प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के दौरान मिलने वाली असफलताओं से अक्सर छात्र निराश होकर अपना इरादा बदल लेते हैं। हालांकि, गुजरात के हिम्मतनगर के रहने वाले मोहम्मद राकिब अकुंजी की कहानी यह साबित करती है कि अगर सही रणनीति और अटूट संकल्प हो तो किसी भी बड़ी चुनौती को पार किया जा सकता है। 12वीं कक्षा में गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझने और नीट यूजी के शुरुआती प्रयासों में कम अंक पाने के बावजूद, उन्होंने हार नहीं मानी। आखिरकार अपने चौथे प्रयास में 720 में से 695 अंक हासिल कर और ऑल इंडिया 202वीं रैंक पाकर उन्होंने अहमदाबाद स्थित प्रतिष्ठित सरकारी बीजे मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की सीट पक्की की।
11वीं और 12वीं कक्षा में स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां
दसवीं कक्षा तक मोहम्मद राकिब अकुंजी पढ़ाई में काफी बेहतर प्रदर्शन कर रहे थे। हालांकि, 11वीं कक्षा में साइंस स्ट्रीम चुनने के बाद उन्हें नए विषयों की अवधारणाओं को समझने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जब भी वे कक्षा में शिक्षकों से प्रश्न पूछते थे, तो उनके सहपाठी उनका मज़ाक उड़ाते थे। इसी दौरान उन्हें पेट में अल्सर की गंभीर बीमारी हो गई। इस स्वास्थ्य समस्या के कारण वे अक्सर स्कूल परिसर में ही बेहोश हो जाते थे। बीमारी की गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे 12वीं कक्षा के दौरान एक भी दिन स्कूल नहीं जा सके। उनकी स्थिति को देखते हुए उनके पिता ने उन्हें बेहतर देखभाल के लिए भुज भेज दिया, जहां उनकी बहन और जीजाजी रहते थे। उनके जीजाजी स्वयं एक पेशे से डॉक्टर हैं।
शुरुआती असफलताएं और ताने झेलकर बनाया संकल्प
स्वास्थ्य समस्याओं के चलते राकिब 12वीं बोर्ड परीक्षा में केवल 63 प्रतिशत अंक ही हासिल कर सके। इसके बाद वर्ष 2019 में बिना किसी औपचारिक कोचिंग के उन्होंने नीट यूजी का अपना पहला पेपर दिया, जिसमें उन्हें मात्र 197 अंक मिले। इस बेहद कम स्कोर के कारण आसपास के लोगों और रिश्तेदारों की ओर से उन्हें तीखी प्रतिक्रियाएं और ताने सुनने को मिले। इन बातों से दुखी होकर वे अक्सर अकेले एक स्थानीय तालाब के किनारे जाकर बैठते थे। उसी शांत माहौल में अपने भविष्य का आंकलन करते हुए उन्होंने तय किया कि चाहे कितनी भी रुकावटें आएं, वे डॉक्टर बनने का अपना सपना ज़रूर पूरा करेंगे।
परिवार का अटूट सहयोग और अस्पताल से मिली प्रेरणा
राकिब की इस कठिन यात्रा में उनके परिवार ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके पिता ने 12वीं के प्रैक्टिकल पेपर्स पूरे करने के लिए रात-रात भर जागकर फाइलें तैयार कीं, ताकि राकिब अपनी पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी पर ध्यान केंद्रित कर सकें। वहीं भुज में अपने जीजाजी के साथ अस्पताल जाकर मरीजों का इलाज देखना उनके लिए सबसे बड़ा प्रेरणा स्रोत बना। अस्पताल के वातावरण और मरीजों की सेवा के काम ने उनके मन में डॉक्टर बनने की इच्छा को और मजबूत कर दिया।
फिजिक्स में 10 अंक से 182 तक पहुंचने की रणनीति
तीसरे प्रयास में राकिब ने कुल 413 अंक प्राप्त किए, लेकिन फिजिक्स विषय में उन्हें केवल 10 नंबर ही मिले। इस परिणाम ने उन्हें अपनी पढ़ाई के तरीके का पुनर्मूल्यांकन करने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने अपनी सबसे बड़ी गलती यह पहचानी कि वे किसी प्रश्न को हल करने के तुरंत बाद उत्तर कुंजी देख लेते थे। इस आदत को बदलते हुए उन्होंने अपनी कमियों को दर्ज करने के लिए एक विशेष 'मिस्टेक डायरी' बनाई। जो प्रश्न गलत होते थे, उन्हें वे बार-बार हल करते थे जब तक कि अवधारणा पूरी तरह स्पष्ट न हो जाए। इस व्यवस्थित बदलाव का असर वर्ष 2022 में उनके चौथे प्रयास में दिखा, जब फिजिक्स में उनका स्कोर 10 से बढ़कर 182 अंक हो गया। कुल 695 अंक हासिल कर उन्होंने सरकारी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश पाया।



















