जलवायु की बिगड़ती स्थिति पर केंद्रित एक नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि वैश्विक पर्यावरण की हालत लगातार गंभीर होती जा रही है। बायोसाइंस में बुधवार को प्रकाशित शोध पत्र के अनुसार, पृथ्वी के स्वास्थ्य को मापने के लिए इस्तेमाल होने वाले 16 प्रमुख वैश्विक संकेतों में से सात अब तक के सबसे खराब और चरम स्तर पर पहुंच चुके हैं। शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि जीवाश्म ईंधन के अनियंत्रित इस्तेमाल के कारण वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर औद्योगिक क्रांति से पहले के मुकाबले 50 प्रतिशत तक बढ़ चुका है। इसके सीधे दुष्प्रभाव के रूप में ग्रीनलैंड और अंटार्कटिक की बर्फ की चादरें रिकॉर्ड न्यूनतम स्तर तक सिमट गई हैं, जबकि महासागरों का तापमान अपने अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है।
ग्लोबल वार्मिंग की बढ़ती रफ्तार और अल नीनो का प्रभाव
विश्लेषण के अनुसार जलवायु परिवर्तन ने तापमान बढ़ने की गति को काफी तेज कर दिया है। जहां 1880 से 1970 के बीच वैश्विक तापमान लगभग 0.05 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की दर से बढ़ रहा था, वहीं 2010 के बाद से यह रफ्तार बढ़कर 0.36 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक दर्ज की गई है। यद्यपि भूमि सहित वैश्विक औसत तापमान अभी अपने सबसे उच्चतम बिंदु पर नहीं पहुंचा है, लेकिन साल के अंत तक अल नीनो के मजबूत होने से यह स्थिति बदल सकती है। अल नीनो एक प्राकृतिक मौसमी चक्र है जिसमें प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है और यह वायुमंडल में अतिरिक्त ऊर्जा छोड़कर वैश्विक स्तर पर गर्मी को कई गुना बढ़ा देता है। मौजूदा अल नीनो एक नए रिकॉर्ड की ओर बढ़ रहा है।
ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता और इस शोध पत्र के प्रमुख लेखक बिल रिपल ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनके अनुसार यदि पृथ्वी को किसी वार्षिक स्वास्थ्य जांच के लिए आए मरीज की तरह देखा जाए, तो उसकी हालत अत्यंत गंभीर है और दिन-प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है। बिल रिपल ने कहा, "एक मजबूत अल नीनो वैश्विक तापमान को अस्थायी रूप से और भी ऊपर धकेल सकता है, जिससे संवेदनशील क्षेत्रों में भीषण गर्मी और सूखा पड़ सकता है।" उन्होंने आगे रेखांकित किया कि अल नीनो भले ही एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन यह अब पहले से कहीं अधिक गर्म ग्रह पर घटित हो रही है, जिससे इसके प्रभाव बेहद खतरनाक साबित हो रहे हैं।
प्रवाल भित्तियों और वर्षावनों पर गहराता खतरा
इस संकट का सबसे प्रत्यक्ष और गंभीर प्रभाव समुद्री और स्थलीय पारिस्थितिक तंत्रों पर पड़ रहा है। महासागरों में तेजी से फैल रही गर्मी के कारण बड़े पैमाने पर कोरल ब्लीचिंग यानी प्रवाल भित्तियों के नष्ट होने की आशंका बनी हुई है। लगातार होने वाली ब्लीचिंग के कारण प्रवाल चट्टानों की उबरने की प्राकृतिक क्षमता समाप्त होती जा रही है। कोरल रीफ्स जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक संकटग्रस्त पारिस्थितिक तंत्रों में से हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक की बढ़ोतरी होती है, तो दुनिया की अधिकांश प्रवाल भित्तियों का अस्तित्व समाप्त हो सकता है।
अल नीनो के प्रभाव से उष्णकटिबंधीय वर्षावन भी भारी दबाव का सामना कर रहे हैं। विशेष रूप से अमेज़न के जंगलों में इस मौसमी पैटर्न के दौरान गंभीर सूखा देखने को मिलता है। इस क्षेत्र को अक्सर दुनिया के फेफड़े कहा जाता है, लेकिन यह इलाका पहले से ही लकड़ी काटने और खनन गतिविधियों के दबाव से जूझ रहा है। इसके साथ ही ब्राजील में एक ऐसी दक्षिणपंथी सरकार की संभावित वापसी की चर्चा है जो पर्यावरण संरक्षण की तुलना में भूमि सफाई और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को अधिक प्राथमिकता देती है।
अमेज़न का टिपिंग पॉइंट और ऊर्जा का विरोधाभास
रिपोर्ट में इस बात को लेकर भी आगाह किया गया है कि अमेज़न वर्षावन अपने टिपिंग पॉइंट यानी ऐसे मोड़ की ओर बढ़ रहा है, जहां से यह घने वर्षावन के बजाय सवाना जैसी सूखी घास वाली भूमि में तब्दील हो सकता है। हालांकि इस दहलीज को तुरंत या इसी वर्ष पार करने की संभावना बहुत कम है, लेकिन अल नीनो का यह दौर जंगल को इस खतरनाक सीमा के और करीब पहुंचा रहा है। बिल रिपल ने आगाह करते हुए कहा, "गर्मी, सूखा और पेड़ों की कटाई अमेज़न को व्यापक वन क्षरण की ओर धकेल सकती है।" उन्होंने चिंता जताई कि ये सभी कारक आपस में मिलकर स्थिति को इतना जटिल बना सकते हैं कि इन्हें रोक पाना नामुमकिन हो जाएगा।
रिपोर्ट में जलवायु के मोर्चे पर चिंताजनक आंकड़ों के साथ-साथ एक सकारात्मक पहलू का भी उल्लेख किया गया है कि बिजली ग्रिड में कार्बन-मुक्त ऊर्जा की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। अध्ययन में इसे इस बात का संकेत माना गया है कि दुनिया अब बिजली के युग में प्रवेश कर रही है। हालांकि, इस प्रगति के बावजूद वार्षिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन अब भी अपने उच्चतम स्तर पर बना हुआ है। बिल रिपल ने कहा, "नवीकरणीय ऊर्जा का बढ़ना उत्साहजनक संकेत है, लेकिन यह समग्र गिरावट को पूरी तरह उलटने के लिए अभी पर्याप्त नहीं है।" उन्होंने स्पष्ट किया कि जलवायु आपातकाल कोई ऐसी आपदा नहीं है जो भविष्य में आएगी, बल्कि मानवता पहले से ही इसके बीच जी रही है।



















