एशियन गेम्स 2026 के मंच पर भारत की झोली में दूसरा स्वर्ण पदक आ गिरा है। 10 मीटर एयर पिस्टल की मिक्स्ड डबल्स स्पर्धा में हरियाणा के दो निशानेबाजों कमलजीत और सुरुचि इंदर सिंह ने शानदार तालमेल दिखाते हुए देश का मान बढ़ाया। दिलचस्प बात यह है कि खेल की दुनिया में कदम रखते समय इन दोनों ही खिलाड़ियों की मंजिल निशानेबाजी बिल्कुल नहीं थी, लेकिन समय के मोड़ और अटूट लगन ने इन्हें शूटिंग रेंज तक पहुंचाया और आखिरकार एशिया का चैंपियन बना दिया।
व्यक्तिगत निराशा के बाद मिक्स्ड डबल्स में ऐतिहासिक पलटवार
इस ऐतिहासिक जीत से पहले प्रतियोगिता का शुरुआती सफर दोनों ही खिलाड़ियों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण रहा था। मिक्स्ड टीम मुकाबले से पहले आयोजित एकल स्पर्धाओं में कमलजीत और सुरुचि सिंह का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा और दोनों व्यक्तिगत पदक हासिल करने की दौड़ से बाहर हो गए थे। इस शुरुआती झटके से टूटने के बजाय दोनों निशानेबाजों ने अपनी मानसिक मजबूती का परिचय दिया। मिक्स्ड डबल्स के फाइनल में उन्होंने सटीक निशाने साधे और दमदार वापसी करते हुए भारत के नाम दूसरा गोल्ड मेडल पक्का कर दिया।
ट्रैक की चोट से निशानेबाजी के पोडियम तक कमलजीत का सफर
हरियाणा के रेवाड़ी जिले से ताल्लुक रखने वाले कमलजीत की यह कामयाबी कई वर्षों के कठिन संघर्ष और त्याग का नतीजा है। बचपन के दिनों से ही उनके भीतर एक अव्वल एथलीट बनने की चाह थी, जिसके चलते उन्होंने ट्रैक एंड फील्ड से अपनी खेल यात्रा शुरू की थी। वह रेस ट्रैक पर तेजी से आगे बढ़ रहे थे, लेकिन एक गंभीर चोट ने उनकी दौड़ने की रफ्तार पर अचानक विराम लगा दिया। खेल के मैदान से दूर होने के बावजूद देश के लिए खेलने का जज्बा कम नहीं हुआ और उन्होंने ट्रैक छोड़कर शूटिंग रेंज का रुख किया।
आर्थिक तंगी और देरी से शुरुआत की दोहरी चुनौती
निशानेबाजी की दुनिया में कमलजीत का आगाज बेहद मुश्किल परिस्थितियों के बीच हुआ था। जब उन्होंने पहली बार पिस्टल थामी, तब उनके मुकाबले रेंज पर मौजूद उनसे कम उम्र के युवा निशानेबाज कई वर्षों के अभ्यास के कारण उनसे तकनीकी रूप से काफी आगे निकल चुके थे। उन अनुभवी साथियों की बराबरी करने और खेल की सूक्ष्म बारीकियों को सीखने के लिए कमलजीत को चौगुनी मेहनत झोंकनी पड़ी। इसके साथ ही पिस्टल और जरूरी उपकरणों के भारी खर्च ने उनके सामने आर्थिक तंगी की गंभीर समस्या खड़ी कर दी थी। इन तमाम अभावों, वित्तीय संकट और कड़े इम्तिहानों को झेलते हुए आखिरकार कमलजीत और झज्जर की सुरुचि इंदर सिंह ने भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर गौरवान्वित किया है।


















