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कर्नूल के पथरीले पहाड़ों में दो फीट का वो कुंड, जो गर्मी में भी कभी नहीं सूखताधर्म
14 जुल॰ 2026, 1:03 pm (32 दिन पहले)· 4

कर्नूल के पथरीले पहाड़ों में दो फीट का वो कुंड, जो गर्मी में भी कभी नहीं सूखता

आंध्र प्रदेश के कर्नूल जिले में यागंती मंदिर से दो किलोमीटर दूर एक प्राचीन जलकुंड सालभर पानी से भरा रहता है, जबकि इसकी गहराई महज दो फीट है और नीचे ठोस चट्टान है, जिसे लेकर भूगर्भीय और धार्मिक दोनों तरह की व्याख्याएं सामने आई हैं।

हैदराबाद से कुछ ही दूरी पर आंध्र प्रदेश के कर्नूल जिले में स्थित ऐतिहासिक यागंती उमा महेश्वर मंदिर अपनी वास्तुकला और अनोखे रहस्यों के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। लेकिन इसी मुख्य मंदिर परिसर से महज दो किलोमीटर आगे एक और प्राचीन जगह मौजूद है, जिसे स्थानीय लोग पार्वती देवी कोनेरू यानी जलकुंड कहते हैं। यह छोटा सा कुंड अपने अनोखे जलस्रोत और उससे जुड़ी सदियों पुरानी पौराणिक कथाओं के चलते इन दिनों सुर्खियों में है।

आम तौर पर किसी सूखी या पथरीली जमीन से पानी निकालना हो तो सैकड़ों फीट गहरा बोरवेल खोदना पड़ता है। लेकिन यहां पत्थरों के बीच बना यह कुंड सिर्फ दो फीट गहरा है और इसका पूरा तल ठोस चट्टान से बना है। इसके बावजूद इसमें बारहों महीने पानी भरा रहता है और तेज गर्मी के मौसम में भी यह कभी सूखता नहीं। चट्टानों के बीच से यह पानी आखिर कहां से और किस तरह आता रहता है, यह सवाल आज भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।

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चट्टानों में छिपा भूगर्भीय विज्ञान

जानकार जमीर हसन के मुताबिक, विज्ञान की नजर से देखें तो इसमें कोई चमत्कार नहीं बल्कि एक शानदार भूगर्भीय बनावट काम कर रही है। यागंती का पूरा इलाका एरामला पहाड़ियों से घिरा है, जो चूना पत्थर और बलुआ पत्थर से बनी हैं। इन पहाड़ियों के भीतर बारिश और नमी का पानी प्राकृतिक तौर पर जमा होता रहता है, जो फिर पूरे साल महीन जलधाराओं के रूप में धीरे धीरे रिसकर नीचे बने कुंडों तक पहुंचता है। वैज्ञानिक भाषा में इसी प्रक्रिया को पेरेनियल स्प्रिंग यानी बारहमासी प्राकृतिक झरना कहा जाता है। बताया जाता है कि 15वीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य के राजाओं ने इसी प्राकृतिक जलस्रोत को संरक्षित रखने के मकसद से यहां पत्थरों से एक सुंदर कुंड बनवाया था, जो आज भी वैसा ही मौजूद है।

शिव पार्वती की कथा से जुड़ी आस्था

इस जगह से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं भी उतनी ही दिलचस्प हैं। स्थानीय लोककथाओं के मुताबिक जब भगवान शिव और माता पार्वती कैलाश पर्वत छोड़कर धरती पर यागंती आए थे, तब माता पार्वती के स्नान के लिए भगवान शिव ने खुद यहां गंगा की धारा प्रकट की थी। इसी वजह से श्रद्धालु मानते हैं कि इस कुंड का जल बेहद पवित्र है। यही कारण है कि दूर दूर से आने वाले कई श्रद्धालु यहां का जल अपने साथ घर भी ले जाते हैं।

इतिहास, आस्था और विज्ञान का अनोखा संगम

प्राचीन इतिहास, धार्मिक आस्था और प्राकृतिक विज्ञान का यह दुर्लभ मेल इस छिपी हुई जगह को बेहद खास बनाता है। यागंती पहुंचने वाले श्रद्धालु और पर्यटक मुख्य मंदिर के दर्शन के साथ साथ इस प्राचीन जलकुंड को देखने भी जरूर जाते हैं। यही वजह है कि यह जगह धीरे धीरे लोगों के बीच आकर्षण का एक नया केंद्र बनती जा रही है।

सवाल-जवाब

यह जलकुंड कहां स्थित है?
यह आंध्र प्रदेश के कर्नूल जिले में यागंती उमा महेश्वर मंदिर से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
इस कुंड को क्या कहा जाता है?
स्थानीय लोग इसे पार्वती देवी कोनेरू यानी जलकुंड के नाम से जानते हैं।
कुंड कितना गहरा है और इसका तल कैसा है?
यह कुंड महज दो फीट गहरा है और इसका निचला हिस्सा पूरी तरह ठोस चट्टान का है।
गर्मी में भी यह कुंड क्यों नहीं सूखता?
जमीर हसन के मुताबिक एरामला पहाड़ियों के भीतर पानी प्राकृतिक रूप से जमा रहता है और सालभर महीन जलधाराओं के रूप में रिसकर इस कुंड तक पहुंचता रहता है, जिसे पेरेनियल स्प्रिंग कहा जाता है।
इस कुंड का निर्माण किसने करवाया था?
बताया जाता है कि 15वीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य के राजाओं ने इस प्राकृतिक जलस्रोत को सुरक्षित रखने के लिए यहां पत्थरों का कुंड बनवाया था।
इस कुंड से जुड़ी धार्मिक मान्यता क्या है?
लोककथाओं के अनुसार जब भगवान शिव और माता पार्वती कैलाश से यागंती आए थे, तब माता पार्वती के स्नान के लिए भगवान शिव ने यहां गंगा की धारा प्रकट की थी।
श्रद्धालु इस कुंड के पानी का क्या करते हैं?
कई श्रद्धालु इस कुंड के जल को पवित्र मानकर इसे अपने साथ घर भी ले जाते हैं।
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