मथुरा की पावन ब्रजभूमि अपनी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर, ऐतिहासिक मान्यताओं और अनूठे सामाजिक नियमों के लिए पूरी दुनिया में पहचानी जाती है। ब्रज के कण-कण और कुंज गलियों में आज भी राधा और कृष्ण की स्मृतियां जीवंत मानी जाती हैं। धार्मिक इतिहास के अनुसार, भगवान कृष्ण मथुरा से नंदगांव पहुंचे थे, जबकि उनकी प्रियतमा राधा रानी बरसाना की गलियों में अपनी बाल सखियों के साथ विचरण करती थीं। इन दोनों ऐतिहासिक बस्तियों के बीच द्वापर काल से ही एक बेहद खास मर्यादा चली आ रही है, जिसका पालन स्थानीय लोग आज के आधुनिक दौर में भी पूरी निष्ठा से करते हैं।
सात बिरादरियों में भी नहीं जुड़ता कोई वैवाहिक बंधन
नंदगांव और बरसाना के मध्य पिछले कई सहस्राब्दियों से वैवाहिक रिश्तों पर एक अटूट सामाजिक प्रतिबंध लागू है। स्थानीय पुजारी और नंदगांव के निवासी सुशील गोस्वामी के अनुसार, इन दोनों गांवों के बीच पूरे इतिहास में केवल एक ही पवित्र नाता स्वीकार किया गया है, और वह अलौकिक संबंध स्वयं राधा रानी और भगवान कृष्ण का था। द्वापर युग से लेकर आज तक, यानी लगभग साढ़े पांच हजार वर्षों के लंबे अंतराल में इन दोनों गांवों के बाशिंदों के बीच कोई दूसरा विवाह नहीं रचाया गया।
यह परंपरा केवल किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि सात बिरादरियों सहित पूरे समाज में समान रूप से लागू होती है। सामाजिक सद्भाव और इस साझा मर्यादा का दायरा इतना व्यापक है कि हिंदू परिवारों के साथ-साथ इन गांवों में रहने वाले मुस्लिम समुदाय के लोग भी अपनी बेटियों या बेटों का वैवाहिक संबंध बरसाना और नंदगांव के बीच कभी तय नहीं करते हैं। दोनों पक्षों के लोग इस व्यवस्था को अपनी साझा सांस्कृतिक आस्था का अभिन्न अंग मानते हैं।
लठमार होली का उल्लास और चरण स्पर्श का सम्मान
विवाह संबंध न होने के बावजूद दोनों गांवों के बीच किसी भी प्रकार की दूरी नहीं है, बल्कि दोनों के आपसी संबंध बेहद आत्मीय और जीवंत हैं। उत्सवों के समय, विशेष रूप से होली के पावन पर्व पर, नंदगांव के लोग बरसाना जाते हैं और बरसाना के निवासी नंदगांव आकर पारंपरिक फाग खेलते हैं। इस दौरान दोनों गांवों के हुरियारे और हुरियारिनें उमंग के साथ रंगों के उत्सव में शामिल होते हैं।
सुशील शास्त्री के मुताबिक, इस रंगोत्सव के पीछे एक गहरा आध्यात्मिक और पारिवारिक भाव छिपा हुआ है। जिस प्रकार भाई और बहन आपस में इस तरह के हंसी-मजाक वाले रंग नहीं खेलते, उसी प्रकार यहां भी मर्यादाओं का पूरा ध्यान रखा जाता है। होली खेलने के तुरंत बाद, जो भी पुरुष महिलाओं के साथ फाग खेलते हैं, वे उन सभी महिलाओं के चरण स्पर्श करके उनसे आशीर्वाद लेते हैं और उन्हें नमन करते हैं। यह आदर भाव यह सिद्ध करता है कि दोनों गांव एक-दूसरे को ससुराल के बजाय हमेशा पूजनीय और पारिवारिक नजरिए से ही देखते हैं।



















