मानव मस्तिष्क की गतिविधियों को सीधे डिजिटल संकेतों में बदलकर मशीनों को नियंत्रित करने की होड़ अब एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। लकवे या गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों की आवाज और शारीरिक गतिविधियों को वापस दिलाने के लिए एलोन मस्क की न्यूरालिंक समेत सिंक्रोन, पैराड्रोमिक्स और प्रिसिजन न्यूरोसाइंस जैसी कई कंपनियां ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस तैयार करने में जुटी हैं। इन सभी मौजूदा प्रणालियों के साथ एक बड़ी शर्त यह जुड़ी है कि मरीज को मस्तिष्क की सर्जरी से गुजरना पड़ता है। इसी शल्य चिकित्सा की मजबूरी को खत्म करने के इरादे से ब्रिज के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) विल बीडरमैन ने अपना अलग रास्ता चुना है। बीडरमैन का कहना है कि यह बुनियादी तौर पर सोच और नजरिए का अंतर है।
दिलचस्प तथ्य यह है कि बीडरमैन ने अपने पीएचडी शोध के दौरान उस सेमीकंडक्टर चिप को डिजाइन किया था जिसे न्यूरालिंक ने अपने शुरुआती उपकरणों में इस्तेमाल करने के लिए लाइसेंस पर लिया था। हालांकि, ब्रिज के साथ उनका मुख्य लक्ष्य एक ऐसा पहनने योग्य गैजेट विकसित करना है जिसे मस्तिष्क में चिप प्रत्यारोपित कराने की तुलना में कहीं अधिक लोग आसानी से अपना सकें। दुनिया भर में अब तक केवल लगभग 100 लोगों के सिर में नैदानिक परीक्षणों के तहत ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस प्रत्यारोपित किए गए हैं, जिनमें न्यूरालिंक का उपकरण पाने वाले कम से कम 21 वॉलंटियर भी शामिल हैं।
न्यूरोसर्जरी के जोखिम और प्रत्यारोपण की सीमाएं
मस्तिष्क की किसी भी सर्जरी में संक्रमण, ऊतकों को नुकसान और जटिलताओं की संभावना बनी रहती है। बीडरमैन के अनुसार, न्यूरोसर्जरी से जुड़े खतरों को नजरअंदाज या कम करके नहीं आंका जा सकता, इसलिए इन प्रत्यारोपित उपकरणों से मिलने वाले लाभ और सुरक्षा का पैमाना बहुत ऊंचा होना चाहिए। उन्होंने सीधी बात रखते हुए कहा कि कोई भी व्यक्ति अपनी खोपड़ी में छेद नहीं करवाना चाहता। यही कारण है कि सर्जरी पर निर्भर तकनीक केवल अत्यंत गंभीर मरीजों तक ही सीमित रह जाती है और आम स्वास्थ्य या उपभोक्ता बाजार तक नहीं पहुंच पाती।
दूसरी तरफ, सिर के बाहर पहने जाने वाले मौजूदा गैर-आक्रामक इंटरफेस लंबे समय से कमजोर सिग्नल की समस्या से जूझ रहे हैं। इंसानी खोपड़ी की हड्डी और त्वचा मस्तिष्क से निकलने वाले विद्युत संकेतों को बाहरी सेंसर तक पहुंचने से पहले काफी हद तक दबा देते हैं, जिससे उपकरणों की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। यही वजह है कि न्यूरालिंक जैसी अधिकतर कंपनियां मस्तिष्क के न्यूरॉन्स से सीधे विद्युत स्पंदनों को रिकॉर्ड करने के लिए इलेक्ट्रोड प्रत्यारोपित करती हैं। इन इलेक्ट्रिकल प्रणालियों ने यह साबित कर दिखाया है कि लकवाग्रस्त मरीज केवल अपनी सोच के दम पर कंप्यूटर स्क्रीन चला सकते हैं, रोबोटिक हाथ हिला सकते हैं और वास्तविक समय में बातचीत कर सकते हैं।
अल्ट्रासाउंड और रक्त प्रवाह से दिमाग को समझना
मौजूदा प्रत्यारोपणों और कमजोर बाहरी सेंसरों के बीच ब्रिज न्यूरोटेक अल्ट्रासाउंड तकनीक को एक मजबूत विकल्प मानती है। यह तकनीक उच्च आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों का उपयोग करती है, जो गतिशील लाल रक्त कोशिकाओं से टकराकर वापस लौटती हैं। इससे मस्तिष्क के भीतर रक्त के बहने की गति और दिशा की सटीक जानकारी मिलती है। न्यूरोलॉजी के अनुसार, मस्तिष्क में जब भी कोई न्यूरॉन सक्रिय होता है, तो उस हिस्से में रक्त प्रवाह में तुरंत बदलाव आता है। इस तरह रक्त संचार में होने वाले उतार-चढ़ाव तंत्रिका गतिविधियों से सीधे जुड़े होते हैं।
ब्रिज न्यूरोटेक और सैम ऑल्टमैन से जुड़े मर्ज लैब्स दोनों की जड़ें आर्बर न्यूरोसाइंस से जुड़ी हैं, जिसे पहले फॉरेस्ट न्यूरोटेक के नाम से जाना जाता था। फॉरेस्ट न्यूरोटेक एक गैर-लाभकारी संगठन था, जिसे 2023 में बीडरमैन ने अपने साथी शोधकर्ताओं समनर नॉर्मन और टायसन अफलालो के साथ मिलकर शुरू किया था। इसका मकसद ऐसे एकीकृत और दीर्घकालिक शोध को आगे बढ़ाना था जो किसी एक अकादमिक प्रयोगशाला के लिए बहुत जटिल हो और किसी व्यावसायिक कंपनी के लिए बहुत शुरुआती चरण में हो। इस संस्था ने मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को स्कैन करने वाला एक अल्ट्रासाउंड उपकरण तैयार किया था, जिसका परीक्षण ब्रिटेन (UK) में चल रहा है।
जनवरी में फॉरेस्ट न्यूरोटेक से अलग होकर मर्ज लैब्स एक स्वतंत्र कंपनी के रूप में उभरी। इसके सह-संस्थापकों में नॉर्मन और अफलालो के साथ सैम ऑल्टमैन, शोधकर्ता मिखाइल शापिरो तथा तकनीकी उद्यमी एलेक्स ब्लानिया और सैंड्रो हर्बिग शामिल हैं। इस तरह न्यूरोटेक के इस नए उभरते उप-क्षेत्र में शीर्ष वैज्ञानिकों और निवेशकों का जमावड़ा लग रहा है।
समय का विलंब और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का समाधान
हालांकि, अल्ट्रासाउंड आधारित तकनीक के सामने अपनी चुनौतियां भी हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न कैलिफोर्निया की न्यूरोइंजीनियर मरियम शनेची बताती हैं कि चूंकि अल्ट्रासाउंड न्यूरॉन्स से सीधे संकेत लेने के बजाय रक्त के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से मस्तिष्क गतिविधि मापता है, इसलिए न्यूरॉन के सक्रिय होने और रक्त प्रवाह में बदलाव आने के बीच स्वाभाविक रूप से कुछ सेकंड का समय अंतराल होता है। शनेची के अनुसार, यह तकनीक तंत्रिका गतिविधि में धीमे बदलावों को पकड़ती है। कई कार्यों के लिए यह पूरी तरह ठीक है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस तरह की प्रणाली विकसित करना चाहते हैं।
यदि किसी व्यक्ति को पलक झपकते ही रोबोटिक हाथ को तेजी से हिलाना हो या कंप्यूटर पर तेज गति से टाइप करना हो, तो कुछ सेकंड की यह देरी एक बड़ी बाधा बन सकती है। इस समस्या से पार पाने के लिए ब्रिज आधुनिक प्रेडिक्टिव AI मॉडल्स का उपयोग करने की योजना बना रही है, ताकि इस विलंब को घटाया जा सके और इंटरफेस की गति बढ़ाई जा सके। बीडरमैन ने स्पष्ट किया है कि कंपनी चिकित्सा के साथ-साथ उपभोक्ता उपयोग दोनों में रुचि रखती है, हालांकि उन्होंने अभी अपनी पूरी वाणिज्यिक योजनाओं का खुलासा नहीं किया है।
हेडफोन जैसा उपकरण और कैलिफोर्निया में परीक्षण
ब्रिज ने कैलिफोर्निया के रेडवुड सिटी में स्वयंसेवकों पर अपना पहला नैदानिक अध्ययन शुरू कर दिया है। यह पूरी तरह से एक अवलोकन आधारित अध्ययन है, जिसमें किसी प्रकार का उपचार या निदान शामिल नहीं है। इसमें स्वस्थ वयस्कों के साथ-साथ खोपड़ी की सर्जरी करवा चुके व्यक्तियों के सिर पर एक छोटा अल्ट्रासाउंड प्रोब लगाया जा रहा है। ब्रिज के इन प्रोब्स में पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड निर्माता कंपनी बटरफ्लाई नेटवर्क द्वारा निर्मित सेमीकंडक्टर सिलिकॉन चिप्स का इस्तेमाल किया गया है। जब प्रतिभागी सुनते हैं, देखते हैं, चलते-फिरते हैं या बोलते हैं, तब यह प्रोब उनके मस्तिष्क के संकेतों को दर्ज करता है।
कंपनी ने अभी तक अपने प्रोटोटाइप की तस्वीरें सार्वजनिक नहीं की हैं, लेकिन बीडरमैन इसे कानों के ठीक ऊपर टिकने वाले हेडफोन जैसा बताते हैं। यह उपकरण टेम्पोरल विंडो पर बैठेगा, जो कान के थोड़ा ऊपर स्थित खोपड़ी का सबसे पतला हिस्सा होता है। बीडरमैन के अनुसार, सबसे पतला भाग होने के कारण इसके आर-पार इमेजिंग करना सबसे आसान होता है। अल्ट्रासाउंड के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि खोपड़ी की मोटी हड्डी ध्वनि तरंगों को सोख लेती है और उन्हें बिखेर देती है, जिससे गैर-आक्रामक इमेजिंग करना तकनीकी रूप से बहुत कठिन हो जाता है।
वर्ष 2024 के एक अध्ययन में कैलटेक और यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न कैलिफोर्निया के शोधकर्ताओं ने साबित किया था कि अल्ट्रासाउंड आधारित ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस मानवीय दिमाग के विचारों को पढ़कर डिकोड कर सकता है। लेकिन उस अध्ययन में खोपड़ी के एक हिस्से को हटाकर वहां पारदर्शी खिड़की बनानी पड़ी थी ताकि अल्ट्रासाउंड तरंगें गुजर सकें। ब्रिज के सामने सबसे बड़ी वैज्ञानिक चुनौती इसी सर्जरी को खत्म करके बिना चीर-फाड़ के साफ संकेत प्राप्त करने की है। बीडरमैन का कहना है कि उनका पूरा ध्यान गैर-आक्रामक इंटरफेस पर है और उन्हें विश्वास है कि लोगों की वास्तविक मदद करने का सबसे बड़ा अवसर यहीं मौजूद है।



















