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मेरठ के करीब छिपा है महाभारत का सबसे बड़ा रहस्य, हस्तिनापुर में आज भी मौजूद हैं उल्टे महलधर्म
2 घंटे पहले· 2

मेरठ के करीब छिपा है महाभारत का सबसे बड़ा रहस्य, हस्तिनापुर में आज भी मौजूद हैं उल्टे महल

मेरठ से महज 45 किलोमीटर के फासले पर बसा हस्तिनापुर आज भी अपने सीने में महाभारत काल की कई अनसुलझी कहानियां समेटे हुए है। यहां के पांडव टीले से लेकर द्रौपदी के अनोखे मंदिर तक, हर कोना एक अलग ही पौराणिक गाथा सुनाता है।

आधुनिक भारतीय इतिहास में मेरठ की पहचान मुख्य रूप से 1857 की उस महान क्रांति से होती है, जिसने आजादी की पहली चिंगारी भड़काई थी। लेकिन इस भागदौड़ भरे शहर से कुछ ही दूरी पर एक ऐसा इलाका मौजूद है, जहां समय मानो हजारों साल पहले ठहर गया हो। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस प्रमुख जिले से लगभग 45 किलोमीटर दूर स्थित हस्तिनापुर एक जीता-जागता संग्रहालय है। कुरु वंश की यह कभी बेहद भव्य रही राजधानी आज भी महाभारत के दौर की अमूल्य स्मृतियों को संजोकर बैठी है। यही कारण है कि अपनी पौराणिक जड़ों और पुरातात्विक चमत्कारों की तलाश में पूरी दुनिया से पर्यटक और श्रद्धालु इस प्राचीन नगर का रुख करते हैं।

नगर का प्रवेश द्वार और पांडेश्वर मंदिर

इस पौराणिक नगरी में कदम रखते ही मुसाफिरों का सामना सबसे पहले मशहूर पांडेश्वर मंदिर से होता है। स्थानीय लोगों की गहरी आस्था है कि द्वापर युग में जब पांचों पांडव इस क्षेत्र में रहते थे, तो वे प्रतिदिन इसी जगह पर आकर भगवान शिव की पूरी श्रद्धा के साथ उपासना करते थे। भोलेनाथ की आराधना का यह केंद्र आज भी उस दौर की आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा हुआ महसूस होता है। इसी पवित्र स्थल के ठीक बगल से बूढ़ी गंगा की धारा प्रवाहित होती है। उस महाकाव्य के कालखंड में इस जलधारा का अपना एक अलग ही भौगोलिक और धार्मिक रुतबा हुआ करता था, जिसके किनारे बैठकर लोग आज भी शांति की तलाश करते हैं।

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पांडव टीला: जहां दफन है इतिहास

पांडेश्वर मंदिर के प्रांगण से कुछ ही कदमों के फासले पर मिट्टी का एक विशाल और प्राचीन टीला नजर आता है। बोलचाल की भाषा में लोग इसे पांडव टीला कहते हैं, जबकि ऐतिहासिक दस्तावेजों में इस जगह को उल्टा खेड़ा के नाम से भी पुकारा जाता है। यह विशाल ढांचा पुरातत्वविदों के लिए हमेशा से आकर्षण का केंद्र रहा है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यहां समय-समय पर गहराई से खुदाई अभियान चलाता रहता है। अब तक हुई वैज्ञानिक जांच और खुदाई में कई ऐसे दुर्लभ अवशेष हाथ लगे हैं, जो न केवल महाभारत काल की जीवनशैली पर रोशनी डालते हैं, बल्कि इस उपजाऊ इलाके में पनपी अन्य प्राचीन मानव सभ्यताओं के रहस्य भी उजागर करते हैं।

वास्तुकला के अनसुलझे रहस्य

शोभित विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर और इस क्षेत्र के इतिहास के जानकार प्रियंक भारती का मानना है कि इस जमीन के नीचे अभी भी बहुत कुछ खोजा जाना बाकी है। उनका कहना है कि इस इलाके को रहस्यों की भूमि कहना कतई गलत नहीं होगा। भारती ने बताया, "आज जो भी पुराने खंडहर हमें यहां दिखाई देते हैं, वे उस दौर की उत्कृष्ट निर्माण कला और बेजोड़ कार्यशैली का जीता-जागता प्रमाण हैं।" एक समय था जब इस राजधानी की गिनती पूरे भारतवर्ष के सबसे सुंदर और समृद्ध नगरों में होती थी, और यह राजनीति के साथ-साथ संस्कृति का भी बहुत बड़ा गढ़ था।

द्रौपदी का वो श्राप और बर्बाद हुई राजधानी

इस महान नगर के खंडहरों में तब्दील होने के पीछे एक बेहद खौफनाक पौराणिक कहानी प्रचलित है। प्रोफेसर भारती के मुताबिक, यह पूरी तबाही पांचाली यानी द्रौपदी के उस भयंकर श्राप का नतीजा थी, जो उन्होंने अपने घोर अपमान के बाद दिया था। स्थानीय मान्यताओं की मानें तो उसी श्राप के असर से कुरु वंश के तमाम आलीशान महल और इमारतें पूरी तरह से तहस-नहस हो गईं। लोगों का ऐसा अटूट विश्वास है कि उल्टा खेड़ा (पांडव टीला) के नीचे उस प्राचीन और आलीशान महल के ढांचे आज भी उल्टी अवस्था में दबे पड़े हैं।

चमत्कारी कुएं और उनका पवित्र जल

इमारतों के इन अवशेषों से इतर, हस्तिनापुर अपने प्राचीन जल स्रोतों के लिए भी दूर-दूर तक विख्यात है। इसी पांडव टीले के ऊपर एक ऐसा कुआं बना हुआ है, जिसका सीधा ताल्लुक महाभारत के युग से बताया जाता है। इस जल स्रोत का पानी अपने आप में अत्यंत चमत्कारी गुणों वाला बताया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस नीर के उपयोग से त्वचा की कई गंभीर बीमारियों से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाता है। इसी तर्ज पर पांडेश्वर मंदिर के भीतर भी एक अति प्राचीन कुआं मौजूद है। धार्मिक नजरिए से उस कुएं के पानी का भी बहुत सम्मान किया जाता है और श्रद्धालु इसे बेहद पवित्र मानते हैं।

चीर हरण की याद दिलाता द्रौपदी मंदिर

इन तमाम जगहों को देखने के बाद जब पर्यटक आगे बढ़ते हैं, तो उन्हें हस्तिनापुर का प्रसिद्ध द्रौपदी मंदिर दिखाई देता है। यह इकलौता ऐसा धर्मस्थल है जो सीधे तौर पर पांडवों की पत्नी के संघर्षों की यादों को आज भी ताजा रखे हुए है। भारत भर में यह मंदिर इसलिए भी एकदम अनूठा है क्योंकि यहां स्थापित द्रौपदी की प्रतिमा में उनके चीर हरण के उस दर्दनाक प्रसंग को बेहद स्पष्ट रूप से उकेरा गया है। इसके अलावा, हस्तिनापुर का इतिहास सिर्फ द्वापर युग तक ही सीमित नहीं है। जानकारों का कहना है कि इसी क्षेत्र में महान वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के मामा, जिन्हें रघुनाथ जी के नाम से जाना जाता था, उनके महल के अवशेष भी मौजूद हैं।

सवाल-जवाब

हस्तिनापुर शहर मेरठ से कितनी दूरी पर स्थित है?
यह ऐतिहासिक नगर उत्तर प्रदेश के मेरठ से लगभग 45 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
प्राचीन पांडव टीले को अन्य किस नाम से जाना जाता है?
ऐतिहासिक दस्तावेजों और स्थानीय बोलचाल में इस विशाल टीले को उल्टा खेड़ा भी कहा जाता है।
पांडेश्वर मंदिर के समीप से कौन सी नदी बहती है?
इस प्राचीन शिव मंदिर के ठीक बगल से बूढ़ी गंगा की जलधारा प्रवाहित होती है।
हस्तिनापुर का द्रौपदी मंदिर क्यों प्रसिद्ध है?
यह मंदिर पूरे भारत में अनोखा है क्योंकि यहां मौजूद मूर्ति में द्रौपदी के चीर हरण की घटना को दर्शाया गया है।
महाभारत के स्थलों के अलावा यहां और किसके महल के अवशेष होने की बात कही जाती है?
हस्तिनापुर में महान स्वतंत्रता सेनानी रानी लक्ष्मीबाई के मामा रघुनाथ जी के महल के अवशेष भी बताए जाते हैं।
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