जगन्नाथ की मूर्ति में भुजाएं और चरण अधूरे क्यों हैं, उज्जैन के आचार्य आनंद भारद्वाज ने राजा इंद्रद्युम्न और विश्वकर्मा से जुड़ी पौराणिक कथा के जरिए इसका रहस्य बताया।

ओडिशा के पुरी धाम में विराजमान भगवान जगन्नाथ की मूर्ति हिंदू धर्म में सबसे अनोखी और रहस्यमयी मानी जाती है। बड़ी-बड़ी आंखों वाली यह प्रतिमा पहली नजर में ही श्रद्धालुओं का ध्यान खींच लेती है, लेकिन गौर से देखने पर पता चलता है कि इसमें भुजाएं और चरण पूरी तरह नहीं उकेरे गए हैं। जगत के पालनहार कहे जाने वाले भगवान जगन्नाथ का यह स्वरूप बाकी देवी-देवताओं की मूर्तियों से बिल्कुल जुदा है, और यही वजह है कि हर श्रद्धालु के मन में यह सवाल जरूर उठता है कि आखिर यह प्रतिमा अधूरी क्यों बनाई गई।

सदियों पुराना रहस्य आज भी बरकरार

पुरी का जगन्नाथ मंदिर वैसे भी कई ऐसे रहस्यों के लिए जाना जाता है, जिनकी गुत्थी आज तक कोई नहीं सुलझा पाया। इन्हीं में एक भगवान जगन्नाथ की वह मूर्ति भी है, जो आज तक अधूरी मानी जाती है। उज्जैन के आचार्य आनंद भारद्वाज के मुताबिक, इस अधूरे स्वरूप के पीछे एक पुरानी पौराणिक कथा जुड़ी है, जो सीधे राजा इंद्रद्युम्न और देव शिल्पी विश्वकर्मा से जुड़ती है।

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राजा इंद्रद्युम्न ने विश्वकर्मा को सौंपा था मूर्ति बनाने का काम

कथा के अनुसार राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान की प्रतिमा गढ़ने की जिम्मेदारी देव शिल्पी विश्वकर्मा को दी थी। विश्वकर्मा ने इसके लिए एक सख्त शर्त रखी, काम पूरा होने तक जिस कक्ष में मूर्ति बन रही है, उसका दरवाजा कोई नहीं खोलेगा। उन्होंने साफ चेतावनी दी थी कि अगर बीच में किसी ने कक्ष में झांकने की कोशिश की, तो वे मूर्ति को उसी अधूरी हालत में छोड़कर चले जाएंगे। भगवान के दर्शन की गहरी लालसा होने के बावजूद राजा ने यह शर्त मान ली और निर्माण कार्य शुरू हो गया।

दरवाजा खुलते ही टूट गई शर्त, गायब हो गए विश्वकर्मा

निर्माण कार्य शुरू होने के बाद काफी वक्त बीत गया। राजा बार-बार जानना चाहते कि काम कितना बचा है, लेकिन विश्वकर्मा की ओर से कोई जवाब नहीं मिलता। भगवान की मूर्ति बनते देखने की इच्छा राजा के मन में लगातार बनी रही, इसलिए वे अक्सर कक्ष के दरवाजे के बाहर खड़े होकर अंदर से आ रही मूर्ति गढ़ने की आवाज सुना करते। एक दिन अचानक अंदर से कोई आवाज नहीं आई। राजा को लगा कि काम पूरा हो चुका है, इसीलिए सन्नाटा है। यही सोचकर वे तुरंत प्रभु के दर्शन की उत्सुकता में कक्ष का दरवाजा खोल बैठे। दरवाजा खुलते ही शर्त टूट गई और यह देखकर विश्वकर्मा नाराज होकर वहीं से अंतर्ध्यान हो गए। मान्यता है कि उसी पल से भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा की मूर्तियां अधूरी रह गईं।

आज भी उसी अधूरे स्वरूप में होती है पूजा

इस पौराणिक घटना के बाद से पुरी धाम में भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा की मूर्तियों को उसी अधूरे स्वरूप में स्थापित किया गया, और आज भी श्रद्धालु इसे भगवान की लीला मानकर पूरी आस्था के साथ दर्शन करने पहुंचते हैं। यही कारण है कि पुरी का यह मंदिर और वहां विराजमान मूर्तियां हिंदू धर्म में आस्था और रहस्य दोनों का प्रतीक मानी जाती हैं।

सवाल-जवाब

भगवान जगन्नाथ की मूर्ति अधूरी क्यों मानी जाती है?
पौराणिक कथा के अनुसार देव शिल्पी विश्वकर्मा शर्त टूटने पर मूर्ति निर्माण अधूरा छोड़कर अंतर्ध्यान हो गए थे, तभी से यह स्वरूप अधूरा है।
भगवान जगन्नाथ की मूर्ति बनाने की जिम्मेदारी किसे मिली थी?
राजा इंद्रद्युम्न ने यह जिम्मेदारी देव शिल्पी विश्वकर्मा को सौंपी थी।
विश्वकर्मा ने मूर्ति बनाने से पहले क्या शर्त रखी थी?
उन्होंने कहा था कि जब तक निर्माण पूरा न हो, कोई कक्ष का दरवाजा नहीं खोलेगा, वरना वे मूर्ति अधूरी छोड़कर चले जाएंगे।
राजा ने शर्त क्यों तोड़ी?
कक्ष से अचानक कोई आवाज न आने पर राजा को लगा कि मूर्ति निर्माण पूरा हो गया है, इसी उत्सुकता में उन्होंने दरवाजा खोल दिया।
शर्त टूटने पर क्या हुआ?
विश्वकर्मा नाराज होकर वहीं से अंतर्ध्यान हो गए और भगवान जगन्नाथ, बलराम व सुभद्रा की मूर्तियां अधूरी रह गईं।
यह जानकारी किसने बताई है?
यह जानकारी उज्जैन के आचार्य आनंद भारद्वाज ने दी है।
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