सनातन परंपरा में पितृपक्ष का समय पूर्वजों को याद करने, उनका तर्पण करने और पिंडदान करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इन दिनों में अपने पितरों का स्मरण करने से परिवार को पितृ दोष से मुक्ति मिलती है और मृत आत्माओं को मोक्ष तथा सद्गति की प्राप्ति होती है। हालांकि इसको लेकर लोगों के मन में अक्सर यह असमंजस रहता है कि जिन परिजनों की मृत्यु को अभी एक साल यानी बरसी का समय पूरा नहीं हुआ है, उनका श्राद्धकर्म इन दिनों में किया जाना चाहिए या नहीं। इस विषय पर शास्त्रों और धार्मिक ग्रंथों में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं।
एक साल पूरा होने से पहले कैसे करें श्राद्ध?
- गरुड़ पुराण के अनुसार किसी भी व्यक्ति के देहांत के बाद परिवार के सदस्यों को तेरह दिनों के भीतर अंतिम संस्कार, पिंडदान और शांति पाठ की प्रक्रिया को पूरा करवा लेना चाहिए।
- यदि किसी परिजन की मृत्यु को अभी एक वर्ष पूरा नहीं हुआ है और इस बीच पितृपक्ष आ जाता है, तो ऐसी स्थिति में परिजनों को केवल जल और काले तिल से तर्पण अर्पित करना चाहिए तथा उनका स्मरण करना चाहिए।
- शास्त्रों के नियमों के अनुसार पिंडदान और मुख्य श्राद्ध कर्म हमेशा मृत्यु के एक साल बाद ही किया जाना उचित माना जाता है। बरसी का दिन बीत जाने के बाद ही परिवार के लोगों को निर्धारित तिथि पर विधिवत श्राद्ध करना चाहिए।
- धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक जब तक किसी व्यक्ति का पहला वार्षिक श्राद्ध या बरसी नहीं हो जाती, तब तक उसे विधिवत पितरों की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। बरसी संपन्न होने के बाद हर साल उनकी पुण्यतिथि पर श्राद्ध करने से उनका आशीर्वाद सदैव बना रहता है।
- यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि साल 2026 में पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से होगी और इनका समापन 10 अक्टूबर को होगा। इस पूरे पितृपक्ष का पूरा कैलेंडर देखकर सभी तिथियों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
अकाल मृत्यु के मामलों में क्या है विधान?
सामान्य निधन के विपरीत यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु अकाल हुई है या किसी दुर्घटना के कारण उसकी जान गई है, तो उसकी आत्मा की शांति के लिए विशेष रूप से नारायण बलि का अनुष्ठान करवाया जाना चाहिए। नारायण बलि के विधान से असमय दुनिया छोड़ने वाली आत्माओं को परम शांति मिलती है। जिन मामलों में अकाल मृत्यु का शिकार हुए व्यक्ति की सटीक मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती है, उनका श्राद्ध पितृपक्ष की अमावस्या तिथि के दिन किया जाना शास्त्रों में सही बताया गया है। धार्मिक मत के अनुसार अमावस्या के पावन दिन श्राद्ध अनुष्ठान संपन्न करने से सभी पितृ प्रसन्न होते हैं और परिवार को अपनी कृपा प्रदान करते हैं।



















