समुद्र में उठने वाले भीषण चक्रवाती तूफान तटीय बस्तियों में केवल मकानों, बिजली के खंभों और फसलों को ही तबाह नहीं करते, बल्कि इनका घातक असर जमीन के भीतर गहराई में छिपे मीठे पानी के भंडारों पर भी पड़ता है. जब भी कोई शक्तिशाली चक्रवात तट से टकराता है, तो वायुमंडलीय दबाव और समुद्री लहरों में होने वाला जबर्दस्त बदलाव जमीन के भीतर 100 मीटर से अधिक गहराई में मौजूद प्राकृतिक जल स्रोतों यानी एक्वीफर्स के संतुलन को हिलाकर रख देता है. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर (आईआईटी खड़गपुर) के नेतृत्व में हुए एक वैज्ञानिक शोध में सामने आया है कि इस उथल-पुथल की वजह से गहरे भूजल में खारा समुद्री पानी रिसने लगता है, जिससे तटीय इलाकों में लाखों लोगों के लिए शुद्ध पेयजल का गंभीर संकट खड़ा हो सकता है.
सुंदरबन डेल्टा में भूजल पर चरम मौसम के प्रभावों की पड़ताल
यह अध्ययन प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित हुआ है, जिसका शीर्षक 'ग्राउंडवाटर वल्नरेबिलिटी टू अम्फान एंड अदर रिसेंट साइक्लोन्स इन ए ट्रॉपिकल मेगा-डेल्टा' रखा गया है. वैज्ञानिकों ने गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना (जीबीएम) डेल्टा के बेहद संवेदनशील हिस्से सुंदरबन में यह विस्तृत जांच की. सुंदरबन को पूरी दुनिया के सबसे नाजुक जलवायु क्षेत्रों में गिना जाता है. शोध टीम में आईआईटी खड़गपुर के प्रोफेसर अभिजीत मुखर्जी और आदित्य बंदोपाध्याय, एसआरएम विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक कौशिक दास तथा आईआईटी खड़गपुर की शोधार्थी प्रकृति मजूमदार शामिल रहे. इस टीम ने यह समझने का प्रयास किया कि जब वायुमंडलीय दबाव में अचानक अप्रत्याशित गिरावट आती है और समुद्री उफान सतह पर टकराता है, तो जमीन के भीतर भूजल का दबाव और प्रवाह किस तरह बदलता है.
तीन वर्षों में आए 11 मौसमी तंत्रों और चार बड़े तूफानों का डेटा विश्लेषण
शोधकर्ताओं ने मई 2017 से मई 2020 के बीच बने 11 गंभीर मौसमी घटनाक्रमों का बहुत बारीकी से विश्लेषण किया. इस समयावधि में 7 वायुमंडलीय दबाव प्रणालियां सक्रिय हुई थीं और 4 विनाशकारी चक्रवात तितली, फानी, बुलबुल और अम्फान इस क्षेत्र से गुजरे थे. दल ने अलग-अलग गहराइयों पर स्थित जलस्रोतों के आंकड़ों, हाइड्रोजियोकेमिकल टेस्ट और न्यूमेरिकल मॉडलिंग तकनीकों का सहारा लेकर तूफानों के आने से पहले, तूफान के दौरान और उसके गुजर जाने के बाद भूजल प्रणालियों की स्थिति की तुलना की. मॉडलिंग के इन आंकड़ों ने साफ कर दिया कि तेज हवाएं और समुद्री तूफानी लहरें सतह के नीचे मौजूद हाइड्रोलिक ग्रेडिएंट को तेजी से विचलित कर देती हैं.
उथले और गहरे एक्वीफर्स पर अलग-अलग प्रभाव
वैज्ञानिकों के निष्कर्ष दर्शाते हैं कि चक्रवात के गुजरते वक्त विभिन्न गहराइयों पर भूजल का बहाव और उसके प्रवाह की दिशा अचानक पलट जाती है. सामान्य परिस्थितियों में तटीय इलाकों में मीठे पानी का दबाव समुद्री खारे पानी को अंदर आने से रोके रखता है. लेकिन चक्रवात के दौरान जब दबाव असंतुलित होता है, तो समुद्री पानी और मीठे भूजल का आपस में मिश्रण होने लगता है. हैरान करने वाली बात यह रही कि जमीन से 100 मीटर से ज्यादा गहरे एक्वीफर भी इस मिलावट से सुरक्षित नहीं बचे. जमीन की ऊपरी सतह के पास मौजूद उथले एक्वीफर्स में बदलाव तुरंत दिखे और तीव्र रहे, जबकि 100 मीटर से गहरे एक्वीफर्स में यह बदलाव बहुत धीमी गति से लेकिन लंबे समय तक टिके रहने वाले साबित हुए.
तटीय इलाकों में जल सुरक्षा की दोहरी चुनौती और समाधान
गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना का विशाल डेल्टा क्षेत्र पहले से ही इंसानी गतिविधियों, भूजल के अत्यधिक दोहन, आर्सेनिक प्रदूषण, बढ़ती लवणता और समुद्र के बढ़ते जलस्तर की मार झेल रहा है. ऐसे में बार-बार आने वाले चक्रवात इन जोखिमों को कई गुना बढ़ा देते हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि पूरे तटीय भूजल तंत्र को एक जैसा मानकर नीति बनाना सही नहीं है, बल्कि हर गहराई वाले एक्वीफर की विशेषताओं के आधार पर प्रबंधन होना चाहिए. इसके लिए शोधकर्ताओं ने तीन प्रमुख सिफारिशें की हैं: अलग-अलग गहराइयों पर भूजल की निरंतर रियल-टाइम निगरानी हो, मौसम विभाग के चक्रवात पूर्वानुमानों को जल-संसाधन योजनाओं से सीधे जोड़ा जाए, और पेयजल के सरकारी व निजी कुओं को समुद्री घुसपैठ के जोखिम वाले क्षेत्रों से दूर सुरक्षित स्थानों पर स्थापित किया जाए. यह चेतावनी सिर्फ सुंदरबन तक सीमित नहीं है, बल्कि दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया सहित समूचे वैश्विक तटीय क्षेत्रों के लिए एक बड़ा संकेत है.



















