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पटना म्यूजियम में रखा 20 करोड़ साल पुराना यह 'पत्थर' दरअसल एक जिंदा पेड़ था, जानिए पूरी कहानीविज्ञान
14 जून 2026, 10:26 am (45 दिन पहले)· 0

पटना म्यूजियम में रखा 20 करोड़ साल पुराना यह 'पत्थर' दरअसल एक जिंदा पेड़ था, जानिए पूरी कहानी

बिहार की राजधानी पटना के संग्रहालय में रखा 53 फीट लंबा जीवाश्म वृक्ष करीब 20 करोड़ साल पुराना है। 1927 में पश्चिम बंगाल में रेलवे लाइन बिछाते वक्त मिला यह चीड़ प्रजाति का पेड़ आज पत्थर में बदल चुका है।

अगर कोई आपसे कहे कि करीब 20 करोड़ साल पुराना एक पेड़ देखने के लिए आपको किसी घने जंगल या दूर-दराज के इलाके में जाने की जरूरत नहीं, तो शायद आपको यकीन न हो। लेकिन यह बिल्कुल सच है। धरती के करोड़ों साल पुराने इतिहास की एक जीती-जागती गवाही बिहार की राजधानी पटना में मौजूद है, और इसे देखने के लिए आपको सिर्फ पटना म्यूजियम तक पहुंचना है।

पहली नजर में पत्थर, असल में पेड़

पटना संग्रहालय में रखा यह विशाल जीवाश्म वृक्ष पूरे 53 फीट लंबा है। इसे देखकर पहली बार में कोई भी इसे किसी बड़ी चट्टान या पत्थर समझने की भूल कर सकता है। लेकिन हकीकत यह है कि करोड़ों साल पहले यह एक जिंदा, हरा-भरा पेड़ था, जो वक्त के साथ पूरी तरह पत्थर में तब्दील हो गया। यही वजह है कि म्यूजियम आने वाले लोग इसे खास दिलचस्पी के साथ देखते हैं और इसके सामने ठहरकर इसकी कहानी जानने की कोशिश करते हैं।

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सिर्फ एक पुराना पेड़ नहीं

वैज्ञानिक नजरिए से यह कोई आम पुराना पेड़ भर नहीं है। यह पृथ्वी के प्राचीन पर्यावरण, उस दौर की वनस्पतियों और जलवायु को समझने का एक अहम जरिया है। इसकी मौजूदगी पटना संग्रहालय को देश के उन गिने-चुने ठिकानों में शामिल कर देती है, जहां करोड़ों साल पुराने प्राकृतिक इतिहास की झलक सीधे आंखों के सामने मिल जाती है।

1927 में रेलवे लाइन बिछाते वक्त हुई खोज

इस दुर्लभ धरोहर की कहानी 1927 से शुरू होती है। उस समय पश्चिम बंगाल के आसनसोल के पास कुमारपुर क्षेत्र में रेलवे लाइन बिछाने का काम चल रहा था। खुदाई के दौरान मजदूरों को जमीन के भीतर दबा हुआ एक विशाल पेड़ जैसा ढांचा मिला। शुरू में इसे सामान्य लकड़ी समझा गया, लेकिन जब भूवैज्ञानिकों ने इसकी जांच की तो साफ हुआ कि यह कोई मामूली लकड़ी नहीं, बल्कि करोड़ों साल पुराना जीवाश्म है। इसके बाद इसे संरक्षित कर आगे के अध्ययन के लिए एक बेशकीमती धरोहर मान लिया गया।

चीड़ प्रजाति का पर्मियन कालखंड का पेड़

वैज्ञानिकों के मुताबिक यह चीड़ प्रजाति का वृक्ष था, जिसका अस्तित्व करीब 20 करोड़ वर्ष पहले रहा होगा। इस जीवाश्म वृक्ष के टुकड़े निचली गोंडवाना या दामुदा पर्वत श्रृंखला की ऊपरी रानीगंज परत से मिले थे और इसे पर्मियन कालखंड का बताया जाता है। माना जाता है कि किसी प्राकृतिक घटना के चलते यह पेड़ किसी नदी या जलाशय वाले इलाके में गिर गया और तेजी से मिट्टी व तलछट की परतों के नीचे दब गया।

पत्थर में कैसे बदला जिंदा पेड़

दबने के बाद इस पेड़ तक ऑक्सीजन पहुंचना बंद हो गई। ऑक्सीजन न मिलने से वह सड़न और क्षय बेहद धीमा पड़ गया, जो सामान्य हालात में किसी लकड़ी के साथ होता है। इसी वजह से इसकी मूल संरचना लंबे समय तक सुरक्षित बनी रही। वक्त के साथ इस दबे हुए वृक्ष के अंदर खनिज युक्त पानी रिसता रहा और सिलिका जैसे खनिज धीरे-धीरे लकड़ी की कोशिकाओं में जमा होते गए। लाखों साल तक चली इस प्रक्रिया में लकड़ी के जैविक तत्व नष्ट होते गए और उनकी जगह खनिज लेते चले गए। नतीजा यह हुआ कि पूरा पेड़ पत्थर जैसी कठोर संरचना में बदल गया। इसी प्रक्रिया को जीवाश्मीकरण या पाषाणीकरण कहा जाता है। यही कारण है कि आज यह वृक्ष देखने में चट्टान जैसा लगता है, मगर इसकी भीतरी बनावट आज भी एक पेड़ की पहचान को संजोए हुए है। ये तमाम जानकारी पटना संग्रहालय में दर्ज है।

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