दक्षिण भारत के हिस्सों में नागकेसर के फूल का इस्तेमाल मुख्य रूप से भगवान शिव की आराधना के लिए किया जाता है। ऐसी गहरी मान्यता है कि यह विशेष पुष्प महादेव को बेहद भाता है। इस फूल के उद्गम को लेकर पौराणिक कथाएं समुद्र मंथन से जुड़ी हुई हैं। जब देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन की प्रक्रिया चल रही थी, तब उसमें से कई अमूल्य रत्न और विष के साथ नागकेसर का फूल भी प्रकट हुआ था। ऐसा कहा जाता है कि देवों के देव महादेव ने इस पुष्प को अपने मस्तक पर धारण किया था, और तभी से यह शिव पूजा में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि नागकेसर के फूलों से शिवलिंग का अभिषेक किया जाए, तो इससे भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और कुंडली के तमाम ग्रह दोष शांत हो जाते हैं। इस फूल का उपयोग विशेष रूप से शनि और केतु ग्रहों के अशुभ प्रभावों को दूर करने के लिए भी किया जाता है। इसके अलावा, यदि नागकेसर के इन फूलों को एक लाल रंग के कपड़े में बांधकर घर की तिजोरी में रखा जाए, तो इससे आर्थिक लाभ की प्राप्ति होती है। हर शनिवार के दिन शनि मंदिर में नागकेसर और सरसों का तेल अर्पित करने से शनि का प्रकोप शांत होता है। घर के अंदर नागकेसर की लकड़ी या इसके फूल रखने से वास्तु दोषों का नाश होता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार बढ़ता है। पूजा के दौरान शिवलिंग पर दूध के साथ नागकेसर चढ़ाने से भी विशेष फल की प्राप्ति होती है।
औषधीय गुण और स्वास्थ्य लाभ
धार्मिक और ज्योतिषीय उपयोग के अलावा नागकेसर को भारतीय लौंग के नाम से भी जाना जाता है और आयुर्वेद में इसे एक रसायन का दर्जा दिया गया है। इसके सेवन से हमारे स्वास्थ्य को कई प्रकार के जबरदस्त फायदे मिलते हैं। यह पेट दर्द, गैस और अपच जैसी समस्याओं में काफी राहत देता है और चूर्ण के रूप में इसका नियमित उपयोग किया जाता है। इसके अलावा नागकेसर का तेल घाव, खुजली और एक्जिमा जैसी त्वचा संबंधी परेशानियों में बहुत लाभदायक साबित होता है और चेहरे के जिद्दी दाग-धब्बों को हटाने में भी मददगार है। इसकी भीनी-भीनी सुगंध मन को शांत करने का काम करती है। यदि इसके फूलों को उबालकर चाय या काढ़ा बनाकर पिया जाए, तो सर्दी और खांसी में भी तुरंत आराम मिलता है। इसके अतिरिक्त नारियल के तेल में नागकेसर मिलाकर लगाने से जोड़ों के दर्द में भी कमी आती है।



















