श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हर वर्ष सुहागिनों का पावन उत्सव हरियाली तीज पूरे उल्लास के साथ मनाया जाता है. इस वर्ष यह पावन तिथि 15 अगस्त दिन शनिवार को पड़ रही है. इस बार का संयोग बेहद खास है क्योंकि देश का राष्ट्रीय पर्व स्वतंत्रता दिवस और हरियाली तीज दोनों एक ही दिन पड़ रहे हैं. हिंदू धर्म में हरियाली तीज को महिलाओं की अटूट आस्था और अखंड सौभाग्य के महापर्व के रूप में देखा जाता है. प्रकृति में चारों तरफ हरियाली छा जाने के कारण इस पर्व को हरियाली तीज कहा गया है. यह पावन दिन भगवान शिव और माता पार्वती के अलौकिक पुनर्मिलन की स्मृति से जुड़ा हुआ है. जो महिलाएं इस वर्ष जीवन में पहली बार हरियाली तीज का व्रत रखने जा रही हैं, उनके लिए इस व्रत के नियम, सही पूजा पद्धति और इसके आध्यात्मिक महत्व को विस्तार से जानना अत्यंत आवश्यक है. इसके अतिरिक्त योग्य और मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए कुंवारी कन्याएं भी इस उपवास को रख सकती हैं.
पति-पत्नी के प्रेम और तप का प्रतीक है यह पर्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए वर्षों तक अत्यंत कठोर तपस्या की थी. देवी पार्वती की इस अडिग साधना, त्याग और निष्ठा से प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया था. इसी कारण हरियाली तीज का त्योहार पति-पत्नी के परस्पर प्रेम, समर्पण, विश्वास और वैवाहिक सुख का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है. इस विशिष्ट दिन पर सुहागिन महिलाएं अपने जीवनसाथी की लंबी उम्र, उनके बेहतर स्वास्थ्य और दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि की कामना को लेकर निर्जला व्रत का पालन करती हैं. महिलाएं इस अवसर पर सोलह श्रृंगार करती हैं, अपनी हथेलियों पर मेहंदी रचाती हैं और हरे रंग की साड़ियां तथा हरी चूड़ियां धारण करती हैं. विभिन्न क्षेत्रों में महिलाएं झूले पर झूलते हुए तीज के मधुर लोकगीत गाकर इस पर्व की खुशियां मनाती हैं.
शुभ मुहूर्त और तृतीया तिथि का सही समय
पंचांग के अनुसार हरियाली तीज की तृतीया तिथि का आरंभ 14 अगस्त दिन शुक्रवार को शाम 6 बजकर 46 मिनट पर हो जाएगा. यह तिथि अगले दिन यानी 15 अगस्त दिन शनिवार को शाम 5 बजकर 28 मिनट तक प्रभावी रहेगी. हिंदू धर्म में त्योहारों का निर्धारण उदया तिथि के आधार पर किया जाता है, इसलिए हरियाली तीज का पर्व 15 अगस्त दिन शनिवार को ही श्रद्धापूर्वक मनाया जाएगा. पूजा-अर्चना के लिए 15 अगस्त को सूर्योदय से लेकर सुबह 9 बजकर 8 मिनट तक का समय सबसे उत्तम और फलदायी माना गया है. व्रती महिलाओं को इसी शुभ अवधि में अपनी पूजा संपन्न करने की सलाह दी जाती है.
सिंधारा की परंपरा और सोलह श्रृंगार का महत्व
हरियाली तीज के अवसर पर सुहागिन महिलाओं के लिए उनके मायके से विशेष उपहार स्वरूप 'सिंधारा' भेजने की प्राचीन परंपरा है. सिंधारा में मुख्य रूप से साड़ी, हरी चूड़ियां, घेवर जैसी मिठाइयां और श्रृंगार की संपूर्ण सामग्री भेजी जाती है. इस दिन उपवास रखने वाली महिलाओं को अपने मायके से आए सिंधारे की ही साड़ी और श्रृंगार का उपयोग करना चाहिए. हरे रंग को प्रकृति, सौभाग्य और उर्वरता का प्रतीक माना गया है, इसलिए हरे रंग के परिधान पहनना सर्वोत्तम रहता है. सोलह श्रृंगार को नारी के सौभाग्य का प्रतीक माना गया है, जिसे धारण करके ही पूजा में बैठना चाहिए.
पहली बार व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए चरणबद्ध पूजा विधि
यदि कोई महिला पहली बार इस व्रत का अनुष्ठान कर रही है, तो उसे निर्धारित विधि का पालन करना चाहिए
- स्नान और संकल्प: सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर घर की साफ-सफाई करें और स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें. इसके बाद हाथ में जल लेकर दिनभर निर्जला व्रत रखने का विधिवत संकल्प लें.
- चौकी और मूर्तियों की स्थापना: पूजा स्थल को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें और वहां एक साफ लकड़ी की चौकी बिछाएं. उस चौकी पर साफ वस्त्र बिछाकर काली मिट्टी या शुद्ध बालू रेत से भगवान शिव, माता पार्वती और प्रथम पूज्य श्रीगणेश की सुंदर प्रतिमाएं तैयार करके स्थापित करें.
- श्रृंगार और पूजन सामग्री अर्पण: माता पार्वती को सुहाग की 16 वस्तुएं जैसे हरी चूड़ियां, सिंदूर, बिंदी, मेहंदी, काजल और लाल चुनरी अर्पित करें. वहीं देवाधिदेव महादेव को गंगाजल, बेलपत्र, धतूरा, भांग, अक्षत, सफेद फूल और चंदन चढ़ाएं.
- कथा श्रवण और आरती: चौकी के सामने घी का दीपक और धूपबत्ती जलाएं. इसके बाद हरियाली तीज की पारंपरिक व्रत कथा का पाठ करें या एकाग्रचित्त होकर सुनें. कथा समापन के बाद कपूर से भगवान शिव और माता पार्वती की आरती करें और घर के बुजुर्गों के चरण छूकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें.
- व्रत का पारणा: हरियाली तीज का उपवास निर्जला रखा जाता है. इसका पारणा उसी दिन नहीं किया जाता, बल्कि अगले दिन सुबह पुनः स्नान और नित्य पूजा करने के बाद जरूरतमंदों को दान-दक्षिणा देकर ही व्रत खोला जाता है.
पेड़ों पर झूला झूलने की लोक परंपरा
हरियाली तीज पर महिलाओं के झूला झूलने का एक विशेष और आनंददायक महत्व है. लोक मान्यताओं के अनुसार जब कठिन तप के बाद माता पार्वती का भगवान शिव से पुनर्मिलन हुआ था, तब उनकी सखियों ने इस परम आनंद के अवसर पर उनके लिए सुंदर झूला डाला था. उसी ऐतिहासिक घटना की याद में तीज पर झूला झूलने की परंपरा की शुरुआत हुई. यह झूला झूलना किसी पूजा पद्धति का अनिवार्य हिस्सा नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक उत्सव और लोक परंपरा है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा जैसे राज्यों में इस दिन सावन के झूले डालने की समृद्ध परंपरा है. इस दिन केवल सुहागिनें ही नहीं, बल्कि कुंवारी कन्याएं भी पूरे उत्साह के साथ झूला झूलती हैं और उत्सव का आनंद लेती हैं.



















