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सरयू नदी के तट पर कुश ने क्यों बसाया नागेश्वर नाथ मंदिर? जानिए त्रेतायुग की पौराणिक कथाधर्म
14 अग॰ 2026, 6:52 pm (2 घंटे पहले)· 1

सरयू नदी के तट पर कुश ने क्यों बसाया नागेश्वर नाथ मंदिर? जानिए त्रेतायुग की पौराणिक कथा

अयोध्या के सरयू तट पर स्थित प्राचीन नागेश्वर नाथ मंदिर में सावन के महीने में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। त्रेतायुग में भगवान श्रीराम के बेटे कुश द्वारा स्थापित इस मंदिर का पौराणिक इतिहास नागकन्या कुमुदिनी और भगवान शिव के प्राकट्य से जुड़ा है।

सावन के पावन महीने में सरयू नदी के पावन तट पर स्थित नागेश्वर नाथ मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। लाखों की संख्या में भक्त सरयू नदी में पवित्र स्नान करने के उपरांत भगवान शिव के इस अति प्राचीन विग्रह पर जलाभिषेक कर रहे हैं। अयोध्या के स्वर्गद्वार क्षेत्र में अवस्थित यह देवालय न केवल अपनी भव्यता के लिए विख्यात है, बल्कि इसका इतिहास त्रेतायुग में भगवान श्रीराम के पुत्र कुश से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

त्रेतायुग की वह पौराणिक कथा जब सरयू में गिरा था कुश का कंकण

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, त्रेतायुग के समय महाराज कुश एक बार अयोध्या पधारे थे। जब वे सरयू नदी के जल में स्नान कर रहे थे, उसी समय अचानक उनका बहुमूल्य कंकण जल की तेज धारा में बह गया। नदी की गहराइयों में वह आभूषण नागराज कुमुद की पुत्री कुमुदिनी के हाथ लग गया। जब कुश को इस बात का संज्ञान हुआ कि उनका कंकण नागकन्या के पास चला गया है, तो वे अत्यधिक क्रोधित हो उठे। अपने कंकण को पुनः प्राप्त करने के उद्देश्य से उन्होंने तुरंत अपने धनुष पर बाण का संधान कर लिया।

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कुश के प्रचंड क्रोध और सम्भावित विनाश से अपनी पुत्री की रक्षा करने के लिए नागराज कुमुद ने देवाधिदेव भगवान शिव की शरण ली। उन्होंने पूरी निष्ठा से महादेव की आराधना की और पुत्री की रक्षा हेतु प्रार्थना की। नागराज की निश्चल भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान शिव वहां प्रकट हुए। प्रकट होने के पश्चात महादेव ने महाराज कुश को शांत करते हुए नागकन्या को अभयदान देने का परामर्श दिया।

भगवान शिव का प्राकट्य और नागेश्वर नाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना

साक्षात भगवान शिव के दिव्य दर्शन पाते ही महाराज कुश का समस्त क्रोध क्षण भर में शांत हो गया। उन्होंने महादेव की आज्ञा का पालन करते हुए नागराज कुमुद तथा उनकी पुत्री कुमुदिनी को सहर्ष अभयदान प्रदान किया। इसके पश्चात उन्होंने पूरी विधि विधान से भगवान शिव की स्तुति और पूजा अर्चना की। नागराज कुमुद की विशेष प्रार्थना पर महादेव ने उसी स्थान पर सदा के लिए निवास करने का वरदान दिया।

शिव जी के इस प्राकट्य और कृपा को स्मरण रखने के लिए महाराज कुश ने वहां एक भव्य शिवलिंग की स्थापना की। नागराज और नागकन्या से जुड़े इस पावन प्रसंग के कारण ही इस मंदिर का नाम नागेश्वर नाथ रखा गया। तब से लेकर आज तक यह स्थान नाग परंपरा और प्रभु श्रीराम के वंशज कुश की भक्ति का जीवंत प्रतीक बना हुआ है।

गर्भगृह में नागों से घिरा गोलाकार अर्घा और पूजा का विधान

मंदिर के पुजारी प्रभाकर चतुर्वेदी के अनुसार, सरयू किनारे स्वर्गद्वार क्षेत्र में स्थित यह मंदिर ऐतिहासिक एवं पौराणिक दृष्टिकोण से अत्यंत पूजनीय है। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग का स्वरूप बहुत ही अद्वैत और मनमोहक है। यहाँ भगवान शिव का विग्रह एक गोलाकार अर्घे पर विराजमान है, जिसे नागों की आकृतियों से वेष्टित किया गया है। शिव जी का यही अनूठा स्वरूप दूर दूर से आने वाले श्रद्धालुओं के आकर्षण और अगाध श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है।

धार्मिक मान्यता है कि नागेश्वर नाथ मंदिर में महादेव के दर्शन और पूजन करने से साधक को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। सावन के महीने और महाशिवरात्रि के महापर्व पर यहाँ का वातावरण पूरी तरह शिवमय हो जाता है। श्रद्धालु पहले सरयू नदी के पावन जल में डुबकी लगाते हैं और फिर कतारबद्ध होकर नागेश्वर नाथ का जलाभिषेक करते हैं। अयोध्या की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान में इस मंदिर का स्थान अत्यंत विशिष्ट है।

सवाल-जवाब

नागेश्वर नाथ मंदिर की स्थापना किसने की थी?
पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस मंदिर की स्थापना त्रेतायुग में भगवान श्रीराम के पुत्र कुश ने की थी।
यह मंदिर अयोध्या में कहाँ स्थित है?
नागेश्वर नाथ मंदिर अयोध्या में पावन सरयू नदी के तट पर स्वर्गद्वार क्षेत्र में अवस्थित है।
मंदिर के नामकरण के पीछे क्या पौराणिक कथा है?
सरयू में कुश का कंकण नागकन्या कुमुदिनी को मिला था। नागराज कुमुद की शिव भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और कुश ने नागकन्या को अभयदान देकर यहाँ नागेश्वर नाथ शिवलिंग स्थापित किया।
गर्भगृह में शिवलिंग का स्वरूप कैसा है?
गर्भगृह में भगवान शिव का विग्रह एक गोलाकार अर्घे पर विराजमान है, जो नागों की आकृतियों से वेष्टित है।
नागेश्वर नाथ मंदिर में किन अवसरों पर सबसे अधिक भीड़ होती है?
सावन के पवित्र महीने और महाशिवरात्रि के महापर्व पर यहाँ लाखों श्रद्धालु सरयू स्नान के बाद जलाभिषेक करने पहुँचते हैं।
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