ब्राउन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक टीम ने मलेरिया परजीवियों में दवा प्रतिरोध क्षमता पैदा करने वाले एक महत्वपूर्ण आनुवंशिक तंत्र की खोज की है। नेचर मेडिसिन पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में युगांडा से 2016 और 2024 के बीच एकत्र किए गए मलेरिया परजीवियों के 157 नमूनों का संपूर्ण जीनोम विश्लेषण किया गया। शोध में पाया गया कि px1 प्रोटीन को एनकोड करने वाले जीन में म्यूटेशन मलेरिया की मुख्य दवाओं के प्रति परजीवियों की संवेदनशीलता को कम कर रहा है। px1 जीन पर पहले वैज्ञानिकों का ध्यान बहुत कम गया था, लेकिन इस नए अध्ययन ने मौजूदा मलेरिया रोधी उपचारों के बेअसर होने में इसकी प्रमुख भूमिका को उजागर किया है।
px1 जीन में PIN म्यूटेशन क्लस्टर की खोज
जब शोधकर्ताओं ने px1 जीन की आनुवंशिक संरचना का बारीकी से अध्ययन किया, तो उन्होंने तीन एमीनो एसिड म्यूटेशन और दो जेनेटिक विलोपन का एक विशिष्ट समूह पाया। जेनेटिक विलोपन का अर्थ क्रोमोसोम या DNA अनुक्रम के एक हिस्से का नष्ट होना होता है। आनुवंशिक परिवर्तनों के इस विशेष क्लस्टर को शोधकर्ताओं ने PIN नाम दिया है। अध्ययन में यह पाया गया कि PIN म्यूटेशन क्लस्टर मलेरिया परजीवियों की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में लगातार स्थानांतरित हो रहा है।
सामान्य जैविक प्रक्रियाओं के तहत हर पीढ़ी के साथ जीन्स का पुनर्मूल्यांकन यानी जेनेटिक रीकॉम्बिनेशन होता है, जिससे समय के साथ उनका अनुक्रम टूटने लगता है। हालांकि, PIN म्यूटेशन वाले मलेरिया परजीवियों के विश्लेषण में देखा गया कि px1 जीन के आसपास का एक बड़ा आनुवंशिक क्षेत्र कई परजीवियों में लगभग पूरी तरह सुरक्षित अवस्था में अगली पीढ़ी में पहुंचा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे स्पष्ट होता है कि PIN म्यूटेशन के उभरने के बाद से सामान्य जेनेटिक रीकॉम्बिनेशन होने के लिए पर्याप्त समय नहीं बीता है, जो दर्शाता है कि यह म्यूटेशन हाल के वर्षों में बेहद तेजी से फैला है।
युगांडा में म्यूटेशन के तेजी से फैलने का समय और नक्शा
PIN म्यूटेशन की शुरुआत का सही समय जानने के लिए शोध टीम ने पुराने ऐतिहासिक नमूनों की जांच की। इस दौरान 2008 के एक ऐतिहासिक नमूने में पहली बार PIN म्यूटेशन की मौजूदगी की पुष्टि हुई। इसके बाद के वर्षों में युगांडा की मलेरिया परजीवी आबादी में यह म्यूटेशन बहुत तेजी से फैला।
जीनोमिक ट्रैकिंग आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले दशक में इस म्यूटेशन की व्यापकता में भारी बढ़ोतरी हुई है। साल 2016 तक उत्तरी युगांडा से लिए गए मलेरिया परजीवी नमूनों में से आधे यानी 50 प्रतिशत नमूनों में PIN म्यूटेशन मौजूद था। साल 2023 तक पूर्वी युगांडा से एकत्र किए गए नमूनों में भी यह दर बढ़कर 50 प्रतिशत तक पहुंच गई। साल 2024 तक यह प्रसार और अधिक बढ़कर उत्तरी युगांडा में 84 प्रतिशत तथा पूर्वी युगांडा में 55 प्रतिशत तक दर्ज किया गया।
इसके अलावा, शोधकर्ताओं ने 2001 से 2015 के बीच के वैश्विक आनुवंशिक डेटाबेस का भी अध्ययन किया। उस अवधि के दौरान यह PIN म्यूटेशन दुनिया भर में बेहद दुर्लभ था और पड़ोसी देशों जैसे कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और केन्या में केवल 5 नमूनों में ही इसकी पहचान हुई थी। इसके अतिरिक्त, उसी वैश्विक डेटाबेस में शामिल 2010 के युगांडा के 13 नमूनों में यह म्यूटेशन बिल्कुल नहीं पाया गया था। हाल के सीमा पार आनुवंशिक आंकड़ों की कमी के कारण युगांडा के बाहर इस म्यूटेशन के प्रसार की सटीक सीमा अभी स्पष्ट नहीं है।
प्रयोगशाला परीक्षण: लुमफैंट्रिन दवा पर असर और वैज्ञानिक प्रमाण
अध्ययन में PIN म्यूटेशन वाले परजीवियों और बिना म्यूटेशन वाले परजीवियों की सामान्य मलेरिया रोधी दवाओं के प्रति प्रतिक्रिया की तुलना की गई। प्रयोग के नतीजों से सामने आया कि PIN म्यूटेशन वाले मलेरिया परजीवी लुमफैंट्रिन दवा के प्रति कम संवेदनशील थे। लुमफैंट्रिन मलेरिया के इलाज में व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली आर्टेमेथर-लुमफैंट्रिन संयोजन दवा का एक मुख्य घटक है। इसके अलावा अन्य मलेरिया रोधी दवाओं के प्रति भी परजीवियों की संवेदनशीलता में कमी देखी गई।
यह पुष्टि करने के लिए कि क्या यह बदलाव px1 जीन के कारण ही हुआ है, शोधकर्ताओं ने एक पिछले अध्ययन में तैयार किए गए उन मलेरिया परजीवियों का परीक्षण किया जिनमें px1 जीन को जानबूझकर निष्क्रिय कर दिया गया था। जब इन परजीवियों पर दवाओं का परीक्षण किया गया, तो px1 जीन से रहित परजीवी इन उपचारों के प्रति अधिक संवेदनशील पाए गए और उन पर दवा का असर तेजी से हुआ। हालांकि, आर्टेमिसिनिन दवा के प्रति प्रतिरोध क्षमता की अलग से की गई जांच में PIN म्यूटेशन के कारण कोई स्पष्ट अंतर नहीं देखा गया।
पूर्व के अध्ययनों में Kelch13 (K13) नामक जीन में म्यूटेशन को आर्टेमिसिनिन प्रतिरोध से जोड़ा गया था, लेकिन लुमफैंट्रिन के लिए कोई सत्यापित आनुवंशिक मार्कर उपलब्ध नहीं था। अध्ययन के प्रमुख लेखक करामाको नियारे के अनुसार वैज्ञानिक यह जानते थे कि आर्टेमिसिनिन के आंशिक प्रतिरोध में एक जीन शामिल था, लेकिन वे लुमफैंट्रिन के मामले में आ रहे बदलावों की व्याख्या नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने कहा कि इस नए म्यूटेशन को निगरानी प्रणालियों में शामिल किया जाना चाहिए और इस पर आगे गहन अध्ययन होना चाहिए।
निगरानी प्रणाली की जरूरत और भविष्य की चुनौतियां
ब्राउन यूनिवर्सिटी में पैथोलॉजी के एसोसिएट प्रोफेसर और वरिष्ठ शोधकर्ता जेफरी बेली ने बढ़ते दवा प्रतिरोध के व्यापक स्वास्थ्य प्रभावों पर चेतावनी दी है। उनका कहना है कि मलेरिया आज भी उप-सहारा अफ्रीका में मौतों का एक बड़ा कारण बना हुआ है। यदि दवा प्रतिरोध इसी तरह बढ़ता रहा, तो इससे मलेरिया नियंत्रण के प्रयासों को नुकसान पहुंचेगा और अफ्रीका तथा अन्य क्षेत्रों में मौतों का आंकड़ा बढ़ सकता है।
शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि वर्तमान अध्ययन केवल प्रयोगशाला स्तर पर दवाओं के प्रति संवेदनशीलता में आए बदलावों को प्रदर्शित करता है। वास्तविक मलेरिया मरीजों के इलाज और क्लिनिकल परिणामों पर इसका कितना असर पड़ता है, यह अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। डॉक्टरों और शोधकर्ताओं के लिए यह बेहद जरूरी हो गया है कि वे दवाओं के बेअसर होने का पहले से अनुमान लगाने वाली निगरानी प्रणाली स्थापित करें और मलेरिया के नए उपचार विकसित करने पर तेजी से काम करें।



















