उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक नगर गाज़ीपुर में चीतनाथ घाट के समीप स्थापित बाबा कोटेश्वर नाथ मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं है, बल्कि इसका इतिहास पौराणिक काल से गहराई से जुड़ा हुआ है। सनातन परंपरा में गाज़ीपुर को 'छोटी काशी' या 'लहुरी काशी' के नाम से भी पुकारा जाता है, और इस नामकरण के पीछे रामायण कालीन एक विशेष गाथा छिपी है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र स्थान की नींव त्रेता युग में की गई एक महान तपस्या के बाद पड़ी थी।
राजा गाधि की कठोर साधना और महादेव का वरदान
स्थान के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए मंदिर के पुजारी बावन दाश बताते हैं कि त्रेता युग के दौरान राजा विश्वामित्र के पिता, राजा गाधि ने इसी भूभाग पर बैठकर भगवान शिव की कठिन तपस्या की थी। उनकी अविचल भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं महादेव प्रकट हुए और उनसे मनचाहा वर मांगने को कहा। राजा गाधि ने ईश्वर से प्रार्थना की कि वे जिस स्थल पर ध्यान साधना कर रहे हैं, उसे काशी के समान पवित्र दर्जा प्रदान किया जाए।
भगवान भोलेनाथ ने राजा की प्रार्थना स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि काशी पहले से ही स्थापित है, इसलिए इस साधना स्थली को 'लहुरी काशी' या 'छोटी काशी' के रूप में ख्याति मिलेगी। मंदिर में विराजमान मुख्य शिवलिंग को रामायण काल का ही माना जाता है। इसके अतिरिक्त, मंदिर प्रांगण में माता पार्वती और भगवान गणेश की दिव्य मूर्तियां स्थापित हैं। वहीं, भगवान काल भैरव की प्रतिमा को लगभग 30-40 साल पहले यहां पूरे विधि-विधान के साथ प्रतिष्ठित किया गया था।
शिव पुराण में दर्ज गाथा और मोक्ष का द्वार
मंदिर के एक अन्य पुजारी गोपाल गोस्वामी इस प्राचीन वृत्तांत का समर्थन करते हुए कहते हैं कि इस घटना का विस्तृत विवरण शिव पुराण में भी प्राप्त होता है। जब राजा गाधि ने इस स्थान को काशी जैसा बनाने का अनुरोध किया था, तब महादेव ने एक महत्वपूर्ण उपदेश देते हुए कहा था कि "जहां ज्ञान है, वही काशी है।"
शिव पुराण के प्रसंगों के अनुसार, भगवान शंकर ने आश्वस्त किया था कि जितना पुण्य और ज्ञान मूल काशी में प्राप्त होता है, उतना ही ज्ञान इस लहुरी काशी में भी साधकों को सुलभ होगा। जिस प्रकार गंगा तट पर स्थित काशी में प्रभु का वास और मुक्ति का धाम है, ठीक उसी तरह इस पावन क्षेत्र में भी श्रद्धालुओं को समान पवित्रता और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
सावन मास में श्रद्धालुओं की उमड़ती अपार भीड़
हर वर्ष सावन के पावन महीने में बाबा कोटेश्वर नाथ मंदिर का परिदृश्य पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है। पुजारी गोपाल गोस्वामी के अनुसार, सावन के दौरान तड़के सुबह साढ़े तीन बजे से ही भक्तों का आगमन शुरू हो जाता है। विशेष रूप से सावन के सोमवार को मंदिर परिसर में इतनी विशाल भीड़ जुटती है कि व्यवस्था संभालना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
दूर-दूर से आने वाले भक्त अपनी विशेष मनोकामनाएं लेकर यहां पहुंचते हैं। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार महादेव का रुद्राभिषेक और जलाभिषेक सम्पन्न कराते हैं, ताकि उनका जीवन सुख, शांति और समृद्धि से परिपूर्ण हो सके।



















