उम्र के पांच दशक पार करने के बाद भी हौसले कितने बुलंद हो सकते हैं, इसकी मिसाल सीकर के रहने वाले पवन ढाका ने पेश की है। उन्होंने एक बेहद कठिन और थका देने वाली लंबी दूरी की प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और अपनी श्रेणी में शीर्ष स्थान हासिल करते हुए नया कीर्तिमान स्थापित किया। इस मुश्किल सफर में उनके सामने न केवल लंबी दूरी थी, बल्कि भौगोलिक और पर्यावरणीय बाधाएं भी बहुत बड़ी थीं।
कठिन रास्ते और दुर्गम चुनौतियां
लद्दाख की वादियों में आयोजित इस विशेष अल्ट्रा मैराथन का मार्ग आम दौड़ प्रतियोगिताओं से पूरी तरह भिन्न था। इस पूरी स्पर्धा के दौरान धावकों को समुद्र तल से 11 हजार से लेकर लगभग 18 हजार फीट तक की ऊंचाई पर सफर करना था। इतनी अधिक ऊंचाई पर पहुंचने के साथ ही हवा में ऑक्सीजन की मात्रा काफी कम हो जाती है, जिससे शरीर का संतुलन बनाए रखना और सांस लेना तक दूभर हो जाता है। इसके अलावा कड़ाके की ठंड, तेज हवाएं और पहाड़ी ढलान इस रेस को और ज्यादा खतरनाक बना रहे थे।
आयु वर्ग में हासिल किया पहला स्थान
इन तमाम बाधाओं को पार करते हुए पवन ढाका ने 52 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के सभी धावकों को पीछे छोड़ दिया। उन्होंने इस चुनौतीपूर्ण मुकाबले में पहला स्थान अपने नाम किया। इस शानदार जीत के बाद उन्हें एक भव्य ट्रॉफी के साथ-साथ एक लाख पचहत्तर हजार रुपए की पुरस्कार राशि से भी नवाजा गया। इस तरह की सहनशक्ति वाली दौड़ में केवल रफ्तार से काम नहीं चलता, बल्कि शारीरिक और मानसिक दृढ़ता की भी कड़ी परीक्षा होती है।
ऑक्सीजन की कमी को दी मात
इस अनुभव के बारे में बात करते हुए पवन ढाका ने बताया कि मैदानी इलाकों की तुलना में ऊंचाई वाले क्षेत्रों में आक्सीजन का स्तर बहुत कम होता है, जिसका सीधा असर शारीरिक ऊर्जा पर पड़ता है। 122 किलोमीटर की इस विशाल दूरी को तय करना किसी भी एथलीट के लिए आसान नहीं होता। उन्होंने यह भी साझा किया कि इससे पहले वे 2025 में भी इस मैराथन का हिस्सा रह चुके हैं और उस प्रतियोगिता में भी उन्होंने प्रथम स्थान ही प्राप्त किया था।
लंबी तैयारी और कड़ा अनुशासन
इस मुकाम तक पहुंचने के लिए पवन ने वर्षों तक नियमित तौर पर अभ्यास किया है। वे लंबे समय से एंड्योरेंस ट्रेनिंग और रनिंग पर जोर दे रहे हैं। उन्होंने अपनी दिनचर्या में पहाड़ी इलाकों के अनुकूल अभ्यास, लगातार दौड़ और कड़े अनुशासन को शामिल किया था। उनका मानना है कि इतनी बड़ी सफलता रातों-रात नहीं मिलती, बल्कि इसके पीछे वर्षों का कड़ा परिश्रम और समर्पण छिपा होता है। वे इससे पहले भी कई अन्य लंबी दूरी की प्रतियोगिताओं में भाग लेकर कई पदक अपने नाम कर चुके हैं।



















