राजस्थान के नागौर जिले में स्थित रेण गांव पिछले ढाई शताब्दियों से अधिक समय से सनातन अध्यात्म का एक प्रमुख केंद्र बना हुआ है। लगभग 268 वर्ष पहले इसी पावन धरा पर अंतरराष्ट्रीय वरिष्ठ रामस्नेही संप्रदाय का बीजारोपण हुआ था। आदि आचार्य दरियाव महाराज ने अपने पूज्य गुरु प्रेमदास महाराज से प्राप्त दिव्य ज्ञान एवं मार्गदर्शन के आधार पर इस आध्यात्मिक पंथ की स्थापना की थी। मानव कल्याण, आत्मज्ञान और श्रीराम की निष्काम भक्ति का संदेश देने वाला यह संप्रदाय आज केवल नागौर या राजस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के विभिन्न राज्यों से लेकर विदेशों में भी लाखों श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का केंद्र बन चुका है।
रामभक्ति और कृष्ण जन्मोत्सव का अनूठा आध्यात्मिक संगम
रेण स्थित रामधाम की एक अद्भुत विशेषता यह है कि यहां भगवान श्रीराम की निरंतर और अखंड भक्ति के साथ-साथ भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव भी अत्यंत हर्षोल्लास एवं भव्यता के साथ मनाया जाता है। इसके पीछे एक गहरा और अनोखा आध्यात्मिक संयोग जुड़ा हुआ है। संप्रदाय के संस्थापक आदि आचार्य दरियाव महाराज तथा पूर्व पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. हरिनारायण शास्त्री, इन दोनों महान संतों का जन्म भाद्रपद मास की कृष्ण जन्माष्टमी तिथि को ही हुआ था। यही कारण है कि रेणपीठ में जन्माष्टमी का पर्व केवल एक धार्मिक त्योहार मात्र नहीं रहता, बल्कि यह पूरी गुरु-शिष्य परंपरा के प्रति कृतज्ञता एवं सम्मान प्रकट करने वाले एक महाउत्सव के रूप में रूपांतरित हो जाता है।
लाखासागर सरोवर में तैरती ईंट और तपस्या का प्रतीक
रेणधाम परिसर में स्थित लाखासागर सरोवर श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत पवित्र एवं दर्शनीय स्थल है। जनश्रुति और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस सरोवर में आदि आचार्य दरियाव महाराज की कठिन साधना और तपस्या से जुड़ी एक ऐतिहासिक ईंट आज भी जल की सतह पर तैरती हुई दिखाई देती है। इस अलौकिक दृश्य के दर्शन करने और इस पावन तपोभूमि को नमन करने के लिए हर वर्ष देश के कोने-कोने से तथा विदेशों से भी अनगिनत श्रद्धालु रेण पहुंचते हैं। स्थानीय निवासियों और भक्तों के लिए यह घटना केवल एक भौतिक कौतुक नहीं है, बल्कि यह गुरु महाराज के तपोबल और रामभक्ति की अमर शक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण मानी जाती है।
नौवीं गद्दी का नेतृत्व और 150 रामद्वारों का विस्तृत नेटवर्क
संस्थापक आदि आचार्य दरियाव महाराज के महाप्रयाण के पश्चात इस महान रामस्नेही पीठ की गद्दी पर समय-समय पर 8 विद्वान पीठाचार्यों ने आसीन होकर संप्रदाय का कुशल संचालन किया है। वर्तमान समय में इस पावन पीठ की नौवीं गद्दी के पीठाधीश्वर के रूप में आचार्य सज्जनराम महाराज विराजमान हैं, जो परंपरा की गरिमा को आगे बढ़ा रहे हैं। आज रेणपीठ के मार्गदर्शन में राजस्थान सहित पूरे भारतवर्ष में लगभग 150 रामद्वारे सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं। इसके अतिरिक्त करीब 170 समर्पित संत निरंतर भ्रमण करते हुए रामनाम तथा दरियाव वाणी के मूल सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं, जिससे आध्यात्मिक चेतना का निरंतर विस्तार हो रहा है।
अष्टांग योग, आत्मज्ञान और विशाल मेले
रामस्नेही संप्रदाय के माध्यम से हजारों साधक और श्रद्धालु अष्टांग योग, आत्मज्ञान तथा निष्काम भक्ति के मार्ग को अपनाकर अपने जीवन को सार्थक बना रहे हैं। रेणधाम में वर्ष के दौरान तीन प्रमुख धार्मिक मेलों का आयोजन होता है, जो चैत्र पूर्णिमा, भाद्र पूर्णिमा और मार्गशीर्ष पूर्णिमा के पावन अवसरों पर आयोजित किए जाते हैं। इन तीनों विशाल मेलों के दौरान प्रत्येक अवसर पर दस हजार से अधिक श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ता है। यह पावन स्थल आज भी गुरु-शिष्य परंपरा का अनुपम उदाहरण पेश करते हुए मानव चेतना को ईश्वर भक्ति की ओर प्रेरित कर रहा है।



















