प्राकृतिक वनस्पतियों में साधारण सी दिखने वाली घास का मानव जीवन, कृषि और धार्मिक अनुष्ठानों में बेहद विशिष्ट स्थान है। जहां एक ओर खेतों में अनचाहे रूप से उग आने के कारण यह किसानों के लिए निरंतर परेशानी खड़ी करती है, वहीं सनातन पूजा-पाठ और मांगलिक कार्यों में इसे अत्यंत पावन माना जाता है। इसके अलावा आयुर्वेद और अन्य पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में भी इसके अनेक स्वास्थ्य लाभ दर्ज हैं। धार्मिक परंपराओं में इसे दूर्वा कहा जाता है। लोकमानस में अक्सर यह जिज्ञासा रहती है कि बार-बार नष्ट किए जाने के बाद भी यह दोबारा कैसे हरी-भरी हो जाती है और इसके अस्तित्व का मूल स्रोत क्या है। वेद-पुराणों के जानकार इसे अमरत्व से जोड़कर देखते हैं और मानते हैं कि इसका प्राकट्य दिव्य अमृत से हुआ है।
कृषि के लिए चुनौती और दूर्वा की विलक्षण प्रकृति
सामान्य तौर पर घास किसी भी खुले स्थान या मिट्टी पर बिना किसी मानवीय प्रयास के पनप जाती है। किसानों के दृष्टिकोण से यह मुख्य फसलों के पोषण को प्रभावित करती है और उनकी वृद्धि को बाधित करती है। इस वजह से किसानों को खेतों से इसे बार-बार उखाड़ना पड़ता है। कई बार इसे समाप्त करने के उद्देश्य से विभिन्न प्रकार के रसायनों का छिड़काव किया जाता है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होकर वह विषैली होने लगती है। इसके बावजूद कुछ ही समय अंतराल के बाद उसी स्थान पर घास पुनः उग आती है। दूर्वा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे उगाने के लिए न तो बीजों की जरूरत पड़ती है और न ही विशेष रूप से सिंचाई करनी होती है। नमी और मिट्टी मिलते ही यह स्वतः फैलने लगती है। सनातन धर्मग्रंथों में वर्णित इसके आध्यात्मिक महत्व पर मधुबनी के एक आचार्य ने विस्तृत प्रकाश डाला है।
देवासुर संग्राम और अमृत से अमरत्व का संबंध
पौराणिक आख्यानों का उल्लेख करते हुए आचार्य ने स्पष्ट किया कि आदिकाल में जब देवताओं और असुरों के बीच भीषण देवासुर संग्राम छिड़ा था, तब अमृत कलश को लेकर दोनों पक्षों में भारी छीना-झपटी हुई थी। इस संघर्ष के दौरान अमृत कलश से दिव्य रस की बूंदें जिन-जिन स्थानों पर धरती पर गिरीं, वहां दूर्वा घास उत्पन्न हो गई। चूंकि अमृत का मूल धर्म ही अमरत्व प्रदान करना है, इसलिए उन पावन बूंदों के संपर्क में आने से घास भी अमर हो गई। यही पौराणिक कारण है कि इसे चाहे जितनी बार जड़ से उखाड़ दिया जाए या नष्ट करने का प्रयास किया जाए, यह कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होती और बार-बार अंकुरित होकर जीवंत हो उठती है।
भगवान गणेश की प्रिय दूर्वा और पूजन के जरूरी नियम
धार्मिक दृष्टिकोण से दूर्वा सभी देवी-देवताओं को अत्यंत प्रिय है, विशेष रूप से भगवान गणेश की उपासना में इसका अर्पण अनिवार्य माना गया है। आचार्य के अनुसार, पूजन में दूर्वा अर्पित करने की एक निश्चित मर्यादा और नियम है। जब भी किसी देवता को दूर्वा अर्पित की जाए, तो उसका अग्र भाग यानी आगे का सिरा सदैव अपनी दिशा में रखना चाहिए। इसके साथ ही शास्त्रों में वही दूर्वा पूर्णतः फलदायी और शुभ मानी जाती है जिसमें पांच पत्तियां जुड़ी हों। इसी क्रम में उन्होंने शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने की शास्त्रीय विधि भी साझा की। बेलपत्र अर्पित करते समय उसका आगे का भाग नीचे की ओर होना चाहिए, जिसे शास्त्रों में अधोमुख मुद्रा कहा जाता है। सही विधि से किया गया यह अर्पण ही पूजा को पूर्ण और फलदायी बनाता है।



















