धार्मिक नगरी उज्जैन अपनी प्राचीन परंपराओं और प्रसिद्ध मंदिरों के लिए पूरी दुनिया में एक अलग पहचान रखती है। इसी क्रम में मंगलनाथ रोड पर स्थित भगवान श्रीकृष्ण के सांदीपनि आश्रम में गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर एक बार फिर प्राचीन परंपराओं का अनूठा संगम देखने को मिलेगा। इस खास दिन को लेकर मंदिर परिसर में सभी आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली गई हैं, जहां हजारों साल पुरानी रीति-रिवाजों को जीवंत किया जाएगा।
सांदीपनि आश्रम में कैसे होगा विशेष अनुष्ठान
मंदिर के पुजारी पंडित कीर्ति रुपम व्यास ने जानकारी देते हुए बताया कि गुरु पूर्णिमा के इस पवित्र पर्व की शुरुआत भगवान श्रीकृष्ण और सांदीपनि मुनि के विशेष अभिषेक के साथ होगी। इस अनुष्ठान में भगवान का अभिषेक पवित्र नदियों जैसे गंगा, गोमती और प्रयागराज के जल से किया जाएगा। इसके पश्चात भगवान को नए वस्त्र अर्पित किए जाएंगे और मोगरे के सुंदर फूलों से उनका भव्य श्रृंगार किया जाएगा। इस दौरान देश के कई हिस्सों से अभिभावक अपने नौनिहालों के साथ विद्या आरंभ संस्कार कराने के लिए आश्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे। आश्रम के वंशज पुजारियों के मुताबिक, इस पवित्र स्थल पर पांच हजार वर्षों से निरंतर गुरु-शिष्य परंपरा का पालन किया जा रहा है।
विद्यारंभ संस्कार और पाटी पूजन का महत्व
अभिषेक और श्रृंगार के उपरांत विधि-विधान से पूजन संपन्न होने के बाद भव्य महाआरती का आयोजन किया जाएगा, जिसके तुरंत बाद श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया जाएगा। गुरु पूर्णिमा के इस विशेष दिन पर स्कूल जाने वाले छोटे बच्चों की पाटी पूजन की रस्म पूरी की जाती है। इस दौरान बच्चों से वे तीन विशेष मंत्र लिखवाए जाते हैं, जिन्हें भगवान श्रीकृष्ण ने अपने गुरुकाल में लिखा था। इस पूरी प्रक्रिया को विद्या बुद्धि संस्कार के नाम से भी जाना जाता है। सनातन धर्म में वर्णित 16 संस्कारों में पाटी पूजन का अपना एक विशेष स्थान है। इसमें गुरु के समक्ष स्लेट या पाटी रखकर बच्चों से उसका विधिवत पूजन कराया जाता है। इस पावन पर्व पर भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा की मूर्तियों का भी पूजन-अभिषेक किया जाता है ताकि बच्चों को बेहतर संस्कारों की शिक्षा मिल सके।
भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षा और दिव्य प्रतिमा के दर्शन
सांदीपनि आश्रम के पुजारी कीर्ति व्यास ने बताया कि पौराणिक मान्यताओं और इतिहास के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी असाधारण प्रतिभा, बुद्धि और एकाग्रता के बल पर मात्र 64 दिनों के भीतर ही 14 विद्याओं और 64 कलाओं का संपूर्ण ज्ञान हासिल कर लिया था। ऐसी मान्यता है कि उन्होंने केवल चार दिनों के अल्प समय में चारों वेदों का अध्ययन कर लिया था, छह दिनों में छह शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया था, 16 दिनों में 16 कलाओं में महारत हासिल की थी और 18 दिनों के भीतर 18 पुराणों का अध्ययन पूरा कर लिया था। इसके अलावा उन्होंने उपनिषदों, छंदों, अलंकारों और अन्य महत्वपूर्ण प्राचीन शास्त्रों का भी गहन अध्ययन किया था। इस ऐतिहासिक मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं को भगवान श्रीकृष्ण की बैठी हुई एक अत्यंत दिव्य और भव्य प्रतिमा के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होता है।



















