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अमेठी में स्वयं सहायता समूहों से संवरी ग्रामीण महिलाओं की जिंदगी, बन रहीं लखपति उद्यमीसक्सेस स्टोरी
20 सित॰ 2026, 10:56 am (46 दिन पहले)· 0

अमेठी में स्वयं सहायता समूहों से संवरी ग्रामीण महिलाओं की जिंदगी, बन रहीं लखपति उद्यमी

अमेठी में स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर महिलाएं अचार, चिप्स, फिनाइल और टेक्सटाइल जैसे उत्पाद तैयार कर रही हैं। बैंक लोन और सरकारी योजनाओं की मदद से वे हर महीने 40 से 50 हजार रुपये तक कमा रही हैं।

गांव और कस्बों में आजीविका के सीमित साधनों के बीच अमेठी की ग्रामीण महिलाओं ने आत्मनिर्भरता की एक मिसाल पेश की है। जो महिलाएं कभी रोजगार की तलाश में संघर्ष कर रही थीं, वे अब संगठित होकर खुद की छोटी विनिर्माण इकाइयां संचालित कर रही हैं। स्वयं सहायता समूहों के इस मजबूत नेटवर्क ने न केवल इन महिलाओं को घरेलू परिधि से बाहर निकाला है, बल्कि उन्हें अपने समुदाय में रोजगार प्रदाता के रूप में भी स्थापित किया है।

घरेलू उत्पादों से लेकर टेक्सटाइल तक फैला कारोबार

अमेठी के विभिन्न ग्रामीण इलाकों में कार्यरत स्वयं सहायता समूहों के जरिए महिलाएं बड़े पैमाने पर विविध उपभोक्ता उत्पाद तैयार कर रही हैं। इन उत्पादों में सिलाई और कढ़ाई के परिधान, पारंपरिक अचार, पापड़, चिप्स, मुरब्बा तथा मिट्टी के कलात्मक बर्तन शामिल हैं। इसके साथ ही दैनिक घरेलू स्वच्छता से जुड़ी सामग्री जैसे फिनाइल, टॉयलेट क्लीनर, झाड़ू, मोमबत्ती, अगरबत्ती, धूपबत्ती और बच्चों के खिलौने भी महिलाएं स्वयं निर्मित कर रही हैं।

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इन उत्पादों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि महिलाएं घर पर अपनी कड़ी मेहनत और लगन से इन्हें तैयार करती हैं। आमतौर पर छोटे उत्पादकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती तैयार माल को बाजार तक पहुंचाने की होती है, लेकिन यहां व्यवस्था पूरी तरह से सुव्यवस्थित है। स्वयं सहायता समूह के अधिकारियों की निगरानी में विभिन्न स्थानों पर विशेष बिक्री स्टॉल लगाए जाते हैं, जहां ग्राहक सीधे खरीदारी करते हैं। इसके अतिरिक्त कई खरीदार सीधे समूह के केंद्रों पर पहुंचकर थोक व खुदरा खरीदारी भी कर रहे हैं, जिससे बिचौलियों पर निर्भरता समाप्त हो गई है।

सुधा देवी का टेक्सटाइल उद्यम और रोजगार सृजन

इस बदलाव की जमीनी तस्वीर समूह से जुड़ी महिलाओं के अनुभवों में साफ दिखाई देती है। समूह की सदस्य सुधा देवी के अनुसार पहले उनके पास नियमित आय का कोई जरिया नहीं था और वे काम की कमी से जूझ रही थीं। इस दौरान उन्हें मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना की जानकारी मिली, जिसके लिए उन्होंने आवेदन किया। योजना के तहत सरकारी अनुदान स्वीकृत होने के बाद उन्होंने अपनी बचत से करीब दो से ढाई लाख रुपये की अतिरिक्त पूंजी लगाई और अपना टेक्सटाइल कारोबार शुरू किया।

आज सुधा देवी इस व्यवसाय से हर महीने 40,000 से 50,000 रुपये का शुद्ध मुनाफा अर्जित कर रही हैं। उन्होंने अपने कारोबार का विस्तार करते हुए स्थानीय स्तर पर पांच से छह अन्य लोगों को भी रोजगार से जोड़ा है। उनका कहना है कि स्वयं सहायता समूह और सरकारी योजना के सहयोग से उनकी आर्थिक स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है।

मोटे अनाज और आसान बैंक ऋण से बदली तस्वीर

समूह से जुड़ी एक अन्य महिला रेणु देवी बताती हैं कि पहले उनका सारा समय केवल घर-परिवार की देखभाल में बीत जाता था। परिवार में जब भी कोई आर्थिक संकट आता था तो मजबूरी में दूसरों से कर्ज लेना पड़ता था। इस मजबूरी से बाहर निकलने के लिए उन्होंने समूह के माध्यम से मोटे अनाज यानी मिलेट्स के उत्पाद तैयार करने का काम शुरू किया। पौष्टिक मोटे अनाज से बने उत्पादों की बिक्री से अब उन्हें बेहतरीन लाभ मिल रहा है। उन्होंने गांव की अन्य महिलाओं को भी अपने साथ इस काम में जोड़ लिया है, जिससे पूरा समूह मिलकर लाभ कमा रहा है।

वहीं नीलम का अनुभव बैंकिंग व्यवस्था में आए बदलाव को दर्शाता है। वे बताती हैं कि स्वयं सहायता समूह से जुड़ने से पहले समाज में उनकी कोई स्वतंत्र पहचान नहीं थी और बैंक भी बिना किसी गारंटी के लोन देने से साफ इनकार कर देते थे। आज समूह की साख के चलते उन्हें बैंकों से बिना किसी गारंटी के आसानी से वित्तीय मदद मिल जाती है। अपने खुद के काम से निरंतर आमदनी जुटाकर वे अब पूरी तरह से स्वावलंबी बन चुकी हैं।

सवाल-जवाब

अमेठी में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं कौन-कौन से उत्पाद तैयार कर रही हैं?
महिलाएं अचार, चिप्स, पापड़, मुरब्बा, सिलाई-कढ़ाई के कपड़े, मिट्टी के बर्तन और घरेलू उपयोग के लिए फिनाइल, टॉयलेट क्लीनर, झाड़ू, मोमबत्ती, अगरबत्ती तथा खिलौने तैयार कर रही हैं।
तैयार उत्पादों को बेचने के लिए महिलाएं क्या व्यवस्था अपनाती हैं?
उत्पादों की बिक्री के लिए स्वयं सहायता समूह के अधिकारियों द्वारा स्टॉल लगवाए जाते हैं, साथ ही ग्राहक सीधे समूह के केंद्रों पर आकर भी खरीदारी करते हैं।
सुधा देवी ने अपना टेक्सटाइल व्यवसाय किस योजना के तहत शुरू किया?
सुधा देवी ने मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना के तहत अनुदान प्राप्त किया और अपने पास से दो से ढाई लाख रुपये लगाकर टेक्सटाइल कारोबार शुरू किया।
सुधा देवी अपने व्यवसाय से प्रति माह कितना कमा रही हैं?
सुधा देवी अपने टेक्सटाइल व्यवसाय से हर महीने 40,000 से 50,000 रुपये का मुनाफा कमा रही हैं और पांच से छह लोगों को रोजगार दे रही हैं।
रेणु देवी किस उत्पाद के जरिए अपनी आजीविका चला रही हैं?
रेणु देवी स्वयं सहायता समूह के जरिए मोटे अनाज के उत्पाद तैयार करके उनकी बिक्री से मुनाफा कमा रही हैं।
नीलम के अनुसार स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद बैंकों के रवैये में क्या बदलाव आया?
नीलम के अनुसार पहले बैंक लोन देने से मना करते थे, लेकिन अब स्वयं सहायता समूह की साख के चलते उन्हें बिना किसी गारंटी के आसानी से बैंक ऋण मिल जाता है।
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टिप्पणियाँ 2

Priya Sharma@priya-sharma·45 दिन पहले

ग्रामीण महिलाओं का आर्थिक रूप से स्वावलंबी होना केवल आय का जरिया नहीं है, बल्कि यह हमारे सामाजिक और पारिवारिक ढांचे में आ रहे एक गहरे सांस्कृतिक बदलाव का प्रतीक है। जब महिलाएं चारदीवारी से बाहर निकलकर उद्यमिता अपनाती हैं, तो उनका आत्मविश्वास, निर्णय लेने की क्षमता और जीवनशैली का स्तर स्वतः बेहतर होता है। स्थानीय कौशल और पारंपरिक उत्पादों को व्यवस्थित बाजार से जोड़ना यह दर्शाता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में व्यक्तित्व विकास और आर्थिक स्वतंत्रता साथ-साथ आगे बढ़ रहे हैं।

Vikram Yadav@vikram-yadav·45 दिन पहले

प्रिया जी की सामाजिक सशक्तिकरण वाली बात बिल्कुल सटीक है, लेकिन शासन और सार्वजनिक नीति के नजरिए से असली चुनौती इन सूक्ष्म उद्यमों के दीर्घकालिक बाजार ठहराव की है। बिचौलियों को हटाकर सीधे बिक्री और सरकारी योजनाओं से अनुदान मिलना शुरुआती पूंजी की समस्या तो हल करता है, लेकिन इन महिला उद्यमियों की स्थिरता के लिए संस्थागत साख तक निरंतर पहुंच, ब्रांडिंग और गुणवत्ता नियंत्रण आवश्यक है। जब जमीनी उद्यमिता को आसान बैंक ऋण और मजबूत आपूर्ति श्रृंखला का समर्थन मिलता है, तब ग्रामीण अर्थव्यवस्था केवल कल्याणकारी योजनाओं पर निर्भर न रहकर एक आत्मनिर्भर और टिकाऊ मॉडल में बदलती है।

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