शारदीय नवरात्र के पावन पर्व को लेकर देश भर में विशेष उत्साह देखा जा रहा है। पंचांग के अनुसार इस वर्ष शारदीय नवरात्र की शुरुआत 11 अक्टूबर दिन रविवार से हो रही है, जिसका समापन 19 अक्टूबर को होगा और इसके अगले दिन 20 अक्टूबर दिन मंगलवार को विजयादशमी का त्योहार मनाया जाएगा। नवरात्र के इन नौ पावन दिनों में मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की विधिवत उपासना की जाती है। इस विशेष अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु देश के विभिन्न शक्तिपीठों में पहुंचकर शीश नवाते हैं। 51 शक्तिपीठों और महाराष्ट्र की विख्यात ‘साढ़े तीन शक्तिपीठ’ परंपरा में नासिक के पास स्थित सप्तश्रृंगी शक्तिपीठ का स्थान बेहद विशिष्ट माना गया है। जनआस्था है कि इस पावन धाम में दर्शन करने से जीवन के समस्त कष्टों और दोषों का निवारण हो जाता है।
साढ़े तीन शक्तिपीठों की परंपरा और अर्धपीठ कहलाने का रहस्य
महाराष्ट्र में देवी उपासना से जुड़ी साढ़े तीन शक्तिपीठों की अत्यंत प्राचीन और विशिष्ट मान्यता विद्यमान है। इस व्यवस्था के अंतर्गत तीन शक्तिपीठों को पूर्ण पीठ का दर्जा प्राप्त है, जबकि चौथे स्थान पर स्थित सप्तश्रृंगी देवी को अर्धशक्तिपीठ माना जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार तुलजापुर की तुलजा भवानी, कोल्हापुर की महालक्ष्मी और माहुर की रेणुका माता पूर्ण शक्तिपीठ के रूप में पूजित हैं। वहीं सप्तश्रृंगी पर्वत पर भगवती अपने कुमारी यानी बालिका रूप में वास करती हैं, इसी पावन भाव के कारण इस तीर्थ को अर्धपीठ कहा गया है।
पौराणिक आख्यान: जब यहां गिरी थी माता सती की दाहिनी भुजा
सप्तश्रृंगी धाम की स्थापना की पृष्ठभूमि शिव पुराण और देवी पुराण में वर्णित उस मार्मिक प्रसंग से जुड़ती है, जब माता सती ने यज्ञ की वेदी में अपने प्राणों का उत्सर्ग किया था। पौराणिक विवरणों के अनुसार राजा दक्ष द्वारा आयोजित विराट यज्ञ में भगवान शिव और माता सती को आमंत्रित नहीं किया गया था। जब माता सती वहां पहुंचीं और उनके सम्मुख भगवान शिव का तिरस्कार किया गया, तो वे इस अपमान को सहन नहीं कर सकीं और उन्होंने यज्ञकुंड की प्रज्वलित अग्नि में कूदकर देहत्याग कर दिया।
सती के वियोग और महाप्रयाण से व्यथित होकर भगवान शिव ने उनके पार्थिव शरीर को अपने कंधे पर धारण किया और सृष्टि को कंपित करने वाला प्रलयंकारी तांडव आरंभ कर दिया। इस महाविनाश से जगत की रक्षा करने के उद्देश्य से भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के पार्थिव शरीर को खंडित करना शुरू किया। उस समय माता सती की दाहिनी भुजा महाराष्ट्र के नासिक जिले में वणी के समीप स्थित सात चोटियों यानी सप्तशृंग पर्वत पर गिरी थी। इसी पावन घटना के फलस्वरूप यह तीर्थ 51 शक्तिपीठों में प्रतिष्ठित हुआ।
महिषासुर संहार के बाद विश्राम और मार्कंडेय ऋषि की स्तुति
भागवत पुराण के संदर्भों के अनुसार जब देवी ने दुर्गा का भव्य स्वरूप धारण कर अत्याचारी दैत्य महिषासुर का संहार किया, तब वे प्रचंड क्रोध में थीं। अपने उस महाप्रचंड रौद्र रूप को शांत करने और विश्राम पाने के लिए भगवती सह्याद्रि पर्वतमाला के इन सात शिखरों यानी सप्तश्रृंग पर पधारीं। यहां भक्तों को मां के विकराल रूप के स्थान पर उनका अत्यंत शांत, सौम्य और आधा अंश ही दिखाई देता है।
मान्यता है कि प्रसिद्ध ऋषि मार्कंडेय ने इसी पवित्र भूमि पर बैठकर ‘देवी महात्म्य’ की रचना की थी, जिसमें मां के अलौकिक पराक्रम और महिमा का गान किया गया है। मंदिर में स्थापित माता के विग्रह की ग्रीवा एक तरफ हल्की सी झुकी हुई प्रतीत होती है। इसके पीछे मान्यता है कि जब ऋषि मार्कंडेय सामने वाली पहाड़ी पर बैठकर ‘दुर्गा सप्तशती’ का पाठ कर रहे थे, तब उनकी भक्तिपूर्ण स्तुति को एकाग्रचित्त होकर सुनने के लिए माता ने अपनी गर्दन उस दिशा में मोड़ ली थी।
सिंदूरी आभा वाली 8 फीट ऊंची प्रतिमा और मार्कंडेय पुराण का वर्णन
ऋषि मार्कंडेय द्वारा रचित ‘मार्कंडेय पुराण’ (देवी महात्म्य) के आधार पर सप्तश्रृंगी देवी की यह मनोहारी मूर्ति साक्षात् महालक्ष्मी का दिव्य स्वरूप है। अठारह हाथों से सुशोभित होने के कारण भगवती को ‘अष्टदशभुजा’ के नाम से जाना जाता है, यद्यपि कुछ विवरणों में उन्हें अष्टभुजा यानी आठ भुजाओं वाली देवी भी कहा गया है। माता की यह भव्य पाषाण प्रतिमा लगभग 8 फीट (2.4 मीटर) ऊंची है। विग्रह पर पूर्ण रूप से सिंदूर का लेप होने की वजह से यह गहरे सिंदूरी अर्थात केसरिया रंग में दैदीप्यमान नजर आती है।
अठारह भुजाओं में सुसज्जित दिव्य अस्त्र-शस्त्र
सप्तश्रृंगी माता अपनी 18 भुजाओं में देवताओं द्वारा अर्पित किए गए विभिन्न अस्त्र-शस्त्र धारण करती हैं। इनमें भगवान शिव का त्रिशूल, भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र, वरुण देव का शंख, अग्नि-देव की पावन लपटें, वायु देव का धनुष और बाण, इंद्र देव का वज्र व घंटा, यमराज का डंडा (कुडगेल), प्रजापति दक्ष की अक्षमाला (मोतियों की माला), और ब्रह्मा जी का कमंडलु (जल-पात्र) शामिल हैं। इसके अतिरिक्त देवी के हाथों में सूर्यदेव की दिव्य किरणें, मां काली की तलवार और ढाल, भगवान विश्वकर्मा का परशु (कुल्हाड़ी), कुबेर देव का मदिरा-प्याला, तथा गदा भी सुशोभित है, जिससे वे अपने भक्तों का हर संकट से रक्षण करती हैं।
4800 फीट की ऊंचाई, तीन पावन द्वार और पूजा परंपरा
सप्तश्रृंगी देवी का यह पावन धाम नासिक से लगभग 65 किलोमीटर दूर 4800 फीट की ऊंचाई पर सप्तश्रृंग पर्वत शिखर पर स्थित है। प्राकृतिक दृष्टि से यह स्थान बेहद दुर्गम और विहंगम है, जहां मंदिर के एक ओर गहरी खाई और दूसरी ओर गगनचुंबी पहाड़ खड़े हैं। श्रद्धालु लगभग 472 सीढ़ियों की चढ़ाई पूरी करके माता के मुख्य मंदिर तक पहुंचते हैं।
पहाड़ी गुफा में स्थित इस मंदिर में देवी के दर्शन के लिए तीन मुख्य द्वार बनाए गए हैं, जिन्हें शक्ति द्वार, सूर्य द्वार और चंद्रमा द्वार कहा जाता है। नवरात्र के पावन दिनों में यहां माता की गोद भराई की विशेष रस्म निभाई जाती है। इस पूजन के लिए श्रद्धालु नारियल, चुनरी, साड़ी, चूड़ी, सिंदूर, पुष्प और मिष्ठान अर्पित करते हैं। जनविश्वास है कि मां अपने 18 हाथों से अपने भक्तों पर कृपा बरसाती हैं और यहां आने वाले श्रद्धालुओं को पारंपरिक पूरन पोली का पावन प्रसाद प्राप्त होता है।



















