राजस्थान के उदयपुर जिले में झाड़ोल क्षेत्र की अरावली श्रृंखलाओं के मध्य बसा कमलनाथ महादेव मंदिर आस्था और अद्भुत पौराणिक परंपराओं का एक अनोखा केंद्र है। जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह पावन स्थल देश के उन दुर्लभ मंदिरों में गिना जाता है, जहां महादेव के साथ ही दशानन रावण की भी नियमित रूप से पूजा की जाती है। श्रावण मास के पावन अवसर पर यहां श्रद्धालुओं और पर्यटकों का तांता लगा रहता है, जो प्राकृतिक छटा के बीच इस प्राचीन मंदिर के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
108 कमल के संकल्प और शीश दान की पौराणिक कथा
कमलनाथ महादेव मंदिर की स्थापना से जुड़ी पौराणिक कथा बेहद रोचक और भक्ति भावना से ओतप्रोत है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लंकापति रावण भगवान शिव का अत्यंत अनन्य भक्त था। एक बार उसने अपनी कठोर तपस्या के दौरान महादेव को प्रसन्न करने हेतु 108 कमल के पुष्प अर्पित करने का संकल्प धारण किया था। पूजा के दौरान जब अनुष्ठान चल रहा था, तब एक कमल कम पड़ गया। अपने संकल्प को किसी भी परिस्थिति में अधूरा न छोड़ने के उद्देश्य से रावण ने बिना हिचकिचाए अपना शीश काटकर शिवजी के चरणों में समर्पित कर दिया। रावण की इस अगाध श्रद्धा और कठिन भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने उसके शीश को पुनः धड़ से जोड़ दिया। इस पावन घटना के बाद ही इस स्थान को कमलनाथ महादेव के नाम से प्रसिद्धि मिली।
रावण की प्रतिमा और युगों पुरानी परंपरा
इस पावन धाम का सबसे अनूठा पहलू यह है कि मंदिर परिसर में भगवान शिव के साथ रावण की प्रतिमा भी स्थापित है। भारतवर्ष में ऐसे गिने-चुने धार्मिक स्थल ही मौजूद हैं जहां भगवान के साथ उनके परम भक्त रावण की आराधना की जाती है। स्थानीय निवासियों के अनुसार, मंदिर आने वाले हर श्रद्धालु सबसे पहले भगवान शिव के दर्शन करते हैं और तत्पश्चात रावण की प्रतिमा के समक्ष भी नतमस्तक होते हैं। यह परंपरा किसी एक कालखंड की नहीं बल्कि पीढ़ियों से निरंतर चली आ रही है, जिसे आज भी पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाया जाता है।
स्थानीय आदिवासी समाज का समर्पण और दायित्व
कमलनाथ महादेव मंदिर की देखरेख, दैनिक पूजा-अर्चना और व्यवस्था में क्षेत्र के स्थानीय आदिवासी समुदाय की केंद्रीय भूमिका रही है। यहां रहने वाला आदिवासी समाज प्राचीन काल से ही भगवान शिव और रावण दोनों की समान निष्ठा के साथ पूजा करता आ रहा है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह अनोखी परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही एक अनमोल धरोहर है। सावन के पवित्र महीने, महाशिवरात्रि के पर्व तथा अन्य धार्मिक तिथियों पर यहां विशेष पूजा आयोजनों के साथ भव्य धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं।
स्वयंभू शिवलिंग और प्राकृतिक सौंदर्य का संगम
धार्मिक जनश्रुति के अनुसार, मंदिर में स्थापित शिवलिंग को स्वयंभू माना गया है। भक्तों का दृढ़ विश्वास है कि जो भी व्यक्ति यहां आकर निष्कपट और सच्चे मन से प्रार्थना करता है, महादेव उसकी हर मनोकामना अवश्य पूर्ण करते हैं। यह स्थान केवल धार्मिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण पर्यटन के नक्शे पर भी विशेष स्थान रखता है। चारों तरफ फैली अरावली की हरियाली, शांत वातावरण और बरसाती मौसम में पहाड़ियों का मनोरम दृश्य श्रद्धालुओं को एक अलौकिक और आध्यात्मिक शांति का अहसास कराता है। यही कारण है कि राजस्थान के विभिन्न जिलों के अलावा देश के अन्य कोनों से भी बड़ी संख्या में प्रकृति प्रेमी और दर्शनार्थी यहां खिंचे चले आते हैं।



















