नेपाल और तिब्बत की दुर्गम पहाड़ी सीमा पर बुधवार को एक भीषण प्राकृतिक आपदा ने भारी तबाही मचाई। ग्लेशियर का एक विशाल हिस्सा टूटने से आई अचानक बाढ़ की चपेट में आने से लगभग 160 लोगों की मौत हो गई है, जबकि दर्जनों अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों समेत सैकड़ों अन्य लोग अब भी लापता हैं। सोशल मीडिया पर सामने आए भयानक वीडियो में देखा जा सकता है कि पानी की तेज लहरें इमारतों और वाहनों को अपने साथ बहा ले गईं और लोग अपनी जान बचाने के लिए भागते नजर आए। नेपाल सरकार की शुरुआती रिपोर्टों और उपग्रह चित्रों के विश्लेषण से संकेत मिलता है कि सैकड़ों फीट ऊंचाई से ग्लेशियर का टुकड़ा गिरने के कारण भूस्खलन हुआ, जिसने इस प्रलयंकारी बाढ़ का रूप ले लिया।
ग्लेशियर पिघलने से बढ़ा पर्वतीय इलाकों में खतरा
पर्यावरण वैज्ञानिकों का कहना है कि वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण हिमालयी क्षेत्र की बर्फ तेजी से अस्थिर हो रही है, जिससे विनाशकारी बाढ़ का जोखिम लगातार बढ़ रहा है। यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्दर्न ब्रिटिश कोलंबिया में भूगोल के एसोसिएट प्रोफेसर जोसेफ शेया के अनुसार, इस क्षेत्र के ग्लेशियर स्पष्ट रूप से पीछे हट रहे हैं। ऊपरी इलाकों में बर्फ का बड़ा भंडार मौजूद है, लेकिन तापमान बढ़ने के कारण ग्लेशियर पतले हो रहे हैं और उनका दायरा सिकुड़ रहा है।
शोध दर्शाते हैं कि साल 2000 के बाद से दुनिया भर के ग्लेशियरों ने अपनी बर्फ का 5 प्रतिशत हिस्सा गंवा दिया है। नेपाल में इसका असर और भी ज्यादा गंभीर रहा है, जहां 1970 से 2010 के बीच ग्लेशियरों का लगभग एक-चौथाई क्षेत्र खत्म हो गया। इस दौरान देश के 160 से अधिक छोटे ग्लेशियर पूरी तरह से गायब हो चुके हैं। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर नहीं रोका गया, तो दुनिया की 40 प्रतिशत ग्लेशियर बर्फ हमेशा के लिए खत्म हो सकती है।
भूस्खलन और झील टूटने का बढ़ता जोखिम
ग्लेशियरों के सिकुड़ने से पहाड़ों में एक के बाद एक कई तरह की प्राकृतिक आपदाएं जन्म लेती हैं। जोसेफ शेया ने समझाया कि जब ग्लेशियर छोटे होते हैं, तो वे तलछट और चट्टानों को रोकने में असमर्थ हो जाते हैं, जिससे भूस्खलन की आशंका बढ़ जाती है। इसके अलावा, ग्लेशियरों के पीछे हटने से अधिक ऊंचाई वाले स्थानों पर प्राकृतिक बांधों वाली बड़ी झीलें बन जाती हैं। यदि कोई भूस्खलन अचानक ऐसी झील में गिरता है, तो बांध के ऊपर से पानी बहने लगता है और पूरा ढांचा ढह जाता है। इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड कहा जाता है। नेपाल में पिछले साल भी ऐसी दो घटनाएं हुई थीं, और दुनिया भर में लाखों लोग ऐसे जोखिम वाले इलाकों में रहने को मजबूर हैं।
4,000 फीट की ऊंचाई से गिरा 2,000 फीट चौड़ा बर्फ का टुकड़ा
बुधवार को हुई तबाही का मुख्य कारण घाटी में ग्लेशियर का सीधे गिरना माना जा रहा है। कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलगरी के भूविज्ञानी डैनियल शूगर के अनुसार, उपग्रह तस्वीरों से पता चलता है कि ग्लेशियर से लगभग 2,000 फीट चौड़ा बर्फ का टुकड़ा करीब 4,000 फीट नीचे गिरा। इतनी ऊंचाई से गिरने के प्रचंड बल के कारण बर्फ पूरी तरह से पानी में तब्दील हो गई। डैनियल शूगर ने स्पष्ट किया कि हालांकि हादसे की अंतिम वजह पर पक्के तौर पर बोलना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन हफ्ते की शुरुआत में उच्च तापमान के कारण ग्लेशियर पर मौजूद बर्फ पिघल चुकी थी।
अमेरिकी भूगर्भीय सर्वेक्षण (USGS) के आंकड़ों के मुताबिक, ग्लेशियर टूटने और मलबे के बहाव का झटका इतना तेज था कि इसे 5.2 तीव्रता के भूकंपीय घटना के रूप में दर्ज किया गया। दुनिया के अन्य हिस्सों में भी बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर टूटने की घटनाएं हुई हैं। पिछले साल स्विट्जरलैंड में ग्लेशियर ढहने से एक पूरा कस्बा मलबे में दब गया था, जबकि 2022 में इटली में ग्लेशियर टूटने से 11 पर्वतारोहियों की जान चली गई थी। गर्मियों के मौसम में परमाफ्रॉस्ट पिघलने से बर्फ में जमे हुए बड़े चट्टानी टुकड़े अचानक गतिशील हो जाते हैं, जो ऐसी आपदाओं का कारण बनते हैं।



















