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सावन में शिवलिंग जलाभिषेक और कांवड़ यात्रा के लिए नियम जारी, बरेली के विद्वान पंडित सुशील पाठक ने बताई सही विधिधर्म
2 अग॰ 2026, 7:57 pm (59 दिन पहले)· 1

सावन में शिवलिंग जलाभिषेक और कांवड़ यात्रा के लिए नियम जारी, बरेली के विद्वान पंडित सुशील पाठक ने बताई सही विधि

सावन महीने की शुरुआत के साथ बरेली के नाथ नगरी शिवालयों में श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। विद्वान पंडित सुशील पाठक ने कांवड़ यात्रा के दौरान पवित्रता बनाए रखने और जलाभिषेक की सही धार्मिक विधि की जानकारी साझा की है।

सावन के पावन महीने का आगाज होते ही नाथ नगरी बरेली के सभी प्रमुख शिवालयों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ने लगी है। पहले सावन सोमवार और कांवड़ यात्रा को लेकर शिवभक्तों में जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है। इस पावन अवसर पर स्थानीय विद्वान पंडित सुशील पाठक ने कांवड़ियों तथा मंदिर आने वाले सभी श्रद्धालुओं से भक्तिभाव के साथ स्वच्छता, अनुशासन और धार्मिक मर्यादा का पूरी तरह पालन करने का विशेष अनुरोध किया है।

कांवड़ यात्रा के दौरान मर्यादा और पवित्रता के नियम

कांवड़ यात्रा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए पंडित सुशील पाठक ने स्पष्ट किया कि यह केवल एक प्रचलित धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि यह कठिन तपस्या, आत्म-नियंत्रण और अटूट श्रद्धा का पवित्र प्रतीक है। यात्रा की शुचिता बनाए रखने के लिए उन्होंने कांवड़ यात्रियों से डीजे पर किसी भी प्रकार के अश्लील या फूहड़ गीत न बजाने तथा किसी भी तरह के नशे से पूरी तरह दूर रहने का आग्रह किया है। इसके अलावा, उन्होंने कहा कि भगवान के विभिन्न स्वरूपों को सड़क पर नचाने के बजाय उन्हें आदरपूर्वक सिंहासन पर विराजित किया जाना चाहिए। पंडित जी ने कहा, "जितनी अधिक पवित्रता और श्रद्धा के साथ कांवड़ यात्रा पूरी की जाएगी, उतना ही अधिक उसका आध्यात्मिक फल प्राप्त होगा।"

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शिवलिंग जलाभिषेक का सही समय और पवित्र सामग्री

भगवान शिव के जलाभिषेक की धार्मिक शास्त्रीय विधि साझा करते हुए पंडित जी ने बताया कि सूर्योदय से पूर्व का समय यानी प्रातः लगभग चार बजे का ब्रह्म मुहूर्त जलाभिषेक के लिए सर्वोत्तम और अति फलदायी माना जाता है। शिवलिंग पर गंगाजल, बेलपत्र, भांग तथा धतूरा अर्पित करना विशेष रूप से शुभ और कल्याणकारी होता है। इसके विपरीत, शास्त्रों के अनुसार कुछ सामग्रियों को शिवलिंग पर चढ़ाना वर्जित माना गया है। जलाभिषेक के दौरान श्रद्धालुओं को तुलसी के पत्ते, केतकी के फूल, हल्दी, कुमकुम और शंख से जल अर्पित करने से पूरी तरह बचना चाहिए।

जल अर्पण की विधि, परिक्रमा और कांवड़ियों के लिए सम्मान

शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय जल की धारा को अत्यंत धीमी और निरंतर बनाए रखना चाहिए। ध्यान रहे कि पूजा के दौरान शिवलिंग की पूरी गोल परिक्रमा कभी नहीं की जाती; जल की धारा जहां से निकलती है, उस सोमसूत्र तक पहुंचकर वहीं से वापस लौट आना चाहिए। चाहे श्रद्धालु पैदल कांवड़ ला रहे हों, डाक कांवड़, खड़ी कांवड़ या दांडी कांवड़ उठा रहे हों, सभी पद्धतियों में सात्विक आहार, शारीरिक स्वच्छता और नियमों की कठोरता सबसे आवश्यक होती है। लाखों शिवभक्त अपनी मनोकामनाओं और शिव भक्ति के वशीभूत होकर सैकड़ों किलोमीटर नंगे पांव चलकर कठिन तप करते हैं। इसलिए स्थानीय मंदिर प्रबंधन और आम दर्शनार्थियों को दूर-दराज से पैदल चलकर आने वाले इन कांवड़ियों को पहले जलाभिषेक करने का अवसर देना चाहिए।

सवाल-जवाब

शिवलिंग पर जलाभिषेक करने का सबसे उत्तम समय कौन सा माना गया है?
भगवान शिव का जलाभिषेक करने के लिए सुबह लगभग चार बजे से सूर्योदय से पूर्व तक का ब्रह्म मुहूर्त समय सबसे श्रेष्ठ माना गया है।
कांवड़ यात्रा के दौरान पंडित सुशील पाठक ने किन बातों से परहेज करने की सलाह दी है?
उन्होंने डीजे पर अश्लील गीत न बजाने, किसी भी प्रकार का नशा न करने और भगवान के स्वरूपों को नचाने के बजाय उन्हें सिंहासन पर विराजित करने की अपील की है।
शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय परिक्रमा का क्या नियम है?
शिवलिंग की पूरी गोल परिक्रमा नहीं करनी चाहिए। जल निकासी वाले सोमसूत्र तक पहुंचकर वहीं से वापस लौट आना चाहिए।
शिवलिंग पर जलाभिषेक के दौरान किन सामग्रियों को चढ़ाना वर्जित माना गया है?
जलाभिषेक के समय तुलसी के पत्ते, केतकी के फूल, हल्दी, कुमकुम और शंख से जल अर्पित करना वर्जित माना गया है।
स्थानीय श्रद्धालुओं को कांवड़ियों के प्रति क्या शिष्टाचार अपनाने को कहा गया है?
दूर-दराज से सैकड़ों किलोमीटर नंगे पांव चलकर आने वाले कांवड़ियों को मंदिरों में पहले जलाभिषेक करने का अवसर देने की अपील की गई है।
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