पारिवारिक भूखंडों के झगड़े जब अदालतों और पुलिस स्टेशनों की दहलीज लांघते हैं, तो पीढ़ियों की कमाई तारीखों और वकीलों की भेंट चढ़ जाती है। झारखंड अंतर्गत रांची के बरडीहा क्षेत्र से एक ऐसा उदाहरण सामने आया है जिसने पारंपरिक मुकदमेबाजी के ढर्रे को बदलकर रख दिया। वहां चार सगे भाइयों के बीच बीस एकड़ पैतृक भूमि के बंटवारे को लेकर पिछले बारह सालों से घमासान मचा हुआ था। यह तनातनी महज मौखिक कहासुनी तक सीमित नहीं रही, बल्कि दोनों पक्षों की तरफ से थाने में कुल मिलाकर तेरह प्राथमिकी तक दर्ज कराई जा चुकी थीं। सालों से अनुमंडल कार्यालय और दीवानी अदालत के चक्कर काट रहे इन सगे संबंधियों के बीच कड़वाहट इतनी बढ़ चुकी थी कि समझौते की कोई गुंजाइश नहीं दिखती थी।
इस पूरे गतिरोध को तोड़ने में अनुमंडल दंडाधिकारी प्रवीण सिंह की प्रशासनिक सूझबूझ ने निर्णायक भूमिका निभाई। उन्होंने विवादित जमीन को लेकर उलझे परिजनों को औपचारिक मुकदमों से हटाकर पारंपरिक पंचायती व्यवस्था और आमने-सामने संवाद के लिए राजी किया। इस अनूठी सुलह का एक दृश्य इंटरनेट पर भी तेजी से साझा किया जा रहा है, जिसमें कानूनी पचड़ों में वर्षों गंवाने वाले भाई एक साथ बैठकर भोजन करते और पुरानी रंजिश भूलकर एक-दूसरे को गले लगाते दिखाई दिए।
पैतृक बीस एकड़ और बारह सालों का कानूनी उलझाव
बरडीहा का यह पारिवारिक संकट करीब बीस एकड़ जमीन के मालिकाना हक और सीमांकन से जुड़ा हुआ था। जो जायदाद अगली पीढ़ी की समृद्धि और पारिवारिक सुरक्षा का आधार बननी चाहिए थी, उसी के चलते सगे भाइयों के बीच गहरी खाई पैदा हो गई। बंटवारे की छोटी सी असहमति धीरे-धीरे उग्र विवाद में तब्दील हुई और नौबत मारपीट तथा कानूनी शिकायतों तक जा पहुंची।
बारह वर्षों के लंबे अंतराल में दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ तेरह अलग-अलग मामले थानों में दर्ज कराए। परिवार के सदस्य सालों तक कभी सिविल कोर्ट की तारीखों पर हाजिरी भरते रहे, तो कभी अनुमंडल कार्यालय की फाइलों के पीछे भागते रहे। समय और धन की भारी बर्बादी के बावजूद जमीन का वास्तविक निपटारा नहीं हो सका, उल्टे पारिवारिक रिश्तों की डोर लगातार कमजोर होती चली गई।
पंचायत की चौपाल और संवाद से निकला स्थायी हल
अदालती कार्यवाहियों के जरिए वर्षों से खिंच रहे इस मसले को सुलझाने के लिए एसडीएम प्रवीण सिंह ने एक सर्वथा अलग रास्ता चुना। उन्होंने समझाइश दी कि कागजी आदेशों से जमीन तो बंट सकती है, लेकिन दिलों में पड़ी दरार कभी नहीं भरती। इसी सोच के तहत उन्होंने परिजनों और गांव के अनुभवी पंचों को एक मंच पर आमंत्रित किया।
प्रवीण सिंह ने इस पहल का ब्योरा अपने फेसबुक पेज पर साझा किया। उन्होंने वीडियो के माध्यम से रेखांकित किया कि कैसे अनगिनत कानूनी पेशियों के मुकाबले आमने-सामने बैठकर की गई बातचीत कहीं अधिक असरदार साबित हुई। पंचायत की मौजूदगी में चारों भाइयों ने खुले मन से अपनी समस्याएं रखीं और आपसी रजामंदी से जमीन के न्यायसंगत बंटवारे का खाका तैयार कर लिया गया।
गिले-शिकवे भुलाकर भाइयों ने किया सामूहिक भोज
इस समझौते का सबसे भावुक पहलू बातचीत संपन्न होने के तुरंत बाद देखने को मिला। बारह सालों तक एक-दूसरे के धुर विरोधी बने खड़े चारों सगे भाइयों ने पुरानी कटुता को पूरी तरह भुला दिया। समझौते की सहमति बनते ही भाइयों ने एक-दूसरे को आलिंगनबद्ध किया और गिले-शिकवे आंसुओं में बह गए।
इसके पश्चात सभी परिजनों ने एक साथ बैठकर भोजन किया और सालों पुरानी दुश्मनी को सदा के लिए विदा कर दिया। जिस बीस एकड़ भूभाग ने एक ही खून के रिश्तों को अदालत की सीढ़ियों पर ला खड़ा किया था, वहां आखिरकार संवाद और सौहार्द की जीत दर्ज हुई।
प्रशासनिक और कानूनी सीमाओं पर अधिकारी का दृष्टिकोण
इस ऐतिहासिक सुलह के बाद एसडीएम प्रवीण सिंह ने समाज और व्यवस्था के नाम एक आवश्यक संदेश भी दिया। उनका स्पष्ट मत था कि घरेलू और पारिवारिक तकरार का मुकम्मल हल केवल थानों की डायरी या अदालतों के आदेशों में नहीं तलाशा जा सकता।
प्रवीण सिंह के अनुसार, यदि ग्रामीण अंचलों में भू-विवादों को स्थानीय स्तर पर पंचायती सूझबूझ और भाईचारे से सुलझा लिया जाए, तो आम नागरिकों को कचहरी की लंबी दौड़ और आर्थिक तबाही से सहज ही बचाया जा सकता है। पुलिस, कानून और प्रशासनिक तंत्र हर पारिवारिक मनमुटाव को जबरन खत्म नहीं कर सकते; स्थायी समाधान तभी संभव है जब संबंधित पक्ष स्वयं मेज पर बैठकर संवाद का रास्ता अपनाएं।
सोशल मीडिया पर नागरिकों की प्रतिक्रिया
अधिकारी द्वारा साझा किए गए दृश्य सार्वजनिक होने के बाद डिजिटल माध्यमों पर जनता ने इस मानवीय पहल की मुक्तकंठ से सराहना की। लाल पप्पू नाथ शहदेव नामक एक उपभोक्ता ने टिप्पणी करते हुए कहा कि उनके परिवार में भी पांच भाइयों के बीच बारह साल से जमीन का विवाद चला आ रहा है, जिसमें उन्होंने अधिकारी से ऐसी ही मध्यस्थता की गुहार लगाई।
वहीं दिनेश ठाकुर ने अपने विचार साझा करते हुए लिखा कि प्रवीण सर बरडीहा प्रखंड में बेहद उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं और ऐसे समर्पित अधिकारी का मिलना क्षेत्र के लिए सौभाग्य है। एक अन्य टिप्पणीकार जितेंद्र यादव ने व्यावहारिक सुझाव देते हुए कहा कि यदि लोगों को अपनी गाढ़ी कमाई और अनमोल वक्त बचाना है, तो उन्हें कचहरी भागने के बजाय ग्राम पंचों के परामर्श पर अमल करना चाहिए। विभिन्न नागरिकों ने यह भी जोड़ा कि अन्य प्रशासनिक पदाधिकारियों को भी इस संवेदनशील मॉडल से सीख लेकर जनसमस्याओं का निवारण करना चाहिए।





















