सावन के दूसरे सोमवार के अवसर पर उज्जैन में बाबा महाकाल की भव्य और पूरी तरह से भक्ति से सराबोर सवारी निकाली गई। इस बार इस धार्मिक यात्रा की मुख्य थीम लोक नृत्य रखी गई थी, जिसमें विभिन्न कलाकारों ने अपनी पारंपरिक कला और नृत्य से मार्ग में मौजूद सभी श्रद्धालुओं का मन मोह लिया। भगवान महाकाल अपने चंद्रमोलेश्वर स्वरूप में चांदी की सुंदर पालकी पर सवार होकर शहर भ्रमण पर निकले, जबकि उनके मन महेश स्वरूप ने हाथी पर सवार होकर नगर का जायजा लिया। इस पावन अवसर पर सवारी के पूरे मार्ग पर हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। भक्तों ने अपने आराध्य के दर्शन किए, उन पर पुष्प वर्षा की और जय महाकाल तथा हर हर महादेव के गगनभेदी जयकारों से पूरे शहर के वातावरण को पूरी तरह से गुंजायमान कर दिया।
वैदिक मंत्रोच्चार और गार्ड ऑफ ऑनर के साथ हुई शुरुआत
सवारी के शहर में निकलने से ठीक पहले महाकालेश्वर मंदिर के सभा मंडप में भगवान चंद्रमोलेश्वर का विधि-विधान के साथ पूजन और अर्चन किया गया। पंडित घनश्याम पुजारी ने पूरे वैदिक मंत्रोच्चार के बीच इस धार्मिक अनुष्ठान को संपन्न कराया, जिसके बाद बाबा महाकाल को उनके चंद्रमोलेश्वर स्वरूप में चांदी की पालकी के भीतर विराजित किया गया। इसके साथ ही पिछली सवारी में निकले मन महेश स्वरूप को हाथी पर सवार किया गया। जैसे ही यह पवित्र पालकी मंदिर परिसर से बाहर आई, वहां मौजूद सशस्त्र पुलिस बल के जवानों ने गार्ड ऑफ ऑनर देकर बाबा महाकाल को आधिकारिक सलामी दी। सलामी के साथ ही जय महाकाल और हर हर महादेव के जयघोष से पूरा मंदिर परिसर और आसपास का इलाका गूंज उठा।
पारंपरिक मार्ग से होते हुए शिप्रा तट पहुंची पालकी
तय की गई पुरानी परंपरा के अनुसार महाकालेश्वर मंदिर से शुरू हुई यह सवारी महाकाल चौराहा, गुदरी, बक्षी बाजार और कहारवाड़ी जैसे प्रमुख इलाकों से गुजरते हुए रामघाट तक पहुंची। रामघाट पर पहुंचने के बाद पवित्र शिप्रा जल से भगवान महाकाल का विधि-विधान के साथ पूजन और अभिषेक संपन्न कराया गया। इस दौरान वहां गूंजते हुए वेदमंत्रों के स्वरों ने पूरे शिप्रा तट को एक बेहद आध्यात्मिक और दिव्य वातावरण में डुबो दिया। इसके बाद यह सवारी रामानुजकोट, मोढ़ की धर्मशाला, कार्तिक चौक, ढाबा रोड, प्रसिद्ध गोपाल मंदिर, पटनी बाजार और गुदरी बाजार के रास्तों से होती हुई अंत में वापस श्री महाकालेश्वर मंदिर में सुरक्षित रूप से लौट आई।
आने वाली सवारियों की खास थीम और तिथियां
महाकालेश्वर मंदिर से निकाली गई पहली सवारी वैदिक उद्बोधन की थीम पर आधारित थी, जबकि यह दूसरी सवारी पूरी तरह से लोक नृत्य की थीम पर केंद्रित रही। इस दूसरी सवारी में झाबुआ से आए लोक कलाकारों ने अपनी पारंपरिक वेशभूषा में बेहतरीन लोक नृत्य करते हुए सभी का ध्यान खींचा। इसके बाद आगामी 17 अगस्त को निकलने वाली तीसरी सवारी की मुख्य थीम पुलिस, आर्मी, होमगार्ड और स्कूल बैंड रखी गई है। इसके बाद 24 अगस्त को चौथी सवारी पर्यावरण संरक्षण की थीम पर, 31 अगस्त को पांचवीं सवारी 84 महादेव की झांकी के साथ और 7 सितंबर को निकलने वाली आखिरी शाही राजसी सवारी सिंहस्थ-2028 की विशेष झांकी के साथ निकाली जाएगी। इन सभी सवारियों के दौरान मध्य प्रदेश के अलग-अलग जिलों से आने वाले जनजातीय नृत्य दल अपनी प्रस्तुतियां देंगे।
भक्तों की उमड़ी भीड़ और धार्मिक मान्यता
महाकाल मंदिर के महेश पुजारी ने इस यात्रा के महत्व को बताते हुए कहा कि सावन का पूरा महीना भगवान महाकाल के विशेष जागरण का समय होता है। इस विशेष अवधि में वे अपनी प्रजा का हालचाल जानने के लिए नगर भ्रमण पर निकलते हैं और ऐसी गहरी मान्यता है कि केवल सवारी के दर्शन मात्र से ही इंसान के सभी रोग, भय और जीवन के संकट दूर हो जाते हैं। देश के कोने-कोने से तमाम भक्त महाकाल के दर्शन करने के लिए उज्जैन पहुंचे थे। हर कोई बाबा की केवल एक झलक पाने के लिए घंटों अपनी बारी का इंतजार करता हुआ नजर आया। मंदिर और शहर के सभी मुख्य मार्गों पर श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखी गईं, जबकि सवारी के पूरे रास्ते में जगह-जगह फूलों की वर्षा और भजन मंडलियों के कार्यक्रमों ने श्रद्धालुओं को पूरी तरह से भावविभोर कर दिया।



















