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आपदा चेतावनी संदेशों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का दखल, जानिए संकट के समय मशीनी भाषा पर भरोसा कितना सुरक्षितविज्ञान
29 अक्तू॰ 2026, 9:02 am (3 मिनट पहले)· 0

आपदा चेतावनी संदेशों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का दखल, जानिए संकट के समय मशीनी भाषा पर भरोसा कितना सुरक्षित

प्राकृतिक आपदाओं के दौरान आपातकालीन चेतावनी संदेश तैयार करने के लिए अधिकारी चुपचाप कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सहारा ले रहे हैं, लेकिन अधूरी जानकारियों और भरोसे के संकट ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

प्राकृतिक आपदाओं के अचानक दस्तक देने पर आम जनता को समय रहते सचेत करना किसी भी राहत एजेंसी के लिए सबसे कठिन परीक्षा मानी जाती है। जब समुद्री तूफान या विनाशकारी बाढ़ का पानी तेजी से आबादी की तरफ बढ़ रहा होता है, तब एक-एक शब्द और चेतावनी की स्पष्टता इंसानी जिंदगियों की रक्षा तय करती है। ऐसे ही एक नाजुक मोड़ पर गल्फ कोस्ट पर श्रेणी तीन के तूफान इसाइआस के टकराने के तुरंत बाद एक अजीबोगरीब मामला सामने आया। अलबामा विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर एडवांस्ड पब्लिक सेफ्टी की निदेशक लौरा मायर्स को स्थानीय मौसम विभाग के एक विशेषज्ञ का फोन आया। उस विशेषज्ञ ने बताया कि एक काउंटी के आपदा अधिकारी ने तूफान के खतरे को दर्शाने के लिए इंटरनेट पर एक मौसम मानचित्र साझा किया था, जिसमें तेज हवाओं वाले स्टिंग जेट की आशंका जताई गई थी। गहराई से पड़ताल करने पर पता चला कि वह पूरा नक्शा अधिकारी ने एक जनरेटिव एआई चैटबॉट की मदद से तैयार कराया था, जो वैज्ञानिक और मौसम विज्ञान के स्थापित नियमों के बिल्कुल विपरीत था। अधिकारी का मकसद केवल स्थानीय निवासियों को खतरे के प्रति गंभीर करना था, लेकिन कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने काल्पनिक और भ्रामक मौसमी जानकारी पेश कर दी।

तनाव के पलों में मानवीय गलतियां और कमजोर संवाद की चुनौतियां

आपदा प्रबंधन से जुड़े संस्थानों में आधिकारिक तौर पर जनरेटिव एआई के उपयोग की अनुमति आमतौर पर नहीं दी जाती है। इसके बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि स्थानीय और राज्य स्तरीय राहत कार्यालयों में कार्यरत कर्मचारी अनौपचारिक रूप से इन आधुनिक तकनीकों का खूब इस्तेमाल कर रहे हैं। वर्तमान समय में सैकड़ों तकनीकी कंपनियां आपदा विभागों को बाढ़ नुकसान के आकलन, राहत सामग्री के वितरण और सार्वजनिक संवाद में मदद देने के लिए अपने सॉफ्टवेयर बेच रही हैं। इन सभी क्षेत्रों में सबसे ज्यादा दिलचस्पी जन चेतावनियां लिखने वाले टूल्स में देखी जा रही है। इसका मुख्य कारण यह है कि कई आपदा अधिकारी आपातकालीन परिस्थितियों में तुरंत सरल और प्रभावशाली संदेश तैयार करने में माहिर नहीं होते। यह उनकी कार्यक्षमता की कमी नहीं, बल्कि इंसान होने का स्वाभाविक स्वभाव है। अक्सर तनाव के दौरान वे ऐसी कठिन तकनीकी शब्दावली लिख देते हैं जिसे साधारण नागरिक समझ नहीं पाते, या फिर वे यह मान बैठते हैं कि खतरे की गंभीरता लोगों को पहले से ही पता होगी। इसके अलावा, कई बार संदेशों में ऐसी गैर-जरूरी बातें जुड़ जाती हैं जो मुख्य खतरे से ध्यान भटका देती हैं।

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अल्बानी विश्वविद्यालय में आपदा शोधकर्ता जीनेत सटन का मानना है कि कई सरकारी महकमे कर्मचारियों और बजट की भारी तंगी से जूझ रहे हैं। उनके अनुसार बहुत सी एजेंसियां सीमित संसाधनों में बस यह कोशिश करती हैं कि कोई गंभीर गलती किए बिना काम पूरा हो जाए। राज्य और स्थानीय स्तर पर तैनात यही आपदा प्रबंधक किसी भी मौसमी तबाही के बाद सुरक्षा की पहली दीवार होते हैं, न कि संघीय आपातकालीन प्रबंधन एजेंसी। आपदा अधिकारियों का मानना है कि जनता का विश्वास ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है, और यह भरोसा केवल प्रभावी संचार के जरिए ही बनाया या गंवाया जाता है।

इतिहास की वे गलतियां जब चेतावनियों ने बढ़ाया खतरा

जलवायु परिवर्तन के दौर में बार-बार आ रही प्राकृतिक विभीषिकाओं के बीच गलत मानवीय संवाद के कारण पैदा हुई अफरातफरी के कई उदाहरण मौजूद हैं। वर्ष 2016 में कैलिफोर्निया के जंगलों में लगी भीषण आग के समय आसपास की दो अलग-अलग काउंटियों ने विरोधाभासी निर्देश जारी कर दिए थे। एक जिले ने ऐच्छिक निकासी का आदेश दिया, जबकि ठीक बगल वाले जिले ने उसी आग के लिए अनिवार्य रूप से इलाका खाली करने को कह दिया। इसी तरह वर्ष 2019 में ऑस्ट्रेलिया में दावानल की भयावह लपटों के बीच प्रशासन ने निगरानी और कार्रवाई का संदेश जारी किया, जिसे लेकर बाद में सरकार ने माना कि अस्पष्ट भाषा के कारण लोगों में भारी असमंजस फैल गया था।

संदेशों की यह अस्पष्टता कई बार जानलेवा साबित होती है। वर्ष 2017 में कैलिफोर्निया के मोंटेसिटो में थॉमस फायर के कुछ सप्ताह बाद जब मूसलाधार बारिश हुई, तो जानलेवा कीचड़ का सैलाब उमड़ पड़ा। सांता बारबरा काउंटी का प्रशासन उन निवासियों तक खतरे की वास्तविक भयावहता पहुंचाने में विफल रहा जो पहले से ही आग की त्रासदी झेलकर मानसिक थकान से जूझ रहे थे। प्रशासन ने ऐच्छिक निकासी वाले क्षेत्रों में केवल सतर्क रहने और तुरंत हटने के लिए तैयार रहने का परामर्श भेजा। परिणाम यह हुआ कि अधिकांश लोगों ने इसे सामान्य सूचना समझा और एक ही महीने में दूसरी बार अपना घर छोड़ने से परहेज किया। इस मलबे और बाढ़ की चपेट में आने से 23 लोगों की जान चली गई और 160 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। जब सरकारें कमजोर चेतावनियां देती हैं, तो वे लोगों को सुरक्षित रखने का अपना नैतिक अधिकार खो बैठती हैं।

मशीनी भाषा का उभरता दखल और तेज सुधार की क्षमता

सैद्धांतिक नजरिए से देखा जाए तो आपातकालीन संदेशों का मसौदा तैयार करने के लिए लार्ज लैंग्वेज मॉडल बेहद अनुकूल साबित हो सकते हैं। संघीय आपातकालीन प्रबंधन एजेंसी हालांकि अधिकारियों को आपदा संचार की बेहतर शैलियों का नियमित प्रशिक्षण देती है, लेकिन वास्तविक संकट के समय अक्सर लोग पुराना सीखा हुआ सब भूल जाते हैं। इसके उलट एक कंप्यूटर मॉडल पलक झपकते ही लाखों पुराने आपातकालीन अलर्ट्स और शोध अध्ययनों का विश्लेषण कर मानवीय गलतियों को कुछ ही सेकंड में ठीक कर सकता है। मिशिगन की इंगम काउंटी में आपातकालीन विभाग के प्रमुख और पूर्व मौसम विज्ञानी रॉब डेल इस बात से सहमत हैं। उनका कहना है कि जब हवा में जहरीला रसायन फैल रहा हो और फोन लगातार बज रहे हों, तब पुराना प्रशिक्षण याद रखने की तुलना में एआई चैटबॉट कहीं अधिक सटीक और तेज गति से पहला मसौदा तैयार कर सकता है।

डेल ने अपने कार्यालय में अभ्यास के तौर पर कुछ आपात संदेश बनाने के लिए इस तकनीक का परीक्षण किया है, हालांकि उन्होंने कभी किसी वास्तविक संकट में इसे सीधे बाहर नहीं भेजा। उनका इलाका तूफान या जंगल की आग जैसी बड़ी आपदाओं से सुरक्षित रहता है, लेकिन उनका मानना है कि भविष्य में अगर कोई गंभीर घटना घटी, तो वे संदेश का शुरुआती खाका चैटबॉट से लिखवाने में हिचकेंगे नहीं, बशर्ते अंतिम संदेश भेजने का पूरा नियंत्रण उन्हीं के हाथ में रहे। तकनीकी क्षेत्र के कई जानकारों का दावा है कि सॉफ्टवेयर अब इतना सक्षम हो चुका है कि उसे सीधे इस्तेमाल में लाया जा सकता है। आपात प्रबंधन सॉफ्टवेयर बनाने वाले ईएम1 नामक एक स्टार्टअप ने सटन के अनुसंधानों का उपयोग करके एक ऐसा मॉडल तैयार किया है, जिसे लेकर अधिकारियों का दावा है कि यह इंसानी प्रबंधकों की तुलना में बेहतर परिणाम देता है। सुनामी और वनाग्नि जैसे कई परिदृश्यों पर किए गए आंतरिक परीक्षणों में यह मॉडल स्थापित मानकों पर खरा उतरा है।

न्यू मैक्सिको की बाढ़ और तकनीक का व्यावहारिक परीक्षण

इस आधुनिक प्रणाली की उपयोगिता को समझाने के लिए न्यू मैक्सिको की सैन जुआन नदी में आई बाढ़ का एक उदाहरण सामने रखा गया। वहां के एक स्थानीय प्रशासन ने जनता को सतर्क करने के लिए बेहद संक्षिप्त और अधूरा संदेश भेजा था। उस पुराने संदेश में तटबंध टूटने, पानी बढ़ने, तुरंत निकलने और लोगों व जानवरों के लिए मैक्गी पार्क खुले होने की बात बहुत ही बेतरतीब ढंग से लिखी गई थी। जब इस संदेश को ईएम1 के कृत्रिम मॉडल के सामने सुधार के लिए रखा गया, तो उसने कुछ ही पलों में उसे एक संपूर्ण आपातकालीन बुलेटिन में बदल दिया। नए प्रारूप में साफ लिखा गया कि सैन जुआन काउंटी में बाढ़ का पानी बढ़ रहा है, संबंधित इलाके के लोग तुरंत ऊंचे स्थानों की ओर प्रस्थान करें, पानी से होकर वाहन न चलाएं और पैदल चलने से बचें। साथ ही मैक्गी पार्क के खुले होने की सूचना और आधिकारिक अपडेट देखने के स्रोत का स्पष्ट उल्लेख भी जोड़ दिया गया। पुराने इंसानी संदेश में यह तक दर्ज नहीं था कि अलर्ट कौन जारी कर रहा है, सुरक्षित कैसे निकला जाए, और उसमें तटबंध टूटने के अंग्रेजी शब्द की वर्तनी भी अशुद्ध थी।

वर्तमान में ईएम1 के पास लगभग एक सौ सरकारी महकमों और स्कूली जिलों के अनुबंध हैं। हालांकि इनमें से कोई भी एजेंसी अभी तक वास्तविक मौसमी आपदाओं के दौरान संदेश भेजने का काम पूरी तरह से स्वचालित मशीनों को नहीं सौंप रही है। फिलहाल इसका दायरा आंतरिक योजनाओं और आपात तैयारियों के अभ्यास तक सीमित है। इसके बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि पर्दे के पीछे बहुत से अधिकारी चैटजीपीटी या जेमिनी जैसे मुफ्त और निजी खातों से संदेश तैयार कर रहे हैं। फ्लोरिडा के पियर्स कॉलेज में आपातकालीन प्रबंधन की प्रोफेसर और राष्ट्रीय आपदा प्रशिक्षण केंद्र की अनुभवी प्रशिक्षक सारा मिलर पुष्टि करती हैं कि औपचारिक नियमों की कमी के बावजूद निजी स्तर पर इसका उपयोग व्यापक पैमाने पर हो रहा है।

प्रामाणिकता का सवाल, जन असंतोष और आगे की राह

सतही तौर पर यह व्यवस्था बहुत मुफीद लग सकती है कि इंसानों की तुलना में मशीनें तेज गति से बेहतर संदेश लिख सकती हैं। लेकिन चैटबॉट तकनीक के विशेषज्ञ भी चेतावनी देते हैं कि यह बदलाव जनता के भरोसे को चोट पहुंचा सकता है। समाज का एक बड़ा वर्ग पहले से ही सरकारी घोषणाओं को लेकर आशंकित रहता है और एआई से तैयार की गई तस्वीरों या सूचनाओं पर उसका अविश्वास और गहरा हो सकता है। न्यूयॉर्क के सिरैक्यूज में इसका प्रत्यक्ष असर तब देखने को मिला जब गैर-आपातकालीन 911 कॉल का जवाब देने के लिए स्वचालित तकनीक लगाने पर सरकारी कर्मचारी संघ ने प्रशासन के खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया था।

हैजअडैप्ट संस्था की संस्थापक गिन्नी काट्ज़ इस बात पर जोर देती हैं कि नागरिक केवल उसी जानकारी पर विश्वास करते हैं जिसमें इंसानी संवेदना और प्रामाणिकता झलके, जबकि कंप्यूटर जनित सामग्री में यह अपनापन गायब रहता है। इसके अलावा एक बड़ा खतरा यह भी है कि तेज गति से संदेश बनाने की सुविधा मिलने के बाद अधिकारी बहुत ज्यादा चेतावनियां भेजने लगेंगे, जिससे लोग बार-बार आने वाले अलर्ट्स से ऊब जाएंगे और वास्तविक खतरे की अनदेखी करने लगेंगे। विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि यह सॉफ्टवेयर केवल उतना ही कुशल है जितना कि इसका इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति। एक अनुभवी प्रबंधक चैटबॉट के सुझावों को परखकर बेहतर संदेश भेज सकता है, लेकिन किसी नौसिखिए के हाथ में यह तकनीक अधकचरी और खतरनाक जानकारी प्रसारित करने का जरिया बन सकती है। प्रैपर कंपनी के संस्थापक जस्टिन स्नेयर कहते हैं कि किसी व्यक्ति को कंप्यूटर द्वारा भेजे गए संदेश पर ज्यादा भरोसा होगा या इंसान के लिखे संदेश पर, यह पूरी तरह उस नागरिक की अपनी सोच पर निर्भर करता है। जब तक इस तकनीक में इंसानी निगरानी बनी रहेगी, तभी तक सुरक्षा और भरोसे का संतुलन सुरक्षित रह सकता है।

सवाल-जवाब

अलबामा में चक्रवाती तूफान के दौरान क्या गलत जानकारी जारी की गई थी?
एक स्थानीय आपदा प्रबंधक ने एआई चैटबॉट की मदद से तूफान इसाइआस का एक मौसम नक्शा बनाया था, जिसमें स्टिंग जेट का गलत और वैज्ञानिक रूप से अशुद्ध खतरा दिखाया गया था।
न्यू मैक्सिको की सैन जुआन नदी की चेतावनी में चैटबॉट ने क्या सुधार किया?
मॉडल ने पुराने अस्पष्ट संदेश की वर्तनी सुधारी, जारीकर्ता का नाम जोड़ा और लोगों को पानी में गाड़ी न चलाने तथा सुरक्षित स्थान पर जाने की स्पष्ट सलाह दी।
वर्ष 2017 में मोंटेसिटो में अस्पष्ट चेतावनी से क्या नुकसान हुआ था?
ऐच्छिक निकासी की अस्पष्ट भाषा के कारण लोगों ने समय पर घर नहीं छोड़ा, जिसके चलते भूस्खलन में 23 लोगों की मृत्यु हो गई और 160 से अधिक घायल हुए।
क्या सरकारी एजेंसियां पूरी तरह से स्वचालित एआई चेतावनियां भेज रही हैं?
नहीं, वर्तमान में कोई भी एजेंसी वास्तविक आपदा में पूरी तरह स्वचालित संदेश नहीं भेज रही है, बल्कि इनका उपयोग केवल आंतरिक अभ्यास और मसौदे तक सीमित है।
विशेषज्ञों के अनुसार आपदा संदेशों में एआई का सबसे बड़ा जोखिम क्या है?
विशेषज्ञों का मानना है कि कंप्यूटर जनित संदेशों में मानवीय संवेदना की कमी होती है, जिससे जनता का भरोसा टूट सकता है और बार-बार आने वाले संदेशों से चेतावनी की थकान बढ़ सकती है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

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