राजस्थान के सीकर जिले में श्रीमाधोपुर ब्लॉक के अंतर्गत आने वाला पीएमश्री राजकीय उच्च प्राथमिक स्कूल छीलावाली इन दिनों ग्रामीण प्रतिभा को तराशने का शानदार उदाहरण पेश कर रहा है। स्कूल परिसर में न तो कोई औपचारिक खेल मैदान मौजूद है और न ही खेल प्रशिक्षण के लिए कोई शारीरिक शिक्षक नियुक्त है। बीते वर्ष छह जर्जर कमरों को सुरक्षा कारणों से गिराए जाने के बाद विद्यालय में स्थान का गंभीर संकट भी पैदा हो गया था। इसके बावजूद संस्था के शिक्षकों, पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं और स्थानीय ग्रामीणों के साझा संकल्प ने अभावों को कभी भी बेटियों के सपनों के आड़े नहीं आने दिया।
सीमित साधनों के बीच पंचायत की जमीन पर कड़ी मेहनत
करीब 180 विद्यार्थियों की कुल संख्या वाले इस प्राथमिक विद्यालय की पहचान अब खो-खो खेल की एक जीवंत नर्सरी के रूप में स्थापित हो चुकी है। विद्यालय में कार्यरत लेवल-1 शिक्षक बाबूलाल यादव सामान्य विषयों के अध्यापन के साथ-साथ छात्राओं को खेल की बारीकियों का अभ्यास भी खुद कराते हैं। स्कूल की नियमित समय सारिणी समाप्त होने के बाद भी वे निरंतर बच्चों के साथ खेल के मैदान में डटे दिखाई देते हैं। स्कूल के पास निजी मैदान न होने के कारण छात्राएं ग्राम पंचायत की खुली जमीन पर पसीना बहाती हैं। बिना किसी विशेष खेल प्रशिक्षक के गांव के ही एक शिक्षक के समर्पण से यह प्रतिभाएं लगातार निखर रही हैं।
राष्ट्रीय फलक पर चमक बिखेरतीं गांव की बेटियां
इस छोटे से स्कूल से निकलकर अब तक करीब 30 छात्राएं राष्ट्रीय स्तर की खो-खो प्रतियोगिताओं में अपनी जगह पक्की कर चुकी हैं। यहां की पूर्व छात्रा कंचन सामोता ने तो भारतीय महिला खो-खो टीम तक का सफर तय कर इतिहास रचा है। वहीं इसी इलाके की सरिता यादव राजस्थान की राज्य टीम का नेतृत्व करते हुए कप्तानी की जिम्मेदारी संभाल चुकी हैं। राष्ट्रीय फलक पर तुलसी कुमारी ने अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन की बदौलत पूरे टूर्नामेंट में प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट का प्रतिष्ठित खिताब अपने नाम किया था। इन होनहार छात्राओं की कामयाबियों ने पूरे गांव और आसपास के क्षेत्रों की अन्य बालिकाओं में भी मैदान में उतरने की नई ललक पैदा की है।
राज्य और राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में लगातार पदकों की झड़ी
प्रतियोगिताओं के इतिहास पर नजर डालें तो पूर्ववर्ती सरकार के समय शुरू किए गए राजीव गांधी ग्रामीण ओलंपिक खेलों की राज्य स्तरीय खो-खो स्पर्धा में छीलावाली-महरोली की संयुक्त टीम ने दोनों बार विजेता बनकर खिताबी परचम लहराया। इसके अलावा 31वीं से लेकर 35वीं सब-जूनियर और जूनियर राष्ट्रीय खो-खो चैंपियनशिप में भी यहां की खिलाड़ियों ने राजस्थान का प्रतिनिधित्व करते हुए निरंतर पदक जीतकर अपनी काबिलियत साबित की। इन निरंतर सफलताओं ने एक छोटे से ग्रामीण स्कूल को प्रदेश के खेल मानचित्र पर सम्मानजनक स्थान दिलाया है।
खेल के साथ अकादमिक मोर्चे पर भी शानदार प्रदर्शन
संस्थान की उपलब्धि केवल खेल के मैदान तक सीमित नहीं रही है, बल्कि पठन-पाठन में भी छात्र निरंतर उत्कृष्ट परिणाम दे रहे हैं। राष्ट्रीय मीन्स-कम-मेरिट स्कॉलरशिप यानी एनएमएमएस परीक्षा में इस स्कूल के छात्रों का चयन पिछले लगातार छह वर्षों से दर्ज किया जा रहा है। खेलकूद और शैक्षणिक स्तर पर लगातार मिल रहे इस दोहरे बेहतर प्रदर्शन के चलते आसपास की दूसरी ग्राम पंचायतों के अभिभावक भी अपने बच्चों का दाखिला इसी स्कूल में कराने के लिए आगे आ रहे हैं।
ग्रामीणों का सहयोग और अनुशासित परिवेश
विद्यालय परिसर में अनुशासन को बढ़ावा देने के लिए सभी विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए अनिवार्य ड्रेस कोड लागू किया गया है। स्थानीय भामाशाह और समाजसेवी भी स्कूल की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में लगातार हाथ बंटा रहे हैं। विद्यार्थियों को बैग, गर्म स्वेटर, टाई और बेल्ट जैसी आवश्यक वस्तुएं भामाशाहों के सहयोग से दी जाती हैं। कक्षा-कक्षों में बैठने के लिए फर्नीचर, बिजली और पंखों की समुचित व्यवस्था की गई है, जहां वर्तमान में पांच कमरों के भीतर शिक्षण कार्य संचालित हो रहा है। शाम होते ही जहां अधिकांश बच्चे घरों की ओर रवाना हो जाते हैं, वहीं छीलावाली की छात्राएं पंचायत की जमीन पर खो-खो का कड़ा अभ्यास शुरू कर देती हैं, जो यह साबित करता है कि सही मार्गदर्शन मिले तो अभाव कभी प्रगति को रोक नहीं सकते।



















