हर साल आश्विन महीने की पूर्णिमा तिथि को शरद पूर्णिमा का पर्व बेहद उत्साह के साथ मनाया जाता है। हिंदू धर्म में इस तिथि का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत अधिक महत्व है। इस खास अवसर को देश के अलग-अलग हिस्सों में कोजागरी पूर्णिमा, रास पूर्णिमा, कौमुदी व्रत और कुमार पूर्णिमा के नामों से भी पुकारा जाता है। शरद पूर्णिमा के साथ ही मौसम में बदलाव के जरिए शरद ऋतु का आधिकारिक प्रवेश हो जाता है। इसके साथ ही कई तरह के मांगलिक कार्य, पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत भी इसी दिन से हो जाती है।
पौराणिक मान्यताओं के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि समुद्र मंथन के दौरान इसी विशेष दिन क्षीरसागर से माता लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था। माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में चुना था, इसलिए इस दिन को उनके प्रकटोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। इस वर्ष शरद पूर्णिमा 25 अक्टूबर की रात को सेलिब्रेट की जाएगी। पंचांग के अनुसार, आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर को सुबह 11:55 बजे आरंभ होगी और इसका समापन अगले दिन यानी 26 अक्टूबर को सुबह 9:41 बजे होगा। इन तिथियों के समीकरण को देखते हुए शरद पूर्णिमा की मुख्य रात्रि 25 अक्टूबर की ही मानी जाएगी।
चंद्रमा की सोलह कलाएं और अमृतवर्षा की मान्यता
धार्मिक आस्था के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी पूरी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होकर आकाश में चमकता है। ऐसी लोक मान्यता है कि इस खास रात को चंद्रमा की किरणों से अमृत बरसता है। खीर में उपयोग होने वाले मुख्य घटक दूध और चावल को चंद्रमा का कारक माना जाता है। जब इस खीर को रात के समय खुले आसमान के नीचे रखा जाता है, तो चंद्रमा की दिव्य ऊर्जा और किरणें सीधे तौर पर उसमें समाहित हो जाती हैं। यही वजह है कि सुबह इस खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा चली आ रही है।
भगवान श्रीकृष्ण का महारास और बांके बिहारी मंदिर के दर्शन
पौराणिक कथाओं में इस रात का एक और बड़ा ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि शरद पूर्णिमा की पावन रात्रि को भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के साथ महारास रचाया था। इस अद्भुत लीला को भक्ति, समर्पण और प्रेम का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है, जिसके कारण इस तिथि को रास पूर्णिमा की संज्ञा भी दी गई है। इस शुभ अवसर पर मथुरा के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर में ठाकुरजी विशेष रूप से महारास की मुद्रा में वंशी धारण करके भक्तों को दर्शन देते हैं। भगवान श्रीकृष्ण के इस दुर्लभ स्वरूप के दर्शन साल में केवल एक बार शरद पूर्णिमा के दिन ही प्राप्त होते हैं।
माता लक्ष्मी का पृथ्वी पर विचरण और कोजागरी व्रत
एक अन्य प्रचलित मान्यता के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात को माता लक्ष्मी पृथ्वी लोक पर भ्रमण के लिए निकलती हैं। इस दौरान वे यह देखती हैं कि कौन जाग रहा है और इसके लिए वे ‘कोजागर्ति’ यानी कौन जाग रहा है का संदेश देती हैं। जो लोग इस रात सोते नहीं हैं और माता लक्ष्मी की सच्ची श्रद्धा के साथ उपासना करते हैं, उनके जीवन पर माता की विशेष कृपा बरसती है। रातभर जागने और आराधना करने की इस परंपरा के कारण ही इस व्रत को कोजागरी व्रत भी कहा जाता है।
शरद पूर्णिमा की मुख्य परंपराएं और पूजन विधि
इस पावन पर्व पर कई तरह की प्राचीन परंपराएं और विधान निभाए जाते हैं। इस दिन गाय के शुद्ध दूध और चावल से खीर तैयार की जाती है और इसे रात के समय चांदनी में खुले आसमान के नीचे छोड़ा जाता है ताकि चंद्र किरणें उस पर पड़ सकें। इसके अलावा शरद पूर्णिमा के अवसर पर माता लक्ष्मी की स्वर्णमयी मूर्ति की स्थापना कर विधि-विधान से पूजा की जाती है। मंदिरों और घरों में घी के दीपक जलाए जाते हैं और पूरी रात जागकर विशेष मंत्रों का जाप किया जाता है। भक्त इस रात माता लक्ष्मी और भगवान श्रीकृष्ण के मंत्रों का स्मरण करते हैं। इस दिन सफेद वस्त्र, चावल, चीनी, चांदी के बर्तन और भोजन का दान करना बेहद पुण्यदायी और शुभ माना जाता है।
खीर रखने के पीछे का वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ इस परंपरा के पीछे एक मजबूत वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक आधार भी मौजूद है। शरद ऋतु के आगमन के साथ ही शरीर में पित्त का प्रकोप बढ़ने लगता है। खीर की तासीर ठंडी होती है, जो शरीर के तापमान को संतुलित रखने में मदद करती है। जब इस खीर को चांदी के बर्तनों में रखकर पूरी रात चांदनी रात में खुले आसमान के नीचे रखा जाता है, तो चांदी के औषधीय गुण और चंद्रमा की किरणें मिलकर इसे स्वास्थ्य के लिए किसी औषधि से कम नहीं रहने देतीं। इसे खाने से पाचन क्रिया बेहतर होती है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी में भी उल्लेखनीय सुधार होता है.




















