केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर के प्रशासन ने श्रद्धालुओं के साथ वर्षों पहले हुए दुर्व्यवहार और कठोर शब्दों के प्रायश्चित के लिए एक अनूठी धार्मिक पहल शुरू की है। मंदिर में बोली गई अमर्यादित वाणी से उत्पन्न वाक्-दोष के निवारण हेतु ट्रैवणकोर देवस्वम बोर्ड का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल कर्नाटक स्थित ऐतिहासिक कोल्लूरु श्री मूकांबिका मंदिर पहुंचा। अधिकारियों ने देवी मूकांबिका के चरणों में एक विशेष पीतल की घंटी अर्पित कर आठ वर्षों से लंबित धार्मिक अनुष्ठानों के प्रथम चरण का औपचारिक शुभारंभ किया। यह कदम आगामी मंडलम तीर्थयात्रा सीजन की शुरुआत से पहले मंदिर की आध्यात्मिक शुद्धि और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को सुचारू बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है।
2018 का अष्टमंगल देवप्रश्नम और वाक्-दोष की पहचान
सबरीमाला मंदिर में उत्पन्न इस आध्यात्मिक दोष की जड़ें वर्ष 2018 में आयोजित हुए पारंपरिक ज्योतिषीय परामर्श अनुष्ठान में छिपी हैं। दक्षिण भारतीय मंदिर परंपरा में अष्टमंगल देवप्रश्नम एक अत्यंत पवित्र और गहन ज्योतिषीय प्रक्रिया मानी जाती है। इसके माध्यम से मंदिर की आध्यात्मिक स्थिति, प्रशासनिक कमियों और देवताओं की प्रसन्नता या अप्रसन्नता से जुड़े गूढ़ कारणों की जांच की जाती है। वर्ष 2018 के देवप्रश्नम के दौरान ज्योतिषियों और धार्मिक विद्वानों ने पाया था कि मंदिर के परिसर में गंभीर आध्यात्मिक त्रुटियां घटी हैं।
इस परामर्श के दौरान उजागर हुए प्रमुख मुद्दों में मंदिर परिसर में तैनात कर्मचारियों और सुरक्षाकर्मियों का व्यवहार शामिल था। विद्वानों के अनुसार, दर्शन के लिए आने वाले तीर्थयात्रियों के साथ कुछ कर्मचारियों ने अत्यंत कठोर, अपमानजनक और असभ्य भाषा का प्रयोग किया था। सनातन धार्मिक मान्यताओं में पवित्र स्थान पर बोली गई कटु वाणी को वाक्-दोष की श्रेणी में रखा जाता है। इस दोष के कारण मंदिर के आध्यात्मिक वातावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की बात कही गई थी। इसी के समाधान स्वरूप विद्वानों ने वाणी की अधिष्ठात्री देवी के दरबार में विशेष प्रायश्चित पूजा और प्रतीकात्मक वस्तुएं अर्पित करने की सलाह दी थी।
सन्निधानम में पवित्रीकरण और कोल्लूरु में घंटी का समर्पण
आठ साल की लंबी प्रतीक्षा के बाद ट्रैवणकोर देवस्वम बोर्ड ने इस धार्मिक दायित्व को पूरा करने का बीड़ा उठाया। बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारी पी.एस. संथाकुमार और श्रीनिवास की अध्यक्षता में एक विशेष प्रतिनिधिमंडल इस अनुष्ठान को संपन्न कराने के लिए कर्नाटक रवाना हुआ। प्रतिनिधिमंडल अपने साथ एक विशेष रूप से तैयार की गई पीतल की घंटी लेकर गया था। इस घंटी को कोल्लूरु ले जाने से पूर्व सबरीमाला के मुख्य मंदिर परिसर, जिसे सन्निधानम कहा जाता है, वहां ले जाया गया।
गत 3 अगस्त को सबरीमाला सन्निधानम में प्रसिद्ध निरापुथारी उत्सव का आयोजन किया गया था। इस शुभ अवसर पर वैदिक मंत्रोचार के बीच घंटी का पूर्ण पवित्रीकरण और विशेष पूजन संपन्न किया गया। इसके उपरांत प्रतिनिधिमंडल इस पवित्र घंटी को लेकर कर्नाटक के उड़ुपी जिले में स्थित कोल्लूरु मूकांबिका मंदिर पहुंचा। वहां मूकांबिका देवी के मुख्य गर्भगृह में विशेष पूजा-अर्चना के बाद घंटी को औपचारिक रूप से मंदिर में समर्पित कर दिया गया। इसके साथ ही वाक्-दोष निवारण प्रक्रिया का पहला चरण सफलतापूर्वक पूरा हो गया।
तीन प्रतीकात्मक चढ़ावे: जीभ, नारायम और घंटी का गहरा आध्यात्मिक अर्थ
देवप्रश्नम में सुझाए गए प्रायश्चित विधान के अनुसार, वाक्-दोष के पूर्ण निवारण के लिए केवल घंटी चढ़ाना पर्याप्त नहीं है। इस अनुष्ठान में वाणी और अभिव्यक्ति से जुड़ी तीन प्रतीकात्मक वस्तुओं के चढ़ावे का स्पष्ट निर्देश दिया गया है। इनमें पहली वस्तु मानव जीभ की आकृति है, जो बोले गए शब्दों का प्रतिनिधित्व करती है। दूसरी वस्तु नारायम है, जो प्राचीन काल में ताड़पत्रों पर लिखने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली लोहे या धातु की एक पारंपरिक लेखनी या स्टाइलस होती है। तीसरी वस्तु घंटी है, जो ध्वनि और पवित्र नाद का प्रतीक मानी जाती है।
शास्त्रों के अनुसार कर्नाटक का कोल्लूरु मंदिर वाणी, ज्ञान और संगीत की देवी माता मूकांबिका का परम धाम माना जाता है। वाणी से जुड़ी किसी भी भूल या दोष के समाधान के लिए देवी मूकांबिका की साधना और उन्हें जीभ, लेखनी तथा घंटी समर्पित करना अत्यधिक फलदायी माना गया है। प्रतिनिधिमंडल ने प्रथम चरण में घंटी अर्पित कर दी है। ट्रैवणकोर देवस्वम बोर्ड के अनुसार, बाकी दो वस्तुएं यानी जीभ और नारायम को चांदी या सोने जैसी बहुमूल्य धातुओं से निर्मित कराया जा रहा है। आगामी शारदीय नवरात्रि के पवित्र पर्व पर प्रतिनिधिमंडल इन चांदी की वस्तुओं के साथ पुनः कोल्लूरु पहुंचेगा, जहां एक भव्य महा पूजा के साथ संपूर्ण अनुष्ठान का समापन होगा।
आठ वर्षों का विलंब, हालिया विवाद और आगामी तीर्थयात्रा की तैयारी
यह पूरा मामला इस लिहाज से भी चर्चा का केंद्र बना हुआ है कि वर्ष 2018 में सुझाए गए धार्मिक उपायों को अमलीजामा पहनाने में पूरे आठ साल लग गए। हाल के महीनों में सबरीमाला मंदिर प्रशासन कई प्रशासनिक और धार्मिक विवादों के कारण सुर्खियों में रहा है। इनमें मंदिर के गर्भगृह और मुख्य संरचनाओं पर की गई स्वर्ण-परत यानी गोल्ड-प्लेटिंग से जुड़े विवाद भी शामिल हैं। इन विवादों के बीच बोर्ड ने मंदिर की प्रतिष्ठा और सुचारू संचालन के लिए पुराने आध्यात्मिक उपायों को प्राथमिकता पर पूरा करने का निर्णय लिया है।
ट्रैवणकोर देवस्वम बोर्ड के अध्यक्ष तथा केरल के पूर्व मुख्य सचिव के. जयकुमार ने इस संदर्भ में स्पष्ट किया कि कोल्लूरु में लंबे समय से लंबित इन पूजा-अर्चनाओं को पूरा करने से मंदिर से जुड़ी सभी बाधाएं और परेशानियां दूर होंगी। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इन अनुष्ठानों के संपन्न होने से आने वाले मंडलम तीर्थयात्रा सीजन का संचालन अत्यंत शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित ढंग से हो सकेगा। इसके अतिरिक्त, व्यापक शुद्धि योजना के तहत अधिकारियों की टीम आने वाले दिनों में दक्षिण भारत के लगभग 25 प्रमुख मंदिरों का दौरा कर सकती है, जहां विशेष पूजा अर्चना और पारंपरिक चढ़ावे अर्पित किए जाएंगे।
सामान्य श्रद्धालुओं की भांति दर्शन और मूकांबिका मंदिर प्रबंधन का अनुभव
सबरीमाला प्रतिनिधिमंडल की इस धार्मिक यात्रा की एक खास बात यह रही कि अधिकारियों ने मूकांबिका मंदिर प्रशासन से किसी भी प्रकार की वीआईपी व्यवस्था या विशेष सुविधाओं की मांग नहीं की। कोल्लूरु मंदिर के कर्मचारियों के अनुसार, प्रतिनिधिमंडल एक आम श्रद्धालु समूह की तरह मंदिर पहुंचा। उन्होंने सामान्य प्रक्रिया के तहत टिकट लिए, कतार में खड़े होकर देवी के दर्शन किए और निर्धारित पूजा संपन्न की।
पूजा पूर्ण होने के पश्चात प्रतिनिधियों ने मंदिर के पुजारियों और उपस्थित कर्मचारियों को अपनी धार्मिक योजना और 2018 के देवप्रश्नम के संदर्भ के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि नवरात्रि के दौरान वे चांदी की जीभ और लेखनी अर्पित करने पुनः आएंगे। इसके बाद प्रतिनिधिमंडल वहां से प्रस्थान कर गया। अब सभी श्रद्धालुओं और धार्मिक प्रेमियों की निगाहें आगामी नवरात्रि पर टिकी हैं, जब इस अनूठे प्रायश्चित अनुष्ठान की अंतिम महा पूजा संपन्न होगी।



















