राष्ट्रमंडल खेल 2026 की मुक्केबाजी स्पर्धा के पुरुषों के 60 किग्रा भार वर्ग में भारतीय मुक्केबाज सचिन सिवाच ने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए देश के लिए स्वर्ण पदक जीत लिया है। नामीबियाई बॉक्सर ट्रयागेन मॉर्निंग न्देमेलो के साथ हुए इस बेहद कड़े खिताबी मुकाबले की शुरुआत भारतीय मुक्केबाज के लिए आसान नहीं रही। शुरुआती दो दौर की समाप्ति तक पांचों जजों के अंकों के आधार पर 1-4 से पिछड़ने के बावजूद, हरियाणा के इस जांबाज खिलाड़ी ने अंतिम दौर में असाधारण खेल का प्रदर्शन करते हुए 3-2 के विभाजित निर्णय से विजय हासिल की।
खिताबी मुकाबले का रोमांच: शुरुआती झटके के बाद अंतिम तीन मिनट में पलटा मैच
पुरुषों के 60 किग्रा वर्ग का यह अंतिम मुकाबला रिंग में भारी प्रतिस्पर्धा और उत्साह से भरा रहा। शुरुआती दो दौर में नामीबिया के ट्रयागेन मॉर्निंग न्देमेलो ने आक्रामक रुख अपनाते हुए सचिन पर बढ़त बना ली थी। दो दौर का खेल खत्म होने पर जज कार्ड पर 1-4 का स्कोर दर्ज था, जिससे लग रहा था कि स्वर्ण पदक हाथ से निकल सकता है। हालांकि, भारतीय सेना में हवलदार के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे सचिन सिवाच ने दबाव में अपना धैर्य नहीं खोया।
तीसरे और अंतिम दौर में सचिन ने अपनी रणनीति में त्वरित बदलाव किया। उन्होंने रिंग में दूर से सटीक प्रहार करने के साथ-साथ अपने प्रतिद्वंद्वी के हमलों से खुद को कुशलता से बचाया। अंतिम तीन मिनटों में सचिन के वर्चस्व को देखते हुए जजों ने तीसरे दौर का फैसला 4-1 से उनके पक्ष में दिया। जब सभी पांचों जजों का अंतिम निर्णय जोड़ा गया, तो परिणाम 3-2 से सचिन के समर्थन में रहा, जिसने उन्हें 2026 का नया राष्ट्रमंडल champion बना दिया।
भारतीय मुक्केबाजी दल का स्वर्णिम अभियान और अरुंधति चौधरी का योगदान
सचिन सिवाच की इस उपलब्धि के साथ राष्ट्रमंडल खेल 2026 में भारतीय मुक्केबाजों की सफलता का ग्राफ और ऊंचा हो गया है। इस प्रतियोगिता में भारत के मुक्केबाजी दल ने अब तक कुल 8 पदक अपने नाम दर्ज किए हैं। इन 8 पदकों में 6 स्वर्ण पदक और 2 रजत पदक शामिल हैं, जो मुक्केबाजी रिंग में भारतीय खिलाड़ियों के दबदबे को प्रदर्शित करते हैं।
सचिन से पहले महिला मुक्केबाजी वर्ग में भी भारत को बड़ी कामयाबी हासिल हुई थी। किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाली अरुंधति चौधरी ने अपने फाइनल मैच में इंग्लैंड की मुक्केबाज को पराजित करके भारत को मुक्केबाजी में तीसरा स्वर्ण पदक दिलाया था। भारतीय मुक्केबाजों के इस शानदार खेल ने देश की पदक तालिका को रफ्तार प्रदान की है।
पदक तालिका में भारत की स्थिति: 36 पदकों के साथ चौथे स्थान पर मजबूती
मुक्केबाजी में मिले इन सफल नतीजों के बूते भारत राष्ट्रमंडल खेल 2026 की पदक तालिका में अपनी मजबूत स्थिति बनाए हुए है। भारतीय दल के कुल पदकों का आंकड़ा 36 तक जा पहुंचा है। इस कुल योग में 12 स्वर्ण पदक, 16 रजत पदक तथा 8 कांस्य पदक शामिल हैं। इस तालिका में भारतीय दल चौथे पायदान पर सुदृढ़ है।
इस बेहतरीन प्रदर्शन के चलते भारत ने मेजबान स्कॉटलैंड को पीछे छोड़ दिया है, जो तालिका में भारत से निचले क्रम पर मौजूद है। पदक तालिका के शीर्ष स्थानों की बात करें तो ऑस्ट्रेलिया पहले स्थान पर, इंग्लैंड दूसरे स्थान पर और कनाडा तीसरे स्थान पर बना हुआ है। भारत की यह स्थिति आगामी स्पर्धाओं के लिए एथलीटों का उत्साह बढ़ा रही है।
भिवानी के मिताथल गांव से जुड़ाव और मुक्केबाजी की पारिवारिक विरासत
सचिन सिवाच का जन्म 6 दिसंबर 1999 को हरियाणा प्रदेश के भिवानी जिले में स्थित मिताथल नामक छोटे गांव में हुआ था। एक साधारण कृषक परिवार में जन्मे सचिन के घर में खेल का माहौल बचपन से ही मौजूद था। उनके पिता कृष्ण सिवाच स्वयं खेलों और मुक्केबाजी के बहुत बड़े समर्थक रहे हैं।
सचिन के पिता कृष्ण सिवाच, भारत को मुक्केबाजी का पहला ओलंपिक पदक दिलाने वाले प्रसिद्ध मुक्केबाज विजेंद्र सिंह के सगे भाई हैं। अपने पिता की प्रेरणा और चाचा पवन सिवाच के मार्गदर्शन ने सचिन के दिल में मुक्केबाजी के प्रति गहरा लगाव पैदा किया, जिससे उन्होंने बहुत छोटी उम्र में ही रिंग में उतरने का फैसला कर लिया।
अकादमी से शुरुआती इनकार और पिता का अथक समर्पण
वर्ष 2009 में जब सचिन की आयु केवल 10 साल की थी, तब वे मुक्केबाजी का प्रशिक्षण लेने भिवानी स्थित प्रसिद्ध कैप्टन हवा सिंह अकादमी पहुंचे थे। लेकिन वहां उन्हें शुरुआती निराशा का सामना करना पड़ा। काफी दुबले-पतले और शारीरिक कमजोरी के कारण अकादमी के मुख्य कोच संजय शेरोन ने उन्हें प्रवेश देने से मना कर दिया।
इस फैसले के बावजूद पिता कृष्ण सिवाच ने उम्मीद नहीं खोई। उन्होंने घर पर ही बेटे के खान-पान और शारीरिक क्षमता को सुधारने का बीड़ा उठाया। कठिन परिस्थितियों के बीच उन्होंने सचिन के लिए शुद्ध दूध और पौष्टिक खुराक का बंदोबस्त किया। पिता के इस अथक प्रयास और सचिन के लगन भरे अभ्यास का फल यह मिला कि वह जल्द ही शारीरिक रूप से फिट होकर अकादमी में दाखिला पाने में कामयाब रहे।
जूनियर स्तर पर उपलब्धियां और सर्वश्रेष्ठ एशियाई यूथ बॉक्सर का खिताब
प्रशिक्षण की शुरुआत के साथ ही सचिन की प्रतिभा अंतरराष्ट्रीय मंच पर चमकने लगी। वर्ष 2015 में आयोजित एआईबीए जूनियर विश्व चैंपियनशिप में उन्होंने कांस्य पदक जीतकर अपनी क्षमता का पहला प्रमाण दिया। इसके बाद 2016 की एआईबीए यूथ वर्ल्ड चैंपियनशिप में उन्होंने इतिहास रचते हुए स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया। वह इस विश्व स्तरीय स्पर्धा में स्वर्ण जीतने वाले भारत के केवल तीसरे मुक्केबाज बने।
कामयाबी का यह दौर 2017 में भी जारी रहा, जब उन्होंने राष्ट्रमंडल यूथ गेम्स में स्वर्ण पदक और एशियाई यूथ मुक्केबाजी चैंपियनशिप में रजत पदक अपने नाम किया। उनकी इन उपलब्धियों को देखते हुए 2017 में एशियाई मुक्केबाजी परिसंघ ने उन्हें 'सर्वश्रेष्ठ एशियाई पुरुष यूथ बॉक्सर' के पुरस्कार से अलंकृत किया।
सीनियर सर्किट में पदार्पण, कलाई की चोट, अपेंडिक्स ऑपरेशन और सेना में सेवा
जूनियर वर्ग में सफलताएं हासिल करने के उपरांत सचिन ने सीनियर मुक्केबाजी स्पर्धाओं में कदम रखा। सीनियर स्तर पर उन्होंने 2019 में इंडिया ओपन स्पर्धा में रजत पदक जीता और फिनलैंड के गी-बी बॉक्सिंग टूर्नामेंट में कांस्य पदक हासिल किया। उसी वर्ष आयोजित दक्षिण एशियाई खेलों में उन्होंने भारत के लिए एक और स्वर्णिम पदक जीता।
हालांकि, उनके सफर में कई शारीरिक अड़चनें भी आईं। कलाई में आई गंभीर चोट की वजह से उनका अभ्यास कुछ समय के लिए बाधित रहा। इसके बाद एशियाई चैंपियनशिप की शुरुआत से ठीक पहले पंजाब के पटियाला शहर में सचिन को अचानक अपेंडिक्स का आपातकालीन ऑपरेशन करवाना पड़ा, जिससे वे लगभग एक महीने तक रिंग से दूर रहे। इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपनी हिम्मत बनाए रखी।
वर्ष 2023 में सचिन ने विश्व चैंपियनशिप के अंतिम-16 दौर तक का सफर तय किया। उसी साल एशियाई खेलों के क्वार्टर फाइनल मुकाबले में उन्होंने चीन के मुक्केबाज ल्यू पिंग को कड़ी टक्कर दी। वर्तमान में भारतीय सेना में हवलदार पद पर तैनात सचिन ने 2026 में ही चेक गणराज्य की ग्रैंड प्रिक्स प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता था, जिसके बाद अब उन्होंने राष्ट्रमंडल खेल 2026 में स्वर्ण पदक जीतकर एक नया मुकाम हासिल कर लिया है।


















