बिहार के प्रसिद्ध धार्मिक शहर गयाजी में कल से पितृपक्ष मेले का आयोजन शुरू होने जा रहा है। इस पावन अवसर पर त्रैपाक्षिक कर्मकांड करने वाले श्रद्धालु सबसे पहले फल्गु नदी में स्नान कर अपने पितरों का तर्पण करते हैं। जैसे ही सुबह सूर्य की किरणें फल्गु नदी के जल पर बिखरती हैं, वैसे ही यहां धार्मिक अनुष्ठानों का सिलसिला आरंभ हो जाता है। पितृपक्ष के पहले दिन यानी पूर्णिमा तिथि के अवसर पर फल्गुनी नदी तीर्थ में स्नान के साथ नदी के किनारे खीर के पिंड से श्राद्ध करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जिन परिजनों का देहांत पूर्णिमा तिथि को हुआ हो, उनका श्राद्धकर्म इसी दिन संपन्न किया जाता है। इस वर्ष यह विशेष तिथि 7 सितंबर को पड़ रही है।
खीर के पिंड दान से मिलती है पीढ़ियों को मुक्ति
धार्मिक ग्रंथों और शास्त्रों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि भाद्रपद पूर्णिमा के दिन फल्गु नदी के तट पर खीर का पिंड अर्पित करने से पूर्वजों की कई पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। नदी तट पर यह अनुष्ठान पूरा करने के बाद श्रद्धालु विष्णुपद मंदिर में पहुंचकर भगवान विष्णु के दर्शन करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इससे पितृ प्रसन्न होते हैं और अनुष्ठान करने वाले को असीम धार्मिक लाभ मिलते हैं। जो लोग पूरे पंद्रह दिनों या त्रैपाक्षिक श्राद्ध करने में असमर्थ होते हैं, वे अपनी सुविधा के अनुसार आठ दिन, पांच दिन, तीन दिन या फिर केवल एक दिन गयाजी आकर श्राद्ध और पिंडदान का कर्मकांड संपन्न कर अपने पूर्वजों की मुक्ति की प्रार्थना कर सकते हैं।
तर्पण और आंसुओं से उतरता है पितृ ऋण
फल्गु नदी के जल और काले तिलों के साथ तर्पण करने से पूर्वजों को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। अपने पुरखों की याद में संतान के लिए यह क्षण बेहद भावुक और संवेदनशील होता है। जब पिंडदान करने वालों की आंखें नम होती हैं और उनके आंसू फल्गु नदी में गिरते हैं, तो ऐसा माना जाता है कि वंशजों को पितृ ऋण से मुक्ति मिल जाती है। गयाजी की इस फल्गु नदी को पंचतीर्थ नदी की संज्ञा दी गई है, क्योंकि यह पांच अलग-अलग नदियों के संगम से मिलकर बनी है। मंत्रालय वैदिक पाठशाला के पंडित राजा आचार्य का कहना है कि यह नदी देश की सभी नदियों में सर्वाधिक पवित्र मानी जाती है। सतयुग के समय में इस नदी में निरंतर जल प्रवाहित होता रहता था, लेकिन एक पौराणिक प्रसंग के कारण इसकी धारा को शाप का सामना करना पड़ा।
माता सीता के शाप से जुड़ी है पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण अपने पिता राजा दशरथ के निधन के बाद गयाजी में उनका पिंडदान करने के लिए आए थे। जब भगवान राम और लक्ष्मण पिंडदान के लिए आवश्यक सामग्री लेने शहर की तरफ गए, तब माता सीता फल्गु नदी के पास अकेली थीं। उसी दौरान आकाशवाणी हुई कि पिंडदान का समय हो गया है और उन्हें पिंड दान किया जाए। माता सीता ने फल्गु नदी, गाय, एक ब्राह्मण और अक्षयवट को साक्षी मानकर बालू से ही राजा दशरथ का पिंडदान कर दिया। जब भगवान राम और लक्ष्मण वापस लौटे, तो माता सीता ने उन्हें पूरी घटना बताई, लेकिन भगवान राम को इस बात पर आसानी से विश्वास नहीं हुआ। जब माता सीता ने गवाहों से पूछा, तो फल्गु नदी, गाय और ब्राह्मण ने झूठ बोलकर कह दिया कि माता सीता ने कोई पिंडदान नहीं किया है। केवल अक्षयवट ने सच का साथ दिया। इस झूठ से क्रोधित होकर माता सीता ने फल्गु नदी को यह शाप दे दिया कि अब इसका पानी सतह के ऊपर नहीं बहेगा, जिसके कारण आज भी यह नदी भीतर ही भीतर प्रवाहित होती है।

















