भारत में विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों में अंतिम संस्कार के अपने अनूठे नियम और रीति-रिवाज मौजूद हैं। हालांकि इन सभी में पारसी समुदाय की अंतिम संस्कार प्रणाली सबसे अलग और विशिष्ट मानी जाती है। पारंपरिक जोरोएस्ट्रियन धर्म के सिद्धांतों के अनुसार किसी भी मृत व्यक्ति के शरीर को न तो अग्नि में जलाया जाता है और न ही जमीन के भीतर दफनाया जाता है। इसके स्थान पर पार्थिव शरीर को एक विशेष रूप से निर्मित ऊंची और खुली संरचना पर रखा जाता है, जिसे दखमा के नाम से पुकारा जाता है। वैश्विक स्तर पर और अंग्रेजी भाषा में इस अनूठी वास्तुकला को टावर ऑफ साइलेंस कहा जाता है।
क्या है दखमा की संरचना और बनावट
दखमा मुख्य रूप से एक गोलाकार और काफी ऊंचाई पर बनी हुई खुली हुई संरचना होती है। पारंपरिक और प्राचीन व्यवस्था के तहत मृतक के शरीर को इसी खुले स्थान पर स्थापित कर दिया जाता है, जहां वह लगातार सूर्य के प्रकाश, तेज हवाओं और अन्य प्राकृतिक कारकों के सीधे संपर्क में रहता है। ऐतिहासिक काल से ही गिद्ध जैसे मांसाहारी पक्षी इस प्राकृतिक प्रक्रिया में एक अहम भूमिका निभाते आए हैं, जिससे शरीर का क्षय होता है। समय बीतने के साथ मृत शरीर के सभी अवशेष केवल हड्डियों के रूप में शेष रह जाते हैं, जिन्हें अंततः दखमा के बिल्कुल बीच में बने एक विशेष गड्ढे या स्थान पर एकत्र कर दिया जाता है, जहां वे प्रकृति के नियमों के तहत धीरे-धीरे पूरी तरह विलीन हो जाते हैं।
शव को जलाने या दफनाने से क्यों बचा जाता है
इस अनूठी प्रथा के मूल में जोरोएस्ट्रियन धर्म की गहरी धार्मिक और दार्शनिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। इस प्राचीन आस्था के भीतर पृथ्वी, जल और अग्नि को अत्यंत पवित्र और पूजनीय माना गया है। पारंपरिक धार्मिक शिक्षाओं के अनुसार मृत शरीर को इन मूलभूत प्राकृतिक तत्वों के सीधे संपर्क में लाकर किसी भी स्थिति में अपवित्र नहीं किया जाना चाहिए। इसी पवित्र दृष्टिकोण के कारण समुदाय में शव को जमीन के अंदर दफनाने या आग की लपटों में सुपुर्द-ए-खाक करने के पारंपरिक तरीकों को पूरी तरह वर्जित माना गया है, और इसके बजाय शरीर के प्राकृतिक रूप से विघटित होने की इस व्यवस्था को अपनाया गया है।
कैसी होती है अंतिम संस्कार की पूरी प्रक्रिया
किसी व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात उसके पार्थिव शरीर को सबसे पहले आवश्यक धार्मिक रीति-रिवाजों, मंत्रोच्चार और प्रार्थनाओं के दौर से गुजारा जाता है, जिसके बाद उसे सम्मान के साथ दखमा तक पहुंचाया जाता है। स्थापित पारंपरिक व्यवस्था के तहत शव को वहां पहले से निर्धारित निश्चित स्थान पर रख दिया जाता है और उसके पश्चात उसे प्राकृतिक तत्वों के हवाले छोड़ दिया जाता है। इस पारंपरिक वास्तुकला और व्यवस्था के पुराने विवरणों में यह उल्लेख मिलता है कि दखमा के आंतरिक हिस्से में पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के शवों को रखने के लिए अलग-अलग और निश्चित क्षेत्र बनाए गए थे।
आधुनिक समय में इस परंपरा के सामने आ रही चुनौतियां
हालांकि, आज के दौर में इस प्राचीन परंपरा की स्थिति वैसी नहीं रही जैसी इतिहास में हुआ करती थी। विशेष तौर पर भारत देश के भीतर गिद्धों की आबादी में आई भारी और अचानक गिरावट के कारण कई स्थानों पर दखमा के भीतर शवों के प्राकृतिक रूप से समय पर विघटित न हो पाने की बड़ी व्यावहारिक और प्रबंधकीय चुनौतियां सामने आई हैं। इन बदलती परिस्थितियों और पर्यावरणीय कारणों के चलते आधुनिक समय में इस लंबी परंपरा को बनाए रखने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय व्यवस्थाओं और तौर-तरीकों में आंशिक फेरबदल भी देखने को मिल रहा है।
पारसी संस्कृति में इस परंपरा का सांस्कृतिक महत्व
टावर ऑफ साइलेंस केवल मृतक के शरीर को विदा करने का एक भौतिक स्थान भर नहीं है, बल्कि यह पारसी धर्म की आस्था और प्रकृति के प्रति उनके गहरे सम्मान के दृष्टिकोण का जीवंत प्रतीक है। इस पूरी व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि मृत शरीर के निपटान की प्रक्रिया के दौरान पृथ्वी, जल और अग्नि जैसे पवित्र प्राकृतिक तत्व किसी भी प्रकार से दूषित न होने पाएं। यही एक प्रमुख कारण है कि हजारों वर्षों के लंबे कालखंड से अनवरत चली आ रही यह अंतिम संस्कार की अनूठी परंपरा आज भी पारसी संस्कृति की एक बेहद खास और अटूट पहचान बनी हुई है।



















