जापान के आइची-नागोया में चल रहे एशियन गेम्स 2026 के निशानेबाजी मुकाबलों में भारत को बड़ी कामयाबी हाथ लगी है। राजस्थान के जालौर जिले स्थित सियाणा गांव की निशानेबाज माहेश्वरी चौहान ने महिला स्कीट टीम स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन करते हुए कांस्य पदक अपने नाम किया। पेरिस ओलंपिक में बेहद करीबी अंतर से पोडियम फिनिश से चूकने वाली माहेश्वरी ने इस वैश्विक मंच पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। उनकी इस उपलब्धि में साथी भारतीय शूटर्स राइजा ढिल्लों और परिनाज धालीवाल की भूमिका भी बेहद निर्णायक साबित हुई।
प्रतियोगिता के दौरान तीनों भारतीय महिला निशानेबाजों ने सटीक तालमेल और एकाग्रता का परिचय देते हुए 331 अंकों का कुल स्कोर खड़ा किया। इस प्रदर्शन के दम पर भारतीय टीम तीसरे पायदान पर रही और कांस्य पदक पर कब्जा जमाया। इस स्पर्धा में चीनी निशानेबाजों ने शीर्ष स्थान हासिल करते हुए स्वर्ण पदक जीता, जबकि कजाकिस्तान की टीम दूसरे स्थान पर रहते हुए रजत पदक जीतने में कामयाब रही।
सियाणा की घरेलू शूटिंग रेंज से अंतरराष्ट्रीय पटल तक की यात्रा
माहेश्वरी चौहान का बचपन राजस्थान के जालौर जिले के सियाणा गांव में बीता। कम उम्र में ही बंदूकों और निशानों के प्रति उनका विशेष आकर्षण सामने आने लगा था, जिसे परिवार के सदस्यों ने तुरंत भांप लिया। उनके खेल की पहली पाठशाला उनका अपना घर ही बना, जहां उनके दादा गणपत सिंह और पिता प्रदीप सिंह चौहान ने उन्हें इस विधा की शुरुआती बारीकियां सिखाईं।
बेटी के इस जुनून को परवान चढ़ाने के लिए पिता प्रदीप सिंह चौहान ने एक बड़ा कदम उठाया। उन्होंने सियाणा गांव में ही माहेश्वरी के नियमित अभ्यास के लिए एक निजी शूटिंग रेंज तैयार करवाई। गांव की आबोहवा और घरेलू रेंज पर घंटों पसीना बहाते हुए माहेश्वरी ने अपनी निशानेबाजी की बुनियादी तकनीक को तराशा। यहीं से शुरू हुआ सफर राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं से होता हुआ राष्ट्रीय चैंपियनशिप और फिर अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों तक जा पहुंचा।
पेरिस ओलंपिक की निराशा को बनाया नई ताकत
खेल के उच्चतम स्तर पर असफलता कई बार खिलाड़ियों को मानसिक रूप से तोड़ देती है, लेकिन माहेश्वरी चौहान ने इसे एक अलग नजरिए से देखा। पेरिस ओलंपिक में वह मामूली फासले से पदक जीतने से वंचित रह गई थीं। कुछ अंकों की इस कमी ने उन्हें खाली हाथ लौटने पर मजबूर किया था, जो किसी भी एथलीट के लिए एक कठिन इम्तिहान होता है।
माहेश्वरी ने पेरिस की उस टीस को अपनी हताशा बनने देने के बजाय अपने भीतर नए संकल्प की आग में बदल दिया। उन्होंने अपनी तकनीकी कमियों का बारीकी से विश्लेषण किया और अभ्यास सत्रों में दोगुनी ऊर्जा झोंक दी। एशियन गेम्स 2026 का पोडियम उनके लिए खुद को साबित करने का सबसे बड़ा लक्ष्य बन गया था, जिसके लिए उन्होंने दिन-रात एक कर दिया।
राजसमंद और उदयपुर बने तैयारी का मजबूत आधार
ओलंपिक के बाद के दौर में माहेश्वरी के प्रशिक्षण का केंद्र मेवाड़ का उदयपुर संभाग बना। विवाह के बाद भी उनकी खेल दिनचर्या में कोई रुकावट नहीं आई, बल्कि उन्हें अपने ससुराल से भी वैसा ही मजबूत प्रोत्साहन मिला। राजसमंद जिले के केलवा में स्थित शूटिंग रेंज पर माहेश्वरी ने लगातार घंटों तक अभ्यास सत्र पूरे किए।
केलवा की रेंज पर उन्होंने स्कीट शूटिंग की गति, एंगल और टाइमिंग को अंतरराष्ट्रीय स्तर की चुनौतियों के अनुरूप ढाला। इस पूरे सफर में उनके ससुर राघवेंद्र सिंह राठौड़ का मार्गदर्शन और सहयोग अहम रहा, जो स्वयं राजसमंद राइफल एसोसिएशन से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। खेल से जुड़े पारिवारिक परिवेश ने माहेश्वरी को बिना किसी मानसिक दबाव के केवल अपने प्रदर्शन पर ध्यान केंद्रित करने में मदद की।
कड़े अभ्यास की परिणति और पूरे राजस्थान में उल्लास
केलवा और उदयपुर में बहाए गए पसीने का नतीजा आइची-नागोया के शूटिंग रेंज पर साफ दिखाई दिया, जहां भारतीय तिकड़ी ने दबाव के क्षणों में भी संयम बनाए रखा। 331 अंकों के साथ कांस्य पदक जीतने की यह कहानी केवल एक खेल पदक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हार से उबरकर दोबारा खड़े होने की मिसाल पेश करती है।
सियाणा गांव की साधारण पगडंडियों से निकलकर एशियन गेम्स के पोडियम तक पहुंची माहेश्वरी की इस सफलता ने साबित किया है कि अगर परिवार का साथ हो और इरादे अडिग हों, तो हर बाधा को पार किया जा सकता है। इस ऐतिहासिक पदक के बाद जालौर के सियाणा से लेकर राजसमंद और पूरे राजस्थान में जश्न का माहौल बना हुआ है।



















