सावन मास के आगमन के साथ ही देश भर के धार्मिक स्थलों में भक्तों का उत्साह चरम पर पहुंच जाता है। राजस्थान के कोटा शहर के नांता इलाके में बना लगभग पांच शताब्दी पुराना शिवालय अपनी विशिष्ट वास्तुकला, प्राचीन मान्यताओं तथा अद्वितीय स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध है। पवित्र सावन के दौरान दूर-दूर से आने वाले लोग भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करने और जलाभिषेक करने के लिए यहां एकत्रित होते हैं। यह ऐतिहासिक स्थान न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि मध्यकालीन भारतीय मूर्तिकला का एक अनोखा उदाहरण भी पेश करता है। सावन के पूरे महीने मंदिर परिसर में भक्तों का जमावड़ा लगा रहता है।
एक ही शिला पर तराशी गई अनूठी शिल्पकला और पौराणिक गाथा
इस धार्मिक स्थल की सबसे अनूठी विशेषता इसकी शिल्पकला में निहित है, जहां एक विशाल अखंड पत्थर को काटकर शिवलिंग तथा उसके समक्ष अपने मस्तक का समर्पण करते हुए रावण की मूर्ति तैयार की गई है। भारत भर के मंदिरों में ऐसी संयुक्त धार्मिक संरचना विरले ही देखने को मिलती है। इस कलाकृति में रावण अपने ही हाथों से अपना मस्तक काटकर भोलेनाथ के चरणों में प्रस्तुत करता दिखाई देता है, जो उसके अनन्य अनुष्ठान तथा अगाध श्रद्धा को प्रदर्शित करता है। सनातन आख्यानों के मुताबिक, लंकापति रावण ने महादेव की कृपा पाने के ध्येय से कैलाश पर्वत की कठिन भूमि पर कई वर्षों तक घोर साधना की थी। जब लंबी तपस्या के बाद भी शिवजी प्रकट नहीं हुए, तो रावण ने अपनी निष्ठा साबित करने के लिए एक-एक करके अपने सिर काटने शुरू कर दिए। रावण के इस चरम त्याग और भक्ति भाव को देखकर महादेव द्रवित हो उठे। उन्होंने प्रकट होकर उसे इच्छित वर दिए तथा चंद्रहास नाम की अमोघ और अलौकिक खड्ग उपहार स्वरूप प्रदान की। इसी पौराणिक घटनाक्रम को नांता के इस प्राचीन मंदिर की पाषाण कलाकृति में बड़ी ही सूक्ष्मता से उकेरा गया है।
शिवलिंग क्षरण से बचाव के लिए पीतल पात्र की अनोखी परंपरा
पांच शताब्दियों से आस्था के केंद्र रहे इस स्थान पर पूजा-अर्चना और जल चढ़ाने की एक विशेष विधि अपनाई जाती है। निरंतर जलाभिषेक के कारण मूल पाषाण निर्मित शिवलिंग को किसी प्रकार का नुकसान या घिसाव न पहुंचे, इसके लिए सावन के प्रथम सोमवार तथा प्रमुख पर्वों पर शिवलिंग के ऊपर पीतल की एक सुरक्षात्मक ढाल या आवरण चढ़ा दिया जाता है। भक्तगण उस धातु के आवरण पर ही जल तथा दुग्ध प्रवाहित करते हैं, जिससे प्राचीन शिवलिंग का संरक्षण भी होता है और धार्मिक अनुष्ठान भी निर्बाध रूप से संपन्न होता है। इस व्यावहारिक उपाय से सदियों पुरानी मूर्ति का मूल स्वरूप सुरक्षित रहता है और श्रद्धालुओं की आस्था का सम्मान भी बना रहता है।
सावन के सोमवार पर तड़के मंगला आरती से गूंजता मंदिर प्रांगण
सावन के हर सोमवार को तड़के होने वाली मंगला आरती के समय से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग जाती हैं जो देर रात तक बनी रहती हैं। विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे शिवभक्त रुद्राभिषेक संपन्न कराते हैं तथा बेलपत्र, धतूरा और ताजे फूल अर्पित कर अपनी मनोकामनाएं पूरी करने की प्रार्थना करते हैं। संपूर्ण परिसर 'हर हर महादेव' तथा 'ॐ नमः शिवाय' के ओजस्वी जयकारों से गूंजायमान रहता है और वातावरण में आध्यात्मिक ऊर्जा भर जाती है। धार्मिक विश्वास, पौराणिक आख्यान और अनुपम पाषाण शिल्प का यह सुंदर मेल आज भी भक्तों और दर्शकों को समान रूप से आकर्षित करता है। इस पवित्र महीने में यहां दर्शन करने वाला प्रत्येक व्यक्ति शिव साधना में लीन होकर असीम मानसिक शांति एवं आत्मिक संतोष प्राप्त करता है।


















