प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ताजा 'मन की बात' कार्यक्रम में भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच गहरे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंधों को रेखांकित किया. उन्होंने थाईलैंड के एक समर्पित गणेश भक्त, पंथौन थीरखानोन की असाधारण कहानी देशवासियों के साथ साझा की. प्रधानमंत्री ने बताया कि कैसे इस विदेशी श्रद्धालु ने भगवान गणेश की महिमा और परंपराओं को सहेजने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया है. यह कहानी दर्शाती है कि भारतीय आस्था और संस्कृति किस तरह भौगोलिक सीमाओं को पार कर वैश्विक मंच पर अपनी पहचान बना रही है. इस तरह के उदाहरण साबित करते हैं कि आस्था और कला की कोई सीमा नहीं होती और वे विभिन्न संस्कृतियों को करीब लाते हैं.
पिता के उपहार से शुरू हुई भक्ति की अद्भुत यात्रा
पंथौन थीरखानोन की यह आध्यात्मिक यात्रा तब शुरू हुई जब वह महज 19 वर्ष के थे. उनके जीवन में यह बड़ा बदलाव उनके पिता द्वारा दिए गए एक साधारण उपहार से आया. उनके पिता ने उन्हें भगवान श्री गणेश की एक तस्वीर भेंट की थी, जिसने उनके भीतर भक्ति की एक गहरी लौ जला दी. थाईलैंड में भगवान श्री गणेश को 'फ्रा फिकानेत' के नाम से जाना जाता है और वहां उनकी व्यापक पूजा की जाती है. इस भेंट के बाद, पंथौन थीरखानोन ने गणेश पूजा की विभिन्न पद्धतियों और इतिहास का अध्ययन करने के लिए अपने जीवन के चार दशक से भी अधिक का समय समर्पित कर दिया. उन्होंने विभिन्न देशों में जाकर भगवान गणेश से जुड़ी ऐतिहासिक कथाओं और कलाओं का गहन अध्ययन किया, जिससे उनका यह व्यक्तिगत लगाव एक बड़े मिशन में बदल गया.
चियांग माई में स्थापित किया विशाल गणेश हिमाल संग्रहालय
अपनी इस गहरी आस्था को एक मूर्त रूप देने के लिए उन्होंने साल 2002 में उत्तरी थाईलैंड के चियांग माई क्षेत्र में 'गणेश हिमाल म्यूजियम' की स्थापना की. आज यह संग्रहालय एक बेहद खास दर्शनीय स्थल बन चुका है, जहां भगवान गणेश की 10 हजार से अधिक विभिन्न प्रतिमाएं मौजूद हैं. दुनिया भर से लोग इस विशाल संग्रह को देखने और पूजा-अचना करने के लिए यहां आते हैं. यह संग्रहालय न केवल कला का एक अद्भुत केंद्र है, बल्कि यह थाईलैंड में भारतीय संस्कृति की गहरी जड़ों को भी प्रदर्शित करता है. यह संग्रहालय यह भी दिखाता है कि कैसे एक व्यक्ति का दृढ़ संकल्प आने वाली पीढ़ियों के लिए एक महान सांस्कृतिक विरासत का निर्माण कर सकता है.
महाराष्ट्र की अष्टविनायक परंपरा से गहरा जुड़ाव
अपनी खोज और अध्ययन के सिलसिले में पंथौन थीरखानोन ने भारत और नेपाल सहित एशिया के कई देशों की व्यापक यात्राएं की हैं. इस दौरान उनका भारत के महाराष्ट्र राज्य से एक विशेष और अटूट लगाव हो गया. महाराष्ट्र की प्रसिद्ध अष्टविनायक यात्रा और उसकी समृद्ध परंपराओं को समझने के लिए वे कई बार भारत आए. उनके इस प्रयास का परिणाम यह हुआ कि आज थाईलैंड के श्रद्धालुओं के बीच भी अष्टविनायक यात्रा बेहद लोकप्रिय हो चुकी है. जो श्रद्धालु किसी कारणवश भारत नहीं आ सकते, उनके लिए चियांग माई के इस म्यूजियम में अष्टविनायक की विशेष प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं ताकि वे वहीं दर्शन कर सकें. इस तरह उन्होंने थाईलैंड के लोगों के लिए महाराष्ट्र के पावन स्थलों का आध्यात्मिक अनुभव उनके अपने देश में ही सुलभ करा दिया है.
साप्ताहिक अनुष्ठान और भारतीय संस्कृति का वैश्विक प्रसार
इस संग्रहालय में आज भी नियमित रूप से धार्मिक गतिविधियां आयोजित की जाती हैं. हर रविवार को सुबह करीब 10 बजे यहां विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. इसके अलावा, गणेश उत्सव और भगवान गणेश से जुड़े अन्य विशेष त्योहारों के अवसर पर भी यहां भव्य अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि पंथौन थीरखानोन के यह प्रयास बताते हैं कि कैसे भारत की अनूठी आस्था, कला और सांस्कृतिक मूल्य अन्य देशों के लोगों के दिलों में भी अपनी जगह बना रहे हैं और उन्हें एकता के सूत्र में पिरो रहे हैं. इसके साथ ही प्रधानमंत्री मोदी ने कामना की कि विघ्नहर्ता गणपति बप्पा का आशीर्वाद सभी देशवासियों और वैश्विक श्रद्धालुओं पर हमेशा बना रहे.



















